तुम्हें साहित्य लिखना है न
तो तुम सबसे पहले मौन लिखो।
इतना मौन
कि जहाँ तुम सुन सको काल-चक्र की धड़कनें
और गिन सको साँसें
महसूस कर सको
संसार को अपने आप में,
जहाँ छू सको देश और काल की धुरियों को,
और विचरण करो
विचारों के निर्वात में,
वो निर्वात
जो आँधियों को अपनी तरफ खींचता है,
जहाँ जान सको
संसार में अपनी ठीक-ठीक स्थिति,
जहाँ तुम शून्य में गिरो
और तुम्हारे गिरने की कोई आवाज न हो,
तुम्हारे गिरने पर काल का अट्टहास हो
जिसे तुम्हें छोड़कर कोई भी न सुन सके,
उतने मौन में
जितने में होने और न होने की सीमाओं का लोप हो जाये
और तुम बौखला उठो,
और यह सोचो
कि आसपास घटित होने वाली कौन-सी घटना
पक्का-पक्का यकीन दिला सकती है
कि तुम हो,
मौन इतना हो
कि तुम्हें कुछ सुनाई न दे
अंतरिक्ष की रिक्तता की तरह
जहाँ आवाजें नहीं होती हैं,
लेकिन होता है प्रकाश
जिसे आँख मूँदकर भी पाया जा सके,
सन्नाटे के शोर में अनुभव करो
कि धरती का घूमना रुक गया है,
आसमान नाम की कोई वस्तु वैसे भी नहीं है,
दुनिया तुमको देख रही है,
सड़क घाटी से ऊपर आ चुकी है,
शरीर में पांच तत्व होते हैं,
Orion समंदर से नहाकर निकल रहा है,
यादें मष्तिष्क की कल्पना हैं,
खिड़की से लाल रौशनी तुम्हारे पास आ रही है,
काफिला रेगिस्तान में पानी से बहुत दूर है।
लहरों का बुलावा जानलेवा था
मेरी अपनी समझ कुछ कच्ची थी
अगर मैं सब कुछ जान लेता
तो भी मैं क्या करता,
दुनिया की परतें अंजान थीं
अंजान का आकर्षण था
दुनिया को अपने से अलग कर पाता
तो शायद लहरों को सही-सही देख पाता,
सारी लहरें किनारे आकर पत्थर से नहीं टकराती
कुछ बीच समन्दर में ही दम तोड़ देती हैं
किनारे पर बैठकर देखता हूँ
सफ़ेद झाग कहीं-कहीं समन्दर में
फैलते हैं बिना किसी पैटर्न के,
लहरें हवा की बात मानकर
किनारे की तरफ़ बढ़ती हैं
पत्थरों से उनकी टक्कर भयावह थी,
लहरों का बुलावा जानलेवा था।
हवा की गूँज कर्कश थी
(सिर्फ़ मेरे मानने से
हवा कर्कश हो जायेगी?
विशेषण सापेक्ष हो सकते हैं)
तट पर फैले हुये झोपड़ियों के झुण्ड में से
पीले तिरपाल से ढकी हुयी
एक नारियल की दुकान है
और कातर दृष्टि से देखती हुयी
उसकी बूढ़ी मालकिन
खोजती है झोपड़ी में रस्सियों को,
उसमें मृत्यु का, परलोक का कोई भय नहीं था,
भय था मात्र आज का, कल का,
हवा को भी वहाँ नहीं टिकना है
क्षणिक विजय लेकर आगे बढ़ना था,
और उस पुरानी झोपड़ी में
ढेर सारा जीवन भरा था
जीवन की साँस के लिये
हवा का हर एक झोंका ठोकर था,
लहरों का बुलावा जानलेवा था।
समन्दर की गहराई में भी खिंचाव था
('जिन खोजा तिन पाईयाँ' मुझे सिखाया गया है)
और उतरना समन्दर में
चट्टानों की बनी हुई सीढ़ियों से
और फिर खो देना सीढ़ियों को
सीढ़ियाँ थीं?
नहीं;
उतर जाना आसान था
इसीलिये मान लिया गया था,
और गहराई में खोजना फिर वही जीवन
जिसको त्याग दिया गया था
लेकिन जिससे मन अभी भरा नहीं था
खोजना फिर वही साँसों के कारण
निकलने वाले बुलबुले,
होना क्या था
और हो जाना क्या
यह हमें अभी तक ज्ञात नहीं था,
और हम खोजने निकले थे गहराइयाँ,
खोजने निकले थे वो
जिसे हम अपने ज्ञान से
ज्ञात श्रेणियों में बाँट सकें,
जो नया था उससे अनभिज्ञ ही रहना था,
होना सत्य है,
हो जाना लेप है? सचमुच?
गहराई का सन्नाटा निर्मम था,
लहरों का बुलावा जानलेवा था।
सूरज बहुत साधारण था,
बादलों से लड़कर शायद परेशान हो गया था
या कोई और गम्भीर वजह थी शायद?
अब, जबकि यह जान लिया गया है
कि सूरज नहीं है संसार के केंद्र में
और है मात्र एक औसत तारा,
रोज़ सुबह आना
और रोज़ शाम को जाना
नहीं है सूरज के नियंत्रण में,
या प्रार्थनायें पृथ्वी पर समृद्धि के लिये
नहीं सुनता है सूरज,
तो सूरज खो देता है
अपने सभी मानी
जो भी इसने बना रखे हैं रोज़ आने-जाने के,
नहीं, उद्दयेश्य की लड़ाइयाँ नहीं लड़ी जाती ऐसे
आरोपित कर दिये गये मानी
नहीं बता सकते हैं सत्य क्या है?
सत्य बदला जा सकता है?
सत्य काल पर निर्भर है?
आज जो सत्य है, कल भी रहेगा?
