नदिया चले, चले रे धारा

हर बार हिमालय की गोद में आकर कल-कल बहते हुए पानी को देखकर वैसे तो बहुत कुछ सीखने को मिलता है, लेकिन ऐसा कुछ है जो कि मन में बस सा गया है। अगर आपने कानपुर और वाराणसी में गंगा के पानी को देखा होगा तो आपको जरूर हृषिकेश में गंगाजल की याद आई होगी, जहाँ पर आप नदी का तल देख सकते हैं, पानी इतना स्वच्छ है। थोड़ा आगे जाकर आपने दूर से देवप्रयाग में भागीरथी और मन्दाकिनी के संगम को भी देखा होगा, जहाँ एक मटमैली धारा एक हरे रंग की धारा के साथ मिलती है। देहरादून जाते समय पथरीली घाटी भी दिखाई दी होगी, जो वैसे तो पूरे साल सूखी रहती है लेकिन बरसात में रौद्र रूप धारण कर लेती है। कसोल में पार्वती नदी को देखकर बस एक ही चीज मन में आती है कि नदी के उस पार तैरकर जाना संभव भी है क्या। और देवरिया ताल में छोटी सी झील को देखकर महाभारत काल में चले जाना स्वाभाविक है क्योंकि मान्यताओं के अनुसार इसी झील के किनारे यक्ष ने युधिष्ठिर से प्रश्न किये थे।

ये हिमालय से निकलने वाली धाराएं कोई सामान्य धाराएं नहीं हैं और जैसा कि मैंने पहले भी ‘नदी बहती रही’ में कहा है कि मनुष्य के जीवन और नदी के बहाव में अत्यधिक समानताएं हैं। जैसे मनुष्य अपने बाल्यकाल में शरारती स्वाभाव का होता है जिसे संसार के किसी भी दुःख दर्द की परवाह नहीं होती है और जिसका दिन खेलते कूदते हुए ही बीत जाता है उसी प्रकार नदी भी कंकरीली पथरीली भूमि पर बहते हुए उछलती कूदती हुई चली जाती है। जब मनुष्य परिपक्व हो जाता है उसके स्वभाव में एक गंभीरता आ जाती है, उसके निर्णयों में एक सोच समझ झलकती है उसी प्रकार नदी भी जब मैदानी भागों में प्रवेश करती है तो उसकी गति मंद पड़ जाती है मानों उसे जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा दिया गया हो। जब मनुष्य वृद्धावस्था में प्रवेश करता है तो उसकी शक्ति क्षीण हो जाती है और ब्रह्मलीन होने के पहले उसका मन कई दिशाओं में भटकता रहता है। ठीक उसी प्रकार नदी भी सागर के पास पहुँचते पहुँचते बहुत धीमी हो जाती है, बीच में कई टापू उभर आते है और कई शाखाओं में बँट जाती है।

मनुष्य का जीवन हमेशा एक रूप में ही थोड़े ही रहा है। कभी तेज तो कभी धीमा। कभी प्रखर तो कभी समझौतावादी। कभी प्रयत्नशील तो कभी भाग्यवादी। कहीं जीत तो कहीं हार। कभी झुकना तो कभी फिर उठना। वैसे ही पानी को भी कई बार रूपांतरण करना पड़ा है। कभी बर्फ बनकर पहाड़ों पर थम गया तो कभी झरना बनकर बार बार पत्थर के विवेक पर चोट की है। कभी खेतों को सींचने के लिए थम गया तो कभी पहाड़ों को हिला देने वाली गति से चल उठा। कभी बाँध बनाकर इसे रोक दिया गया तो कभी भूस्खलन में पूरे पहाड़ आकर इसके कलेजे में धंस गये। कभी भगवान शंकर की जटा में बैठ गया तो कभी आंसू बनकर लोगों की भावनाओं की अभिव्यक्ति का साधन बना। और रैदास ने तो कहा भी है कि ‘तुम चन्दन हम पानी’ जिसमें उन्होंने पानी को सब कुछ आत्मसात करने वाला बता दिया है।

तो जब हरिद्वार में हर की पौड़ी में चण्डी देवी को निहारते हुए गंगा किनारे बैठकर सोचता हूँ कि इस बार इस आत्म मंथन से क्या लेकर जाऊंगा तो मैं सोचता हूँ कि जिंदगी में इतने अनगिनत पड़ाव आते हैं कभी सुख तो कभी दुःख झेलना पड़ता है। संसार में कितनी ही असफल जिंदगियाँ हैं, कितने ही दुर्गम रास्ते हैं और कितने ही अक्षम्य अपराध मनुष्य ने किये हैं जिसके कारण उसे हारकर बैठना पड़ता है। कितनी ही बार मनुष्य अनुत्तरीय प्रश्नों के आगे निरुत्तर रह गया है और बस अपने भाग्य को कोस कर रह गया है। कई बार क्या पाया है सोचने की बजाय क्या खोया ज्यादा सोचने लगता है। तो ऐसे में मैं फिर अविरल धारा की ओर आशा भरी नज़रों से देखता हूँ कि शायद यहाँ कोई जवाब मिल जाये।

