यूँ तो हम बचपन से सुनते आये हैं कि हिमालय एक दुर्गम जगह है जहाँ पर रहना तो छोड़ दीजिये, ऊंचाई पर पहुँच पाना भी मुश्किल है। आये दिन भूस्खलन और पहाड़ी रास्तों पर होने वाली घटनाएं हम सुनते ही रहते हैं, जो कि हिमालय की कठिनाइयों को बयाँ करती हैं। इसी कारण से ये हिमालय पर्वत श्रृंखला भारत के लिए सदियों से एक प्राकृतिक सीमा का काम करती रही है। पहाड़ी रास्तों पर पत्थरों के गिरने का डर, नीचे गहरी खाईं में गिरने का डर, उफनाती बलखाती नदी में समा जाने का डर, अत्यधिक शीतल हवाओं का डर, बर्फ की एक मोटी परत, जो हफ़्तों घर से बाहर निकलने से रोक दे उसका डर आदि कितने सारे डर हिमालय के साथ जोड़ दिए जाते हैं। जितनी ऊंचाई बढती जाये डर उतना ही बढ़ता जाये। लेकिन आज हम इन डरों की बात नहीं करेंगे। 

आज हम इन सबसे इतर एक दूसरे ही डर की बात करेंगे। हिमालय की वादियों में खो जाने का डर। एक बार पहाड़ों में जाने और फिर वहीं के हो जाने का डर। सर्पीली पगडंडियों पर बस चलते चले जाने का डर। आँख बंद करके पहाड़ी के शिखर पर पहुँच जाने का डर। विहंगम दृश्य के आगे सांसें रोक लेने का डर। नदी के साथ घुलमिल जाने का डर। चीड़ देवदार के जंगलों को अपना आश्रय बना लेने का डर। हर बार इन पहाड़ों के सान्निध्य में आकर ऐसा लगता है कि कोई चीज तो ऐसी है इन पहाड़ों में जो कि यहाँ आने पर मजबूर करती है और एक विशेष आनंद से भर देती है। यहाँ पर किसी पहाड़ी की फुनगी पर बने मंदिर में किसी योगी को धूनी रमाये देख लीजियेगा तो आश्चर्य न कीजियेगा। यहाँ की हवाओं में कुछ बात है ही ऐसी जो कि सब कुछ छोड़कर बस अपनी धुन में लग जाने के लिए आमंत्रित करती है। जो इस आमंत्रण का प्रतिरोध न कर पाए वो आज खुद में मगन यहाँ प्रकृति के पास रह रहे हैं।

दूर किसी पहाड़ी की चोटी को चूमते हुए बादलों को देखकर मन में बस एक ही ख्याल आता है कि किस तरह इन बादलों के बीच पहुंचा जाये। यूँ तो पहाड़ों के बीच में कभी कभी कुछ बादल हमेशा आपको मिल जायेंगे जो कि ऐसे लगते हैं जैसे लम्बी यात्रा के बाद कुशलक्षेम पूछने के लिए उतर आये हों और कभी कभी ये राह भटके हुए बादल चेहरे के पास से ऐसे गुजरते हैं मानो ये हमसे भटके हुए सफ़र का रास्ता पूछ रहे हों। लेकिन भटके हुए इस बादल से भी मुझे बहुत सहानुभूति होती है। हर सफ़र की मंजिल थोड़े ही होती है। यकीन न मानियेगा तो ओस की उन बूंदों से पूछ लीजियेगा जो पूरी रात सितारों को बस निहारते हुए ही बिता देती हैं। 

मन कहता है कि घाटी में बहती नदी के उतार चढ़ाव से तालमेल बिठाया जाये, धारा के साथ बहा जाये। जाने कितने पहाड़ी गाँवों की कहानियां लिए ये कलकल करती नदी बहती जाती है। मन तो कहता है कि घाटी में नीचे उतारकर मैं नदी के किनारे बैठकर उसकी कहानियां सुनूँ, अपनी सुनाऊँ और उसके साथ गुनगुनाऊँ। ठंडी ठंडी हवायें, जो एक अलग ही ताजगी का अहसास कराती हैं, पत्तियों के बीच से सरसराहट करते हुए निकलती हैं और पहाड़ों की ढाल पर पेड़ों के बीच जीवन्तता का एक मात्र प्रतीक होती हैं। हवा धीरे धीरे मंद पड़ जाती है और दूर दूर जाते उसकी आवाज़ कहीं खो सी जाती है, लेकिन उसकी तरोताजगी आज भी चेहरे पे महसूस की जा सकती है और मन के किसी कोने में उसकी प्रतिध्वनि आज भी सुनी जा सकती है।
  
आप मुझे अतिशयोक्ति अलंकार का मनचाहा प्रयोग करने के लिए दोष दे सकते हैं लेकिन ऐसे माहौल में आकर अगर मन बहक जाये तो उसकी भी कोई खता नहीं मानी जाएगी। मुझे नहीं मालूम कि इन नीली पहाड़ियों में, एक दूसरे के कान में फुसफुसाते हुए पेड़ों में, अनवरत बहती चली जाने वाली नदियों में, भीड़ से अलग छोटे छोटे कुटीरों में, ठंडी हवाओं में, छोटे छोटे सीढ़ीनुमा खेतों में, नीले सफ़ेद जंगली फूलों में ऐसा क्या है जो मैं इनकी तरफ ऐसा लगाव अनुभव करता हूँ लेकिन ये डर जरुर लगता है कहीं मैं और हिमालय एक दूसरे को अपना न लें। और ये डर भी ऊंचाई के साथ बढ़ता ही जाता है। हिमालय में जितना ऊंचाई पर जाता हूँ हिमालय में ही रम जाने का उतना ही डर लगता है।

मन तो कहता है कि बस यहीं रह जाया जाये। लेकिन यथार्थ फिर से धरातल पर खींच लाता है। मन और यथार्थ के बीच संघर्ष ऐसे ही चलता रहता है और जीत हर बार यथार्थ की ही होती है, लेकिन मुझे लगता है कि एक न एक दिन मन की जीत अवश्य होगी। मेरा मन उस डर के सामने सीना तानकर खड़ा होना नहीं चाहता है बल्कि समर्पण करना चाहता है। हिमालय का वह डर भी सामान्य नहीं है। संसार को खो देने और स्वयं को पा लेने का डर।

बरोट में उहल नदी
बरोट में उहल नदी 


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