सवालों के बोझ से दबी हूयी
सूरज की किरणें थकी-हारी थीं,
लहरों का बुलावा जानलेवा था।
रेत की पकड़ ढीली थी
समन्दर पूरे उफान पर था
हवा ज़ोर-शोर से बह रही थी
और बह रहे थे एक-एक करके
रेत के बनाए महल
फिसल रही थी रेत धरती की मुट्ठी से
जैसे फिसलता है समय वर्तमान से,
पराजय?
पराजय नहीं है ये
क्षणिक युद्धविराम है
और क्षण हैं जिसके सदियों जैसे लम्बे,
उस क्षण में सिमटी हैं रेत आज बलहीन
युद्ध के मैदान में युद्ध के बाद की
क्षत -विक्षत अवस्था में,
लेकिन एक दिन
समन्दर में कुचली हुयी रेत उठ खड़ी होगी
टापू समन्दर के बीचों-बीच फिर खड़े होंगे
जय-पराजय फिर से नये परिभाषित होंगे
और समय हँस उठेगा
उस एक क्षणिक विजय पर भी
तब तक देखना है यही,
रेत की अवस्था दयनीय थी,
लहरों का बुलावा जानलेवा था।
रात की चमक फीकी थी
चाँद की चाल थकी सी थी
चमकीली लहरों को निहारना
जहाँ लहजा भी कुछ अनमना था,
और जबकि यह मालूम था
कि आज गर्व करने लायक जो कुछ भी है
(या घमण्ड करने लायक,
लड़ने के लायक)
सब समन्दर का ही दिया है
मोती, पानी, भोजन, वैभव
और यह भी कहा गया है
कि जीवन की उत्पत्ति भी समन्दर से ही हुयी है;
यह मालूम होने के बाद भी
यह लगता था
कि समन्दर बस क्षय कर सकता है,
आओ, समन्दर फिर से देखते हैं
ये लहरें किसी दूर देश की प्रतिनिधि हैं
जो लाती हैं अक्षुण्ण रहस्य
और विलीन हो जाती हैं;
संदेशवाहक किसी नयी दुनिया के?
हम भी स्थायी नहीं हैं,
संदेशवाहक प्रकृति के?
गर्व करने लायक हर एक बात
याद करके ढीली छोड़ दी गयी
रात बहुत निष्ठुर थी,
लहरों का बुलावा जानलेवा था।
लहरों का बुलावा जानलेवा था
समन्दर के पार की दुनिया बहुत चमकीली थी
(चकाचौंध से खींचने वाली चमक)
तूफ़ानों के किससे बहुत भयावह थे
तलहटी में दूबे हुये जहाज़
दुस्साहस के उदाहरण थे,
जीवन रेत पर बैठा हुआ था
पानी में पैर भिगोये हुये
क्या देख सकता था?
रंग-बिरंगी सीपियाँ,
कहीं-कहीं बिखरे थे मोती,
काल के किसी कोने में गिरे होंगे
जीवन का इंतज़ार करते होंगे,
सोच सकने वाली हर एक बात
कही-सुनी जा चुकी होगी
हिदायतें जितनी भी इतिहास दे सकता है
जीवन ने पढ़ ही ली होंगी,
जीवन को मोती खोजने जाना ही पड़ेगा
और देखना होगा
पानी में डूबे पत्थर के क़िलों को
जिनमें चस्पा हैं समय के अट्टहास,
जीवन समय से आगे निकल चुका है
जीवन समय से पिछड़ गया है,
जीवन समय के साथ क़दम-ताल मिला रहा है,
सब कहीं न कहीं सच हैं
(अज्ञानता बहुत आकर्षक थी)
लहरों का बुलावा जानलेवा था।
ऊपर तुम
रात में चाँद को अपने सिर पर ओढ़े हुये
और झरनों के उदगम को
इतिहास की उठापटक को
सीने में दबाये हुये
बर्फ़ की मोटी चादर में
धरती के रहस्य छिपाये हुये,
ऊपर तुम
जहाँ बादल आकर सुस्ताते हैं
जहाँ अभी सूरज को जाकर
तैय्यार होना है कल के लिये।
नीचे हम
खाने के बर्तन खनखनाते हुये
वॉलीबॉल के खेल में ख़ुद को उलझाते हुये
दूर प्रदेशों की यादों में पहचान पाते हुये,
लेकर अपनी मानवता का भार
हम, तुम पर विजय प्राप्त करने की मंशा लिये हुये।
(धानद्रास, रूपिन घाटी में अज्ञेय की कविता 'नन्दा देवी' पढ़ते हुये)
मुझे याद है
सबकी आँखों का भाव-विभोर होना,
घुँघरुओं की गूँज
तुम्हारे पैरों का ताल में उठना-बैठना
और थाम लेना कई धड़कनें,
तुम्हें याद है
तुम्हारे पैरों का थककर जवाब दे देना।
मुझे याद है
तुम्हारी ख़ुशी, जो तुमने ओढ़ी हुई थी
और मिलने का अन्दाज़
क़ाबू किये हुये जज़्बात,
शाम का मिलना रात से
और रात का जुदा होना सुबह से,
तुम्हें याद है
सावन के वो सारे अकेले दिन।
मुझे याद है
लौ का उजाला
और ठिठकना रौशनी का
यूँ तुम्हारे चेहरे के ठीक सामने
सम्भलना समय की सीख से
और समाप्त हो जाना अंधेरे के सामने,
तुम्हें याद है
बाती आगे निकालते हुये
गरम तेल में हाथ जला लेना।
मुझे याद है
शोर का शांत होना,
तुम्हें याद है
जलकर राख हो जाना।
"इधर कुछ दिनों से सूरज नहीं निकला है
मैं बेचैन हो गया हूँ
ताज़्ज़ुब इस बात का है
किसी को इस बात से फ़र्क़ नहीं पड़ता है,
सूरज?