और नदी की धारा ने मुझे यहाँ भी निराश नहीं किया। कितनी बार नदी की धारा को बाँध बनाकर मंद किया गया। अलग अलग धारायें निकालकर उसको क्षत-विक्षत किया गया। उसके किनारे मानव बस्तियाँ बसाकर उसको गन्दगी ढोने का एक साधन बना दिया गया। पूजा के नाम पर कितने फूलों पत्तियों को तोड़कर उसमें समाहित कर दिया गया। और तो और वर्षा की अति होने पर उसे हानि के लिए कोसा भी गया। मैंने पूँछा नदी से कि इतनी विपरीत परिस्थितियों के बाद कभी ऐसा नहीं लगता कि जीवन जिया ही क्यों जाये। नदी की एक छोटी सी धारा मेरे पैरों के पास रुकी और कहा कि कुछ भी घटित हो, आशातीत या आशानुरूप, जीवन निर्बाध रूप से चलता रहता है। इतना कहकर वह धारा फिर अपनी राह पर चल पड़ी।


नदिया चले, चले रे धारा । तुझको चलना होगा ।
नदिया चले, चले रे धारा । तुझको चलना होगा । 


सूर्योदय और सूर्यास्त, भोर और साँझ 

प्रकृति की दो प्रक्रियाएँ हमेशा से ही आकर्षित करती रही हैं। वो हैं - सूर्योदय और सूर्यास्त। भोर की वेला का आकर्षण होता है सूर्योदय और वैसे ही साँझ वेला का मुख्य आकर्षण सूर्यास्त होता है। मुझे अच्छी तरह से याद है कि बचपन में स्कूल की दीवारों पर लिखी हुई सूक्तियों में एक यह भी हुआ करती थी कि "सूर्य न तो अस्त होता है और न उदय, हम ही जागकर सो जाते हैं।" अब बाल मन ने कहावत पढ़ी और अनदेखा कर दिया, हर दिन। उस समय इस कहावत के खगोलीय और दार्शनिक महत्व के बारे में ज्यादा पता न था। और अब हालत ये है कि सूर्योदय और सूर्यास्त को देखते ही मेरे अंदर का दार्शनिक जाग उठता है। हालाँकि दिनचर्या ऐसी है कि इनको देखना कम ही हो पाता है। और ऐसा भी नहीं है कि सूर्योदय को देखकर सबके मन में सिर्फ दार्शनिक विचार ही आते हैं। लेखक जरॉड किंट्ज़ ने तो सूर्य के चाल-चलन की ही शिकायत कर दी। कारण भी ये कि भोर में सूर्य रेंगते हुए खिड़कियों पर चढ़ आता हैं और वहां से झांकता है। लेकिन घबराइये नहीं। सूर्य के चरित्र-हनन का मेरा कोई इरादा नहीं है। 

उखीमठ, उत्तराखंड में गढ़वाल मंडल विकास निगम के गेस्ट हाउस की एक भोर आज तक नहीं भूलती है। वैसे तो हिमालय में सूर्योदय के उत्तम दृश्य देखने के लिए कुछ जगहें ही उपयुक्त कही जा सकती हैं और वो इसलिए क्यूंकि ज्यादातर पहाड़ी बस्तियां पर्वतों से घिरी होती हैं। जब तक सूर्य पहाड़ों के ऊपर आता है, तब तक दिन काफी चढ़ चुका होता है और सूर्य अपना नवजातपन खो चुका होता है। मुझे याद है कि एक बार हृषिकेश में सूर्योदय देखने के लिए हमने रात्रि-जागरण किया था लेकिन सुबह सूर्य दिखने तक भोर का नामोनिशान गायब हो चुका था। खैर उखीमठ ने हमें निराश नहीं किया। वहां से हिमाच्छादित पहाड़ों की छटा बस देखते ही बनती थी। सामने गुप्तकाशी और बीच में घाटी में बह रही मन्दाकिनी नदी की कर्णप्रिय आवाज और फिर बादलों से अठखेलियाँ करता हुआ सूरज। जनवरी के महीने में सूर्य की गुनगुनी किरणें किसी वरदान से कम तो नहीं लग रही थीं। और सूर्य की लालिमा से बादल और बर्फ से ढके पहाड़ भी लाल लग रहे थे। 