अरे नहीं! Satellite से देखा गया है
मौसम विभाग ने बताया है
आसमान साफ़ हो जायेगा कुछ दिनों में
अजीब लोग हैं
सूरज देखने के लिये नहीं उठते हैं,
ख़ैर छोड़ो, तुम अपने शहर का मौसम बताना।"
"हवा उस दिन भी बहुत तेज थी
हर तरफ़ उड़ रहे थे काग़ज ही काग़ज
और लोगों की भीड़ दौड़ती थी
कागज़ों को पकड़ने के लिये
कभी बादल का आँसू कोई गिर उठता
तो काग़ज नम होकर वहीं बैठ जाता
दफ़्न होने के इंतज़ार में
हवा रगड़ खाती थी शब्दों से
और पूरा माहौल गरम हो उठता था
उबलने लगती थी यथास्थिति,
उस दौर की बातें भी अब विश्वसनीय नहीं हैं
मैं अब कागज़ों के पीछे दौड़ने लायक उम्र में नहीं रहा हूँ
एक खाली पार्क की बेन्च पर बैठकर
कई दशक पहले की बात लिख रहा हूँ
अब मुझे डर है
कि विद्रोह नहीं कर पाउँगा।"
"ज्यादा कुछ लिखने के लिये नहीं है
इतना जान लो
कि कुछ लिखने के लिये न होते हुये भी
एक खाली पोस्टकार्ड
तुम्हारे पते पर भेज रहा हूँ,
परम्परायें बाँध देती हैं, तुमने कहा था
लो, मैं एक नयी परम्परा खड़ी करता हूँ
बँधना या न बँधना
तुम्हारा फैसला है।
(बाहर बर्फ़ गिरने लगी है
जिस घर में मैंने शरण ली है
वहाँ मेरे पास करने के लिये कुछ नहीं है
सोचा तुम्हारे लिये एक ख़त लिखूँ।)"
"पहले लकड़ी की शाखायें काटी जाती हैं
हरी होती हैं
फिर सूखकर धीरे-धीरे सख़्त हो जाती हैं
फिर उनमें आग लगाई जाती है
बहुत आँच उठती है
चारों ओर खड़े लोगों के
चेहरे साफ़ देखे जा सकते हैं,
सुबह वहाँ बस राख का एक ढेर था,
जिसे दोपहर तक
किसी एक गड्ढे में फेंक दिया गया था;
मैंने ज़िंदगी को
इसी ढाँचे में रखकर देखा था,
तुम अपने आग वाले पड़ाव के बारे में लिखना।"
"ख़त लिखने से पहले
बहुत कुछ याद करना चाहता हूँ
और जब इस बारे में सोचता हूँ
तो यह लगता है
कि ‘याद' सिर्फ़ वही होता है
जिस पर हमने बात की थी कभी
या जो बात करने लायक घटनायें थीं,
‘याद' सिर्फ़ उसे ही कहा जा सकता है
जो घटनायें हमने साझा की थी,
ऐसी बहुत सी चीज़ें थीं
जो हमने अलग-अलग जिया था
उसे मैं यादों के रूप में तो नहीं लिख सकता
उसे कुछ और नाम दूँ -
अनुभव, घटना या कल्पना,
या फिर ऐसी यादें ही कह दी जायें
जो दहलीज़ के पार नहीं जा पायीं।"
"तालाब के किनारे एक बड़े मैदान में
पतंग उड़ाने जाता हूँ
कल शाम को क्षितिज के आसपास
चाँद बैठा था,
मैंने पतंग के कोनों से उसे खुरच दिया था,
और आज
पतंग समेटते समय
चाँद भी उसी में फँसकर चला आया था
उसे मैंने खिड़की पर सजाकर रख दिया है
और उसकी रोशनी में ये ख़त लिखा है
तुम्हारी पतंग क्या लेकर आती है
तुम इस बारे में लिखना।"
"तुमने ख़त में बहुत कुछ लिखा था
और मैंने वो सब समझा था,
दर्शन, राजनीति, संसार सब
ज़िंदगी से तुम्हारा सामना
लेकिन ऐसा बहुत कुछ था
जो नहीं लिखा गया था
लेकिन मैं तुम्हारी लिखावट से
अन्दाज़ लगा रहा हूँ
अक्षर सही नहीं बैठ रहे हैं
जैसे कोई आपाधापी हो,
अगर कोई बात हो तो अगले ख़त में लिखना।"
"तुमने लिखा था
कि साहित्य वही अच्छा लगता है
जो जिये जा रहे जीवन से दूर होता है
जिसमें होता है एक खिंचाव
उस काल्पनिक जीवन की तरफ़
जिसको न पा सकने की स्थिति में
खिंचाव बढ़ता ही चला जाता है
और एक दिन इतना दूर हो जाता है
कि उसे हम आदर्श मान लेते हैं;
किसी विचार का पहुँच से दूर होना
आदर्श होने के पहली कसौटी है;
मैंने इस बात पर सोचा है
और यह पाया इसका उल्टा भी सच हो सकता है
कि साहित्य जिये जा रहे जीवन से
दूर भी कर सकता है।
जीवन जैसे जीना है
जीवन जैसे जिया जा रहा है-
दोनों में एक schism है।"
"बहुत मुमकिन है
कि यह ख़त तुम तक न पहुँचे
लेकिन इसका यह मतलब नहीं
कि ख़त लिखा ही न जाये
हो सकता है कि अभी तक
खतों की पंक्तियाँ
काली स्याही से पोतकर छिपा दी जाती हों
ख़तों को खोलकर पढ़ा जाता हो,
उनको गंतव्य तक भेजने के पहले
यह भी हो सकता है
कि अतिसंवेदनशील मानकर
ख़त को वहीं नष्ट कर दिया जाता हो
फिर भी हम ख़त लिखा करेंगे
(विरोध के लिये ख़ाली ख़त भी)
क्रांति की आग में लकड़ियाँ डालना है
ख़त लिखना होगा।"
"और तुम ख़त में लिखो
साधारण सी बातें, मैं पढ़ूँगा,