हृषिकेश में सूर्योदय देखने का सौभाग्य हमें प्राप्त नहीं हुआ, लेकिन सूर्यास्त जरूर देखा यहाँ पर। त्रिवेणी घाट से हमने सूर्य को नीचे मैदानों की तरफ जाते देखा। उस जगह से गंगा नदी भी एक मोड़ लेकर आँखों से ओझल हुई जा रही थी और सूर्य भी अस्त हो रहा था। ऐसा लग रहा था कि उस जगह तक प्रकृति की सत्ता है और उसके बाद मनुष्य की। मसूरी की साँझ भी कम शानदार नहीं कही जा सकती। पहाड़ों से रहित एक साँझ में हमने पूरा सूर्यास्त देखा। सूर्य को धीरे धीरे लाल होते देखा और फिर पूरा क्षितिज लाल था, पहाड़ों का बस धुंधला सा खाका देखा जा सकता था। कुछ देर बाद सूर्य जब और अस्ताचल की ओर बढ़ चला तब आसमान में एक रेखा साफ़ देखी जा सकती थी जिसके नीचे अंधकार था और जिसके ऊपर लाल रौशनी जगमगा रही थी। जब सूर्य दिखना बंद हो गया तब लाल आकाश के नीचे देहरादून शहर में जलते हुए प्रकाश बिम्ब साँझ की शोभा बढ़ा रहे थे। 

कभी कभी सोचता हूँ कि मनुष्य को सूर्योदय और सूर्यास्त क्यों अच्छा लगता है। सूर्योदय को अच्छा लगने के पीछे यह कारण हो सकता है कि मनुष्य की इस धारणा की पुष्टि होती है कि अंधकार नित्य नहीं रहेगा। हमारी संस्कृति में अंधकार को बुराई और प्रकाश को अच्छाई का प्रतीक माना गया है। प्रतिदिन सूर्योदय उस बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। और सहज ही समझा जा सकता है कि पुराने समय में लोग सूर्योदय की इतनी बेसब्री से प्रतीक्षा क्यों करते होंगे। और रही बात सूर्यास्त की तो उसको भी अच्छाई-बुराई से जोड़ते हुए यह कहा जा सकता है कि लोगों को पता है कि यह जो अँधेरा सूर्यास्त ला रहा है वो क्षणिक है, कल फिर सूर्योदय होगा और अंधकार पराजित होगा। इसलिए वो उत्साह से भोर का इंतज़ार करते हैं। 

कभी यह नहीं सोचा था कि सूर्योदय और सूर्यास्त में ज्यादा कौन अच्छा लगता है। मुझसे यह प्रश्न हिंदी साहित्य जगत के नवांकुरों में से एक ने पूछा था। मैंने थोड़ा सोचा इस बारे में, लेकिन बुद्धिजीवियों को संतुष्ट कर पाने वाला जवाब नहीं मिला। मैंने बताया कि सूर्यास्त ज्यादा अच्छा लगता है क्योंकि वो आँखों को ज्यादा सुखदायी होता है। तब उस नवांकुर ने बताया , "किसी चीज की सुंदरता का एहसास तब ज्यादा होता है जब वह हमसे दूर जा रही हो, बजाय इसके कि जब वह चीज हमारे पास आई हो और काफी दिन तक साथ रहे। और जब हम किसी चीज को जाते हुए देखते हैं तो हम उसे देखने के लिए रुकते हैं। उससे आत्मीयता का एहसास होता है। उगते हुए सूरज की वैसे तो कुछ लोग पूजा भी करते हैं लेकिन उसे उगते हुए देखने के लिए कोई रुकता नहीं है जैसे कि लोग अस्त होते हुए सूरज को देखने के लिए रुकते हैं।" सचमुच इस प्रश्न का इससे खूबसूरत दार्शनिक जवाब संभव नहीं था।

मसूरी की एक साँझ
मसूरी की एक साँझ
(तस्वीर धर्मेन्द्र कुमार  के सौजन्य से )