तुम लिखो चढ़ी हुई साँसों के साथ
क़दमताल करती हुयी तेज़ धड़कनें,
बारिश के बाद धुली हुयी सड़कें
शांत हो गए पेड़
सड़क पर बिछे हुये
पीली रोशनी में चमकते हुये
अमलतास के पीले फूल
लगता है जिन्हें कोई सड़क पर सजाकर छिप गया हो,
तुम लिखो ज़िन्दगी पर कोई उद्दंड नज़्म,
किसी पगडण्डी की कोई खोई मंज़िल,
सभ्यता की दो धारायें फाँदता हुआ कोई जर्जर पुल,
गेहूँ के खेत में खिले हुये सरसों के पीले फूल,
रेसनिक-हैलीडे के लेक्चर,
कच्ची उम्र के कच्चे क़सीदे,
Led Zeppelin IV के सुरों की समीक्षा,
सूर्य-ग्रहण जो ताज़्ज़ुब से देखा गया था कभी,
तुम लिखो पागलपन, आवारागर्दी,
ग़ैर-ज़िम्मेदाराना हरकतें,
यह यक़ीन दिलाया जा सकता है
कि इतिहास के दस्तावेज़ों में
इन ख़तों का कहीं कोई उल्लेख नहीं होगा।"
भीड़ से मैं रोज़ाना गुज़रता हूँ
और भीड़ में एकदम साधारण चेहरे देखता हूँ
और उनमें खोजता हूँ
धरती, आसमान, दौर, दूरी,
सपने, नींद, रतजगे,
भूख, आराम, धूल, धूप
और ये औसत चेहरे हर जगह हैं;
ठेले पर मक्खियाँ हटाता हुआ एक जलेबी बेंचने वाला,
एक हाथ में नोटों की गड्डी सम्भालता हुआ
और दूसरे हाथ से पेट्रोल भरता हुआ,
बस की भीड़ में अपनी जेबें बचाता हुआ,
तीन रुपये की कलम बेंचता हुआ,
पीला हेल्मेट पहनकर इमारतें बनाता हुआ,
फ़ाइलों के ढेर में डूबा हुआ,
ऑफ़िस में सोता हुआ,
समुद्रतट पर ‘रोमैंटिक वाक' खोजता हुआ,
पार्टियों की शान बनकर रहने वाला,
मोटर साइकल आगे वाले पहिये पर रोककर दिखाता हुआ,
टी वी पर समाचार देखकर चिंतित होता हुआ,
भविष्य को देख लेने का भरोसा देता हुआ,
मंच से समस्याओं का निवारण देता हुआ,
हर एक औसत चेहरा
एक तरह से औसत ज़िंदगी जीता है,
औसत चेहरों के समुद्र में
डूबता रहता है
उतराता रहता है
जब तक साँस ज़िन्दा है तब तक,
समर्पण के पहले तक
घसीटती रहती हैं जिंदगियाँ चेतना को
समय के समक्ष
आत्म-समर्पण कर देने के ठीक पहले तक।
एक सुबह हमें बैठना है
बारिश में नीम के पेड़ के नीचे
और देखना है सूरज को रोककर रखे हुये बादलों को झूमते हुये
घोंसले से झाँकती हुयी एक गौरय्या को,
हमें उठना है और चल देना है
वहाँ जहाँ मिलते हैं धरती और आसमान
जहाँ टाँगा जाता है इंद्रधनुष
जहाँ से उठते हैं पक्षियों के झुण्ड।
एक दिन हमें बैठना है
किसी पहाड़ की ढलान पर
जहाँ बिछी हैं किसी पेड़ की
सींक जैसी पत्तियाँ,
और पिछली यात्रा के स्थान
खोजने हैं पहाड़ियों में
सोचना है कि कितनी राहें चली जा चुकी हैं
और कितनी बाक़ी हैं,
कितनी धारायें पार की जा चुकी हैं।
एक साँझ को सीपियाँ बटोरनी हैं
समुद्र के किनारे बैठकर
गिननी हैं लहरें
करना है विदा सूरज को
जैसे हम विदा करते हैं किसी प्रिय को
यह जानते हुये की अलगाव क्षणिक है
हमें मिलना ही है
और याद कर लेनी है
बीते हुये कल की दुनिया।
एक रात हमें देखना है
गिरते हुये एक पहाड़ी झरने को
जिसका दूधिया रंग चमकता है
रात के उजाले में
जैसे आसमान से उतरती हैं परियाँ,
हमें सुनना है झरने का गिरना
और व्यथित पानी का बेबस चले जाना,
कुरेदना है पानी की यादों को
और फिर छिप जाना है अपने बसेरे में।
जितने भी परमाणुओं का प्रयोग हुआ है
उतने में
कुछ और भी उतने ही आसानी से बनाया जा सकता था
उन्हीं परमाणुओं के एक बहुत छोटे से समूह से
बनी हुयी हैं सारी इकाइयाँ
समस्त ब्रह्माण्ड की तुम भी
बस एक छोटी-सी इकाई मात्र हो।
'Free Will' का अस्तित्व है भी क्या?
ये जाना जा चुका है
कि शरीर की समस्त क्रियायें
रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा नियंत्रित की जाती हैं
यानी जिस समय हमें लगता है
कि हम स्वतंत्र रूप से सोच-विचार कर सकते हैं
उस समय भी कुछ रासायनिक प्रक्रियायें
हमें ठीक वैसा ही सोचने के लिये प्रयासरत होती हैं,
यह असहज करने वाला ख़याल है।
व्याख्यायें बहुत हैं
जिसने ब्रह्म को जिस तरह से देखा
उसने उसकी उसी तरह से व्याख्या की
ब्रह्म सबकी व्याख्याओं से दूर रहा
व्याख्याओं से सत्य नहीं बदलता
सत्य नाम से परे है
लेकिन नाम दिये बिना
सत्य बताया नहीं जा सकता
क्या इसीलिये सत्य जाना नहीं जा सकता?