यूँ तो हम बचपन से सुनते आये हैं कि हिमालय एक दुर्गम जगह है जहाँ पर रहना तो छोड़ दीजिये, ऊंचाई पर पहुँच पाना भी मुश्किल है। आये दिन भूस्खलन और पहाड़ी रास्तों पर होने वाली घटनाएं हम सुनते ही रहते हैं, जो कि हिमालय की कठिनाइयों को बयाँ करती हैं। इसी कारण से ये हिमालय पर्वत श्रृंखला भारत के लिए सदियों से एक प्राकृतिक सीमा का काम करती रही है। पहाड़ी रास्तों पर पत्थरों के गिरने का डर, नीचे गहरी खाईं में गिरने का डर, उफनाती बलखाती नदी में समा जाने का डर, अत्यधिक शीतल हवाओं का डर, बर्फ की एक मोटी परत, जो हफ़्तों घर से बाहर निकलने से रोक दे उसका डर आदि कितने सारे डर हिमालय के साथ जोड़ दिए जाते हैं। जितनी ऊंचाई बढती जाये डर उतना ही बढ़ता जाये। लेकिन आज हम इन डरों की बात नहीं करेंगे। 

आज हम इन सबसे इतर एक दूसरे ही डर की बात करेंगे। हिमालय की वादियों में खो जाने का डर। एक बार पहाड़ों में जाने और फिर वहीं के हो जाने का डर। सर्पीली पगडंडियों पर बस चलते चले जाने का डर। आँख बंद करके पहाड़ी के शिखर पर पहुँच जाने का डर। विहंगम दृश्य के आगे सांसें रोक लेने का डर। नदी के साथ घुलमिल जाने का डर। चीड़ देवदार के जंगलों को अपना आश्रय बना लेने का डर। हर बार इन पहाड़ों के सान्निध्य में आकर ऐसा लगता है कि कोई चीज तो ऐसी है इन पहाड़ों में जो कि यहाँ आने पर मजबूर करती है और एक विशेष आनंद से भर देती है। यहाँ पर किसी पहाड़ी की फुनगी पर बने मंदिर में किसी योगी को धूनी रमाये देख लीजियेगा तो आश्चर्य न कीजियेगा। यहाँ की हवाओं में कुछ बात है ही ऐसी जो कि सब कुछ छोड़कर बस अपनी धुन में लग जाने के लिए आमंत्रित करती है। जो इस आमंत्रण का प्रतिरोध न कर पाए वो आज खुद में मगन यहाँ प्रकृति के पास रह रहे हैं।

दूर किसी पहाड़ी की चोटी को चूमते हुए बादलों को देखकर मन में बस एक ही ख्याल आता है कि किस तरह इन बादलों के बीच पहुंचा जाये। यूँ तो पहाड़ों के बीच में कभी कभी कुछ बादल हमेशा आपको मिल जायेंगे जो कि ऐसे लगते हैं जैसे लम्बी यात्रा के बाद कुशलक्षेम पूछने के लिए उतर आये हों और कभी कभी ये राह भटके हुए बादल चेहरे के पास से ऐसे गुजरते हैं मानो ये हमसे भटके हुए सफ़र का रास्ता पूछ रहे हों। लेकिन भटके हुए इस बादल से भी मुझे बहुत सहानुभूति होती है। हर सफ़र की मंजिल थोड़े ही होती है। यकीन न मानियेगा तो ओस की उन बूंदों से पूछ लीजियेगा जो पूरी रात सितारों को बस निहारते हुए ही बिता देती हैं। 

मन कहता है कि घाटी में बहती नदी के उतार चढ़ाव से तालमेल बिठाया जाये, धारा के साथ बहा जाये। जाने कितने पहाड़ी गाँवों की कहानियां लिए ये कलकल करती नदी बहती जाती है। मन तो कहता है कि घाटी में नीचे उतारकर मैं नदी के किनारे बैठकर उसकी कहानियां सुनूँ, अपनी सुनाऊँ और उसके साथ गुनगुनाऊँ। ठंडी ठंडी हवायें, जो एक अलग ही ताजगी का अहसास कराती हैं, पत्तियों के बीच से सरसराहट करते हुए निकलती हैं और पहाड़ों की ढाल पर पेड़ों के बीच जीवन्तता का एक मात्र प्रतीक होती हैं। हवा धीरे धीरे मंद पड़ जाती है और दूर दूर जाते उसकी आवाज़ कहीं खो सी जाती है, लेकिन उसकी तरोताजगी आज भी चेहरे पे महसूस की जा सकती है और मन के किसी कोने में उसकी प्रतिध्वनि आज भी सुनी जा सकती है।
  