सत्य जानने के पहले
स्वयं सत्य की परिभाषा लिखनी पड़ेगी
उसके बाद ही किसी घटना को
'सत्य' के विशेषण से नवाज़ा जा सकेगा।
बिखरी हुयी हैं galaxies
पसरा हुआ है space
और फैला हुआ है time
जैसा हमें दिखता है संसार आज
वो परिवर्तन है
वरना विज्ञान मानता है
कि समय की शुरुआत में
सब एक था
उससे पहले के समय की कल्पना बेतुकी है।
विज्ञान यह भी मानता है
कि जीवन का एक ही स्रोत है
सभी जीवों का जीवन एक ही प्रक्रिया का परिणाम है
और उनमें अंतर
विभिन्न अवस्थाओं के परिणाम हैं
(वैसे तो और भी सिद्धांत हैं
लेकिन इसे लगभग मान ही लिया गया है)
और इस तरह से
जीवन की उत्पत्ति
एक अनियंत्रित, अनियमित घटना थी।
रेल की पटरियों की तरह
जीवन जाता है घने जंगलों में
और फिर से निकल आता है उसी तरह
जंगल के दूसरी तरफ़ से
बिना किसी बदलाव के;
जीवन की कोशिश यही है
कि स्थापित हो जाया जाये
और बदलाव सिर्फ़ बाहरी हों?
रात के दिये
जानते हैं अंधकार का स्थायित्व,
विशालतम तारों से निकलने वाला प्रकाश भी
अंतरिक्ष के अंधकार पर
विजय प्राप्त नहीं कर सकता
जब तक किसी पिण्ड से टकरा नहीं जाये,
मानी तब तक मानी नहीं हैं
जब तक कोई उनमें ख़ुद को खोज न ले,
स्वतंत्र रचना
स्वतंत्र रचनाकार
क्या मात्र भ्रम हैं?
सर्द दिन की किसी दोपहर
जब माहौल सुबह-सा होगा
तब सुनहरी धूप के लिये तरसते हुये
यह ख़याल आना चाहिये
कि सूरज निर्बाध गति से
काटता है चक्कर galaxy के केंद्र के चारों ओर,
वैसे ही चमकता है,
वैसे ही चलती हैं सौर आँधियाँ
ब्रह्म के अनुपात के आगे
ये मौसम, ये दिन-रात, सुबह-शाम
सब hyperlocalized घटनायें हैं।
समय चक्रीय है
रास्ते गोल-गोल घूमते हैं
सबसे बड़ी उपलब्धि यह है
कि जहाँ से शुरुआत हो
वहीं अंत के लिए वापस आ जाना
बिना क्षय के,
और यात्रा के बारे में सोचना;
प्रकृति में सबको
यह उपलब्धि हासिल नहीं है,
समय को भी नहीं, सूरज को भी नहीं।
एक सादे काग़ज़ पर
बनाते हैं कुछ आड़ी-तिरछी लकीरें
और फिर दे देते हैं उन्हें कुछ मानी
अलग-अलग लोगों के मानी भी
अलग हो सकते हैं;
क्या जीवन भी कुछ ऐसे ही नहीं है?
सबने जीवन को
अपने-अपने मानी दे दिये हैं
क्या सिर्फ़ तुलना करके जाना जा सकता है
कि कौन सा मानी सम्पूर्ण है?
क्या अपने दिये हुये मानी से
संतोष किया जा सकता है?
मनुष्य और प्रकृति में
तालमेल भी है, प्रतियोगिता भी,
किसको प्राथमिकता है
इस बात पर अभी तक
एकमत नहीं हो पाया गया है
मनुष्य भी तो एक तरह से प्रकृति का भाग है
तो क्या यह कहा जा सकता है
कि जो मनुष्य कर रहा है
वह प्रकृति कर रही है?
दी हुयी परिभाषा
और स्वयं खोजी गयी परिभाषा में
कौन उत्तम है
यह जानने का मापक क्या हो सकता है?
(हरमन हेस के सिद्धार्थ ने इनमें से दूसरा रास्ता चुना था)
जब तक परिभाषा खोज न ली जाये
क्या तब तक जीवन जीने का इंतज़ार किया जाये?
जीवन का यूँ तो कोई प्रत्यक्ष मानी नहीं है
और यह बात सालती रही है
मनुष्य जाति को युगों से,
धर्म, दर्शन, विज्ञान, बोली, भाषा,
कविता, त्योहार, बाज़ार, भोग,
ये सब जीवन को तर्कसंगत मानी देने की कोशिशों का ही परिणाम हैं
इतना सब होने के बाद भी
यह नहीं कहा जा सकता
कि जीवन को परिभाषित कर देना
पहले से आसान हो गया है।
और लगभग तभी से
प्रयास जारी है यह जानने के लिये भी
कि मनुष्य की ब्रह्माण्ड में स्थिति क्या है,
उपनिषद में कहा गया है
'तत्त्वमसि'
अर्थात 'तुम' 'वह' हो
और इसकी व्याख्यायें भी अनेक की गयी हैं :
आत्म ब्रह्म है, ब्रह्म आत्म है;
आत्म को जान लेना ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेना है;
आत्म ब्रह्म की एक इकाई मात्र है;
आत्म ब्रह्म की एक अवस्था है;
इत्यादि,
पर उससे पहले यह जानना पड़ेगा
कि 'तत्' क्या है, 'त्वम' क्या है;
'अस्ति' के मायने क्या हैं?
physical presence या consciousness?