आप मुझे अतिशयोक्ति अलंकार का मनचाहा प्रयोग करने के लिए दोष दे सकते हैं लेकिन ऐसे माहौल में आकर अगर मन बहक जाये तो उसकी भी कोई खता नहीं मानी जाएगी। मुझे नहीं मालूम कि इन नीली पहाड़ियों में, एक दूसरे के कान में फुसफुसाते हुए पेड़ों में, अनवरत बहती चली जाने वाली नदियों में, भीड़ से अलग छोटे छोटे कुटीरों में, ठंडी हवाओं में, छोटे छोटे सीढ़ीनुमा खेतों में, नीले सफ़ेद जंगली फूलों में ऐसा क्या है जो मैं इनकी तरफ ऐसा लगाव अनुभव करता हूँ लेकिन ये डर जरुर लगता है कहीं मैं और हिमालय एक दूसरे को अपना न लें। और ये डर भी ऊंचाई के साथ बढ़ता ही जाता है। हिमालय में जितना ऊंचाई पर जाता हूँ हिमालय में ही रम जाने का उतना ही डर लगता है।

मन तो कहता है कि बस यहीं रह जाया जाये। लेकिन यथार्थ फिर से धरातल पर खींच लाता है। मन और यथार्थ के बीच संघर्ष ऐसे ही चलता रहता है और जीत हर बार यथार्थ की ही होती है, लेकिन मुझे लगता है कि एक न एक दिन मन की जीत अवश्य होगी। मेरा मन उस डर के सामने सीना तानकर खड़ा होना नहीं चाहता है बल्कि समर्पण करना चाहता है। हिमालय का वह डर भी सामान्य नहीं है। संसार को खो देने और स्वयं को पा लेने का डर।

बरोट में उहल नदी
बरोट में उहल नदी 


Do not get infuriated even by the suggestion of something like that. Let us have a debate on that. Given the situations both political parties are in, this may be far fetched from reality but we will go back few years in history to see whether it was possible at all. When Aam Aadmi Party made a spectacular debut in assembly elections in Delhi in December 2013, there was a tweet by Kiran Bedi after the declaration of results, in which she asked AAP and BJP to come together. In a series of tweets, she may have expressed unintentionally the desire of a broader section of society.

Three arguments can be given. First, the success of anti-corruption crusade of 2010 and onwards should not be credited to a single party or organisation. After a series of scams, CAG reports and persistent media coverage of these events created an anti-establishment atmosphere. Comes India Against Corruption (IAC) into the picture empowered with the enormous reach of social media joined by the audience of the conventional print and television media, and we witness a series of mass protests and processions. It is a known fact that the opposition party mobilised people, clearly visible in the case of Ramlila Maidan sit-ins of Anna Hazare and Baba Ramdev. Then there were fiery speeches by Leaders of Opposition - Sushma Swaraj and Arun Jaitley - in both houses,  and the government could not defend convincingly the charges thrown by them. Although the appeal of Team Anna should not be underestimated, but the involvement of a cadre-based party broadened the appeal and the reach. 

Second, both AAP and BJP are eating into each other's constituencies. The traditional and most vociferous campaign against the anti-corruption movement was of the middle-class. After the emergence of AAP, the middle-class votes got divided between AAP and BJP. This led to the no clear voting to one party as evident in Delhi Assembly elections, which would have consolidated to one party. The clear gainer of this was Congress which provided outside support to AAP to form the government. This will ensure that they may pull out from the government when it suits them or when they think popular sentiments against themselves have weakened with passage of time. There is an argument that if Congress pulls out, AAP will emerge as a clear winner in Assembly Elections necessitated by that. Let's not forget that elections are a huge burden on the exchequer. Given the kind of alternative politics that AAP champions, this may put them in the same league with parties which forced elections when the confidence motions were defeated by a very narrow margin, in some cases even by one vote.

Third, stability is one of the major reasons to be considered. Looking back at the first one month of the AAP government, their actions have repeatedly raised the doubts over the longevity of this government. This in parts may be attributed to their lack of a majority in the assembly on their own. At the same time, few policies have raised eyebrows. Their scrapping of previous government's decision to allow FDI in retail raised a question whether it was a well-thought move or a compulsion of electoral politics just to appease their voters. Say, if multi-brand retail by the giant Indian corporates do not reduce employment how can the same by MNCs do the same. After all, multi-brand retail by Indian firms is allowed. Their decision to subsidise the power bills pushed power sector reforms to a position where it was five years back. Coming back to the discussion on stability, two parties fighting for the same issue will steal the votes of each other. Reading these doubts in the minds of public, BJP modified the tone of their campaign. Starting with the promise of clean administration and good governance promise, now they have also included the slogans of stability. After all, nobody desires the repeat of the short-lived governments of the late eighties and the late nineties.