गौतम बुद्ध सिखाते थे स्वयं को त्याग देना
मतलब आत्म की उपस्थिति ही
सांसारिक दुखों का कारण है
इस तरह से
बुद्ध मानते थे
कि 'तत्' को 'त्वम' से जोड़ देने में
उस 'आत्म' के जीवन में
दुखों का प्रवेश हो जायेगा,
'तत्' के समक्ष 'मम' की उपस्थिति कैसी है
इस बात पर अभी विवाद है।
जितना लड़ना है इसलिये
कि कोई कारण लड़ने योग्य है
उतना तो लड़ना है ही
उससे थोड़ा ज़्यादा इसलिये लड़ना है
कि अहम् की संतुष्टि हो।
जितना जूझना है
ताकि जूझने से मुक्ति मिल जाये
उतना तो जूझना है ही
थोड़ा उसके बाद भी जूझना है
जूझने में मज़ा आ गया है।
जितना उतरना है नदी में
ख़ुद को भिगोने के लिये
उतना तो उतरना है ही
थोड़ा उसके बाद भी उतरना होगा
गहराई का अंत जानने के लिये।
जितना देखा गया है
और सहेज लिया गया है
उतना तो चित्र बनाना है ही
जो अभी अदृश्य है
उसकी भी रचना करनी होगी
ताकि भविष्य उसमें से
अपनी राह खोज सके।
जितना ख़ुद से दूर जाया जा सकता है
उतना चले जाने के बाद भी
ख़ुद से और दूर जाने की
सम्भावना बनी रहेगी,
और दूर कोनों में बैठे हैं
मेरे अलग-अलग रूप,
जो खींचते हैं जीवन को अलग-अलग दिशाओं में
पूरा जीवन जीने के बाद भी
इनमें से किसी रूप के अनुसार
जीवन जीना बचा रहेगा।
1.
समुद्री लहर का एक टुकड़ा
तट से कुछ दूर नाचता था
एक ऐसी धुन में
जिसे तट पर अकेले बैठकर ही सुना जा सकता था
और गिरता उठता था अपनी ही जगह पर,
सूरज की एक किरण
कई क्षण पहले चली थी अपने स्रोत से
और अपना ध्येय निश्चित कर लिया था,
अंतरिक्ष के किसी कोने से चलकर
उसे मिलना है किसी से,
एक क्षण भर के लिये बस
वो लहर और किरण मिले थे
और चमक उठा था
स्पेस और टाइम का वह कोना
अगले क्षण सब कुछ था
लेकिन ऐसा बहुत कुछ था
जो कि नहीं था।
2.
गरम लाल सूरज
डूबता है समुद्र में
और करता है संघर्ष जाने के पहले
लेकिन गहरी उच्छ्वास छोड़कर बुझ जाता है,
संघर्ष के अवशेष में बची हैं चिंगारियाँ,
कुछ चिंगारियाँ तारों के रूप में
आसमान में टँगी हैं
और कुछ चिंगारियाँ तैरती हैं समुद्र में
मछुआरों के लैम्प में।
ढोता है अपनी पीठ पर
अपने से कई गुना ज़्यादा बड़ी एक घण्टी
जिसमें समय आता है
तो होती है कोई ध्वनि
और वह मनुष्य
घण्टी को ढोने का कारण जान लेता है।
समय को ढोते रहना है
समय के साथ क़दम-ताल नहीं मिलाना है
समय हमारी हड्डियाँ तोड़ देगा
लेकिन हम समय को
अपने ऊपर लदा हुआ देख भी नहीं पायेंगे।
तारीखें बदलती हैं
कैलेंडर बदलते हैं
सदियाँ बदलती हैं
निज़ाम बदलते हैं
हम भी बदल जाते हैं
लेकिन समय की पकड़ ढीली नहीं होती है।
समय के भार से
हम सीधे खड़े नहीं हो सकते हैं
और देख नहीं सकते हैं रास्ता
चलते रहना है बस चलने के लिये
रुक गये
तो समय का भार और भी बढ़ने लगेगा।
समय है यहाँ
और समय यहाँ हमेशा रहेगा
समय की नज़रों में
हम आवारा हैं,
समय फिर से चाबी भर देगा
और हम दौड़ने लगेंगे।
1.
आज कसीनी ने अंतिम सिग्नल दिये हैं
और फिर विलीन हो गया है
शनि ग्रह के वातावरण में
पर उससे पहले दे गया है
पृथ्वी ग्रह की एक दुर्लभ तस्वीर
काले पर्दे में तैरता एक नीला गोला
जिसके आसपास कोई नहीं है
इतना अकेला है,
निपट अकेला,
और इसी छोटे से गोले पर
हम अपने बड़े होने के भ्रम में
आसमान सर पर उठा लेते हैं।
2.
कॉस्मोस के किसी एपिसोड में
देखा था कि कार्ल सेगन
वॉयजर वन से ली गई
धरती की फ़ोटो पर मुग्ध हो गये थे
क्या विज्ञान के लिये भी पागलपन
किसी में हो सकता है?
बाक़ी पागलपन से तो अच्छा ही होगा।
या पागलपन कोई भी अच्छा नहीं होता?
3.
सदियों से
पृथ्विवासियों ने आकाश में चमकती वस्तुओं को
मानकर रखा है
कि वो धरती पर हो रही घटनाओं का
वहीं से नियंत्रण करती हैं
क्या पता सुदूर, किसी और ग्रह पर
धरती के उपग्रह छोड़ने पर
कुछ और मानी निकलते हों।
(16 Sept 2017)
धर्मराज!
इन पक्षियों को देखो
इनको देखकर
समझा नहीं जा सकता है
कि इनका अस्तित्व में होना
होना है या हो जाना है
पक्षियों ने भी कोई इशारा नहीं किया है
कि कुछ जाना जा सके;
प्रकृति की आकृतियों को देखो
तो कभी लगता है
कि वे हैं
फिर कभी लगता है
कि नहीं, वे हो गयी हैं,
जहाँ आदमी से कोई कहे
कि जो हो वो रहो
लेकिन आदमी क्या है
क्या आदमी यह जानता है?