To avoid division of anti-corruption votes and to bring stability in Indian politics, AAP and BJP should join hands. Surely that is not going to happen anytime soon. AAP’s performance in Delhi was emphatic but their show in rest of India is yet to be seen. Without a proven record of mass electoral support in rest of India, they do not have the power to set terms or do a hard bargain for the number of seats to contest. Also joining hands with BJP will alienate certain sections of society with AAP and congress will get a chance to attack it. BJP will not do that because they will have to share power when there is a possibility of them emerging as a winner or ending very close to that in coming general elections. Whether their alliance happens after polls is something which will have to be seen. We have examples from the past where political parties shed (or compromised with) their ideological baggage which had been suitably named compulsions of coalition politics.

This proposal was very radical, but that is also how the promises made by AAP can be described. 


अगर भारतीय राजनीति में कोई ऐसा व्यक्ति हुआ है जिसके स्वभाव, भाषण शैली के लोग दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कायल रहे हैं तो एक ही नाम याद आता है - अटल बिहारी वाजपेयी। भारतीय राजनीति के वट वृक्ष के नाम से जाने जाने वाले अटलजी ने अपना पूरा जीवन देश की सेवा में समर्पित कर दिया था। एक राजनैतिक दल को छोटी सी पार्टी से द्विध्रुवीय परिदृश्य में एक मुख्य धुरी के रूप में स्थापित किया और जब समय आया तो उन्होंने देश का नेतृत्व भी किया। नैसर्गिक प्रतिभा के धनी अटलजी की कवितायें और उनके भाषण बहुत जोशीले हुआ करते थे। हालाँकि राजनैतिक जीवन की व्यस्तता में उनका कविता लेखन और कविता पाठ दोनों ही कम हो गया था लेकिन जब भी अवसर मिला उन्होंने सस्वर कविता पाठ किया। ऐसी ही उनकी एक कविता थी, 'एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते, पर स्वतंत्र भारत का मस्तक नहीं झुकेगा', जिसका सस्वर पाठ अविस्मरणीय रहेगा। 

किसी भी परिस्थिति से इतनी आसानी से हार मान लेना उनका स्वभाव नहीं था। उनके जीवन की ऐसी ही एक घटना याद आती है। जब दिल्ली में नया बाँस में नयी म्यूनिसीपल कॉर्पोरेशन बनी थी और उसके उपचुनाव हुए थे तो उसमें अटल जी और आडवाणी जी ने बहुत मेहनत की थी। यह अजमेरी गेट के भाजपा कार्यालय के पास में स्थित था। और इतना काम करने के बाद जब चुनाव के परिणाम आए तो उसमें उनकी पार्टी म्यूनिसीपालिटी का चुनाव भी हार गयी। तो वो ऐसा परेशान हुए, ऐसा दुखी हुए कि उन्होंने कहा कि ये ठीक नहीं हुआ भाई, चलो अब तो हम ग़लत कर आए, चलो कोई पिक्चर देख के आते हैं। पिक्चर देखने का फ़ैसला हुआ तो पास होने के कारण पहाड़गंज में इंपीरीयल थियेटर में बिना पिक्चर का नाम देखे अंदर चले गये। और जब पिक्चर शुरू हुई तो पता चला कि पिक्चर का नाम 'फिर सुबह होगी' है। 'फ्योदोर डॉस्टोव्स्की' के प्रसिद्ध उपन्यास 'क्राइम आंड पनिशमेंट' पर आधारित यह फिल्म अटल जी के जीवन में एक विशेष स्थान रखती है। और बहुत साल बाद सुबह हुई, जब अटल जी का परिश्रम और उनका विश्वास रंग लाया और उन्होने प्रधानमंत्री पद की कुर्सी संभाली। आडवाणी जी ने ये किस्सा तब सुनाया था, जब 1998 में जब सरकार ने शपथ ले ली थी।

संसद में जोशीले और चुटीले अंदाज में उनके भाषण हमेशा याद किए जाएँगे। उनकी वाक्पटुता देखने के लिए सद्स्य संसद भवन में अपना नाश्ता खाना छोड़ के संसद कक्ष में चले जाते थे। उनके कुछ किस्से जो हमेशा याद रहेंगे, उनका जिक्र करता हूँ। पाकिस्तान से दोस्ती के सन्दर्भ में एक बार जब उनसे पूछा गया तो उन्होने कहा, "पडोसी कहते हैं कि एक हाथ से ताली नहीं बज सकती, हम कहते हैं कि चुटकी तो बज सकती है।" एक बार किसी चुनावी रैली में जब उनको फूलों का हार पहनाया गया तो उन्होंने कहा कि, " मैं यहाँ 'हार' नहीं, जीत लेने आया हूँ।" एक बार चर्चा के समय इंदिरा जी ने अटल जी के बारे में कहा कि वो हिटलर की तरह भाषण देते हैं और हाथ लहरा-लहरा कर अपनी बात रखते हैं। हाजिर जवाब अटल जी ने तुरंत कहा, "इंदिरा जी हाथ हिलाकर तो सभी भाषण देते हैं , क्या कभी आपने किसी को पैर हिलाकर भाषण देते हुए सुना है?" ऐसे ही एक बार सदन में चर्चा के समय रामविलास पासवान ने कहा, "ये भाजपा राम राम की बहुत बातें करती है, पर उनमें कोई राम नहीं है, मेरा तो नाम ही राम है।" अटल जी ने तुरंत चुटकी ली, "रामविलास पासवान जी, हराम में भी राम आता है।" यूरिया घोटाले पर बोलते हुए अटल जी ने सरकारी संस्थाओं की भूमिकाओं पर ऊँगली उठाते हुए कहा था, "अगर पहरा देने वाला कुत्ता नहीं भौंकता है, तो यह मान लेना चाहिए कि वह कुत्ता भी चोरी में शामिल है।"

अटल जी का प्रधानमंत्री बनना भी कम रोचक घटना नहीं है। बात भारतीय जनता पार्टी के मुम्बई महाधिवेशन (11-13 नवम्बर, 1995) की है। यह वो समय था जब अडवाणी अयोध्या आंदोलन के फलस्वरूप अपने लोकप्रियता के चरम पर थे। अडवाणी ने अध्यक्षीय अभिभाषण देते हुए कहा, "हम लोग अगला चुनाव श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में लड़ेंगे और वे हमारी पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। पिछले कई सालों से आम जनता कहती आ रही है, 'अगली बारी, अटल बिहारी।' मुझे पूरा भरोसा है कि अगली सरकार अटल जी के नेतृत्व में भाजपा की ही बनेगी।" उसके बाद मंच पर क्या हुआ, इसके लिए कंचन गुप्ता का 'द पायनियर' के लिए लिखा गया कॉलम उद्धृत करना उचित रहेगा -
"एक क्षण के वहाँ स्तब्ध मौन था। उसके बाद पूरा मंच तालियों कि गड़गड़ाहट से गूँज उठा। यह घोषणा अडवाणी के भाषण के अंत में हुई थी। यह सोचा समझा निर्णय नहीं था बल्कि एक भावनात्मक निर्णय था। उन्होंने बाद में मुझे बताया कि यह एक ऐतिहासिक क्षण था और जिसे घोषित करने के लिए वो कई वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे थे..... इसके पहले कि अडवाणी, जिनका भावनाओं में गला रुंध आया था , मंच में अपने स्थान पे पहुँच पाते, वाजपेयी उठे, माइक हाथ में लिया और अपने जाने पहचाने अंदाज में लम्बे अंतराल लेते हुए कहा, "बी जे पी चुनाव जीतेगी, हम सरकार बनाएंगे और अडवाणी जी प्रधानमंत्री बनेंगे।" अडवाणी ने कहा, "घोषणा हो चुकी है।" वाजपेयी ने हँसते हुए कहा, "तो फिर मैं भी घोषणा करता हूँ कि प्रधान मंत्री..... "  अडवाणी बीच में ही बोल उठे ,"अटलजी ही बनेंगे।" वाजपेयी ने कहा, "ये तो लखनवी अंदाज में पहले आप पहले आप हो रहा है।" एक पल के लिए दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा, दो पुराने सहकर्मी और नजदीकी दोस्त, जिन्होंने जन संघ को उसके बनने के बाद से और फिर बी जे पी को पाला पोसा, उनकी आँखों में आँसू आ गए थे। 1996 की ग्रीष्म ऋतु में अडवाणी की घोषणा सच साबित हुई। बी जे पी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसे सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। वाजपेयी को प्रधान मंत्री पद कि शपथ दिलाई गई.… इसके बाद सब इतिहास है। "
बाद में अटलजी ने अडवाणी से कहा भी, "क्या घोषणा कर दी आपने? कम से कम मुझसे तो बात करते।" इस पर अडवाणी ने उनसे कहा, "क्या आप मानते अगर हमने आपसे पूछा होता?" 