होने और हो जाने की परिभाषा क्या है?
दोनों में से महत्वपूर्ण किसे कहा जा सकता है?
युधिष्ठिर ऊवाच -
चलायमान संसार में
स्वयं का सम्पूर्ण ज्ञान हो जाना ही होना है
जहाँ अपने साथ संघर्ष नहीं होता है
और अपनी राह पर निश्चिन्त चलते रहना होता है,
और हो जाना है वह
जहाँ आदमी एक स्वयं से निकलकर
दूसरा स्वयं अपना लेता है
और छिपा देता है भूतकाल को वर्तमान में
और फिर से पा लेता है उत्साह जीने का;
पूर्ण रूप से इनमें से कोई भी अपना लेना
सत्य प्राप्त कर लेने जैसा है
और शायद दोनों राहें
कभी अदृश्य स्थान पर मिलें
और एक हो जायें
और मिटा दें होने और हो जाने के अंतर को,
तब तक दोनों में महत्वपूर्ण कौन है
यह ठीक से कहा नहीं जा सकता है।
धर्मराज!
ये तालाब के किनारे खड़े वृक्षों को देखो
बीज से जन्म लेकर
फलदार बड़े पेड़ बनने तक के पूरे समय को देखो
और एक दिन ये वृक्ष भी सूख जायेंगे,
और ये मछलियाँ
क्षणिक जीवन में कूदते हुये
कुछ समय बाद अदृश्य हो जायेंगी,
ये तालाब का पानी आज यहाँ है
कल कहीं और, किसी और रूप में होगा,
तब इन सबके जीवन की
कभी व्याख्या होगी
और ये पूछा जायेगा
कि इन वृक्षों ने, इन मछलियों ने, इस पानी ने
जीवन भर जो किया
क्या उसको जीवन जी लेना माना जा सकता है?
युधिष्ठिर ऊवाच -
श्रीमान!
जीवन कम से कम दो कहे जा सकते हैं
(वैसे परिभाषायें कितनी भी गढ़ी जा सकती हैं)
एक वो जो जिया गया है
और एक वो जो जिया सकता है,
जो जिया जा सकता है
जब वो जी लिया जाता है
तो वह पुराना हो जाता है
लेकिन उसके बाद भी
बहुत कुछ जी सकना बचा रहेगा,
दोनों ही जीवन हमारे किये गये कार्यों से अलग
सम्भावनाओं के रूप में
सदैव अस्तित्व में रहेंगे,
अतः
जीवन जीने में
या जीवन जी सकने में
जीवन जी लेना कौन सा है
यह जाना ही नहीं जा सकता है।
तो मैं बहुत बड़ा दार्शनिक होता हूँ,
मेरे पास
संसार की हर एक समस्या के लिये
अचूक नुस्ख़े होते हैं,
मैं मानता हूँ
कि दुनिया मेरी है
और मेरे लिये ही बनी है,
मैं ये भी मानता हूँ
कि दर्शनशास्त्रियों की थ्योरीज़ में है कोई ताक़त
और इनमें से ही कोई थ्योरी
संसार में यूटोपिया लाने का माद्दा रखती है
जिसके लिये तर्क किया जाना ज़रूरी है,
यह मंशा होती है
कि सत्य निकालकर लाया जाये
और उजाले के लिये खड़ा किया जाये
ताकि मिटाई न जा सके सभ्यता की प्रगति
और खोई न जा सके
उपलब्धियाँ मनुष्य प्रजाति की,
मैं यह जानता हूँ
कि भविष्य की राह पर चला जा सकता है
और पाया जा सकता है मोक्ष
जिस रूप में मैंने उसे देखा है,
उठा सकता हूँ
संसार का भार अपने तर्कों पर
और देख सकता हूँ संसार के पार,
देखो, मैं सुबह बहुत आशावादी होता हूँ।
शाम को जब घर लौटता हूँ
तब दर्शन सारा भूल चुका होता हूँ
और यथार्थवादी होता हूँ
(वो भी शायद अपने आप में एक तरह का दर्शन है)
दुनिया देखने के लिये सभी थ्योरीज़ के चश्मे हटाने ज़रूरी हैं
(शेक्सपीयर ने कहा था
कि स्वर्ग और पृथ्वी पर उतने से ज़्यादा चीज़ें हैं
जितने की कल्पना अभी तुम्हारे दर्शनों में की गयी हैं)
और दुनिया जैसी है
उसको वैसी ही देखने का प्रयास करता हूँ
और दुनिया कैसी है
ये जानने का प्रयास अपने अनुभव से ही कीजिये।
मैंने उसका शाखा से मिलन कराकर छोड़ दिया।
कहीं बर्फ का पिघला पानी जमा हो गया था
मैंने पत्थर से रास्ता खोदकर उसे नदी से जोड़ दिया।
कहीं एक चिंगारी ख़त्म होने की कगार पर थी
मैंने ईंधन देकर उसे भड़का दिया।
कहीं वेदना से व्याकुल एक टहनी टूटने वाली थी
मैंने उसकी आँखों में देखकर उसे हड़का दिया।
कहीं चाँद, तारों और ब्रह्माण्ड की बातें हो रही थीं
मैंने कहा था मैं खाका खींच लूँगा।
कहीं किसी किताब के आखिरी पन्ने पर असहाय खड़ा मिलूँगा
मैं जानता हूँ कि मुट्ठियाँ भींच लूँगा।
कहीं एक लहर थी जो पत्थर चूर करने के प्रयास में थी
मैंने उसके समर्पण को देखा, और कहा, खूब।
कहीं एक आँधी चल रही थी जिसमें बड़े वृक्ष उखड़ रहे थे
उसने मुझसे अपना जवाब माँगा, मैंने कहा, दूब।
कहीं एक बारिश थी जिसमें पनपते थे नये-नये बुलबुले
मैंने रात में बल्ब की रौशनी को उसमें घोल दिया।
कहीं हवा थी ठण्ड से ठिठुरी हुयी घर के बाहर खड़ी
मैंने आमंत्रण दिया और खिड़कियों को खोल दिया।
कहीं एक साँझ थी जो दिन से बिछड़कर थी परेशान
मैंने उसे रात से बचाकर चित्र में क़ैद कर दिया।
कहीं एक सवेरा बैठा था नींद खुलने से सुस्त था
मैंने उसे पूरब की ओर लुढ़काकर रौशनी से लैस कर दिया।
कहीं समय था जो इतिहास को बदलने का निश्चय कर चुका था
मैं उससे मुखातिब हुआ और पूँछा - क्या यहीं?
कहीं एक मोटी पोथी थी जो इतिहास की धारा में बही थी
मैंने उसे पढ़ा और जवाब पाया - क्यों नहीं?
कहीं एक शब्द था अपने अर्थ से बिछड़ा हुआ
मैंने उसे परिप्रेक्ष्य देकर उसका संघर्ष कर दिया व्यर्थ।
कहीं एक छन्द था अपने रूपक से अलग-थलग
मैंने उसे एक और मानी देकर कर दिया और भी असमर्थ।
कहीं दर्द की दरिया मिली कराहते हुये धीरे चलती हुयी
मैंने शब्दों का बाँध बना दिया और कहा रुको।
कहीं हवा में झूमती एक प्रतिभावान शाखा मिली
मैंने जिम्मेदारी का बोझ उस पर लादते हुए कहा झुको।
मैं नया कवि हूँ, कुछ कहने के प्रयास में हूँ
मुझे जो मिला, मैंने जो देखा, मैंने उन्हें शब्दों में बुना।
दुनिया जैसी हमने देखी है, हम सभी जानते हैं
मैंने एक नयी दुनिया गढ़ने के लिये शब्दों को चुना।
(अज्ञेय की कविता ‘नया कवि : आत्म-स्वीकार’ को समर्पित।)
मेरी आँखों के आगे फैला हुआ
जहाँ रेत ही रेत दिखती है हर तरफ
और दूरियाँ तय होती नज़र नहीं आ रही हैं
परिवर्तन की अनुपस्थिति के कारण
मीलों फैली रेत जिसपर चलता चला जाता हूँ
एकरसता में रस खोजने,
जहाँ रेतीली आँधियाँ चलती हैं
और कुछ देर के लिये एकरसता से
ध्यान भंग कर देती हैं
ऐसा ही एक रेगिस्तान
मेरे मन के अंदर भी है
जहाँ से कोई रास्ता सुलझता नहीं है
और जो दिखता है
वह बहुत दूर एक जैसा ही दिखता चला जाता है
और इस रेगिस्तान से ध्यान हटाने के लिये
मैं रेतीली आँधियाँ खोजता रहता हूँ।
एक पहाड़ है
जिसकी ढलान पर उगे हैं
पतली पत्तियों वाले पेड़
जो खड़े हैं इतनी उंचाई पर
डर को ठेंगा दिखाते हुये
उस पहाड़ के शिखर से
पत्थर गिरते रहते हैं
आम बात है
कभी-कभी ये पेड़
उन पत्थरों को गिरने से रोक लिया करते हैं
मैं दोनों ही पात्र अदा करता हूँ
कभी पत्थरों की तरह गिरता हूँ
(लाक्षणिक रूप से)
कभी पेड़ों की तरह खुद को संभाल लेता हूँ।
एक सड़क है
जो कुछ जगहों पर उबड़-खाबड़ है
लेकिन ज्यादातर जगह सही है
जिसके दोनों तरफ हैं हरे-भरे खेत
आदमी की ऊँचाई से ऊपर तक गन्ने के पौधे,
हरियाली आकर्षक है
लेकिन सड़क को अभी चलना होगा
मंजिल की तरफ
या उससे भी आगे
खेतों की पैदावार सड़क को नहीं मिल सकती
और वैसे ही जीवन है
जहाँ हरियाली का लालच है दोनों तरफ
और पहुँच में भी दिखता है
लेकिन जीवन को
अभी दूर-बहुत दूर जाना है
उबड़-खाबड़ रास्तों पर
अभी और चलना होगा।
एक नदी है
जो आस्था की घाटी से बहते हुये
अथाह सागर की चौखट पर खड़ी हो जायेगी
हिम्मत के साथ
जिसका सानी कोई नहीं होगा,
जिस नदी में किसी पुल के पास
या किसी प्रसिद्ध घाट के किनारे
डूबे हैं श्रद्धा के अंतहीन सिक्के तलहटी में,
जब जन्मी थी हिमालय की गोद में
तब बहुत सम्भावनायें थीं
अब एक लकीर पर
पानी को चलते चले जाना है
एक राह चुनने की अब उतनी सम्भावनायें नहीं हैं
नदी की यही गति है।
एक खेत है
जिसमें धान कुछ दिन पहले रोपा गया है
जिसको सींचने के लिये
नहर से पानी लगाना पड़ता है,
और जाना पड़ता है रात में
टॉर्च लेकर जंगल की तरफ
बांधने के लिए नयी मेड़
जो रखेगी पानी रोककर,
और अगले दिन जोरदार बारिश होती है
मेड़ बह जाती है
एक चौथाई खेत के साथ,
ये भविष्य की चुनौतियाँ
मौसम की मार, तेज फुहार
खेत के कहे में नहीं हैं
खेत चाहे तो बस तैय्यार रह सकता है
मेड़ें मजबूत की जा सकती हैं शायद।
एक रात है
रात अँधेरी है
अंधेरेपन की गूँज हर एक दिशा में व्याप्त है
प्रतिध्वनि में भी अंधेरापन ही सुनाई पड़ता है
ऊपर काले-काले बादलों के धब्बे
चाँद