अटल बिहारी वाजपेयी
कविता पाठ करते हुए 

जब भी अटलजी के जीवन कि चर्चा की जायेगी तो उसमें पाकिस्तान के साथ की गयी उनकी वार्ता की कोशिशों का ज़िक्र ज़रूर आयेगा। उन्होंने पहली बार दिल्ली-लाहौर बस सेवा के साथ दोस्ती का सन्देश दिया। लेकिन उसके बाद छिड़े कारगिल युद्ध ने सारी कोशिशों पर पानी फेर दिया। अटलजी को यह बात थोडा अखर गयी थी। उन्होंने नवाज़ शरीफ को फ़ोन करके कहा भी था, "मिस्टर प्राइम मिनिस्टर, ये क्या हो रहा है ?" नवाज़ शरीफ ने ऐसी किसी भी घटना की जानकारी होने से मना कर दिया। उसके बाद जो हुआ उससे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत की साख और बढ़ गयी। भारत की नियंत्रण रेखा पार न करने के फैसले को सराहा गया। अटलजी ने एक बार फिर 2001 में कोशिश की थी जब उन्होंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ को वार्ता के लिए आगरा बुलाया था, जिसे आगरा शिखर सम्मलेन के नाम से जाना गया। कुछ कारणों से ये कोशिश भी परवान न चढ़ सकी। अटलजी की एक खास बात थी। वो गम्भीर परिस्थितियों में भी चुटीले संवादों के लिए जाने जाते थे। आगरा शिखर सम्मलेन की विफलता के बाद उन्होंने अडवाणी से कहा था ,"क्या करें। अतिथि भी अपने कर्मों से ही मिलता है।  हमारे कर्म ही ऐसे थे जो हमें ऐसे अतिथि मिले।"

आज अटलजी का स्वस्थ उतना अच्छा नहीं है। वो सक्रिय राजनीति में नहीं हैं। भारत की राजनैतिक क्षेत्र में उनकी कमी खलती है। उनकी कवितायेँ, उनके जोशीले भाषण आज मीडिया में सुनाई नहीं पड़ते, अख़बारों में नहीं छपते। लेकिन भारतीय राजनीति का ज़िक्र उनके बिना सदैव अधूरा रहेगा। 


Swami Vivekananda in Cossipore (Varanasi), 1886
Swami Vivekananda in Cossipore in 1886.
A sannyasin understands no boundaries. No boundaries of land, religion, language or age, for a sannyasin has to live for the humanity and his message is to be heard across all man-made boundaries. Swami Vivekananda was one such sannyasin, who proved to be a prodigy in his childhood. 

In 1890, Narendra started the long journey. He traveled throughout India. He went to Cassipore (later Varanasi), Ayodhya, Agra, Vrindavan and Alwar to name a few places. At Mount Abu, he met Raja Ajit Singh of Khetri who became his supporter and follower. It is believed Raja of Khetri gave him the name Vivekananda. Swami Tathagatananda, a senior monk of the Ramakrishna Order, wrote of their relationship:
"... Vivekananda's friendship with Maharaja Ajit Singh of Khetri was enacted against the backdrop of Khetri, a sanctified town in Northern Rajasthan, characterized by its long heroic history and independent spirit. Destiny brought Swamiji and Ajit Singh together on 4 June 1891 at Mount Abu, where their friendship gradually developed through their mutual interest in significant spiritual and secular topics. The friendship intensified when they travelled to Khetri and it became clear that theirs was the most sacred friendship, that of a Guru and his disciple."
Swamiji traveled India intensively. Swamiji tasted the riches and poor of India. He saw a great social imbalance and menace of casteism. During these wanderings, he came to know that the weak points of the nation were poverty, casteism, neglect of the masses, oppression of women and a faulty system of education. How was India to be regenerated? He came to the conclusion:
"We have to give back to the nation its lost individuality and raise the masses. [. . .] Again, the force to raise them must come from inside." ('Complete Works', vol. VI, p. 255).
In principle, it can be said that four major factors influenced Swamiji's life:
1. India was being ruled by Britain at that time and was undergoing cultural revival. Swamiji said about that "A few hundred, modernized, half-educated, and denationalized men are all that there is to show of modern English India – nothing else" ('Complete Works', vol. VIII, p. 476). He wanted modern education to be given to Indian children.


2. Ramakrishna had a deep influence on him. In Swami Vivekananda’s estimation, his Master fully harmonized the intellectual, emotional, ethical and spiritual elements of a human being and was the role model for the future.


3. Swami Vivekananda’s family also provided a strong moral and cultural foundation to his life. Due in great part to his upbringing, his tastes were eclectic and his interests wide. 
4. Equally important, if not more so, was the Swami’s knowledge of India based on his first-hand experiences acquired during his wanderings throughout the country. These pilgrimages transformed him. (by 'Swami Prabhananda')


See other posts in this series:
  1. Swami Vivekananda's Childhood : The Stories 
  2. Swami Vivekananda's Childhood : With His Guru Ramakrishna Paramahamsa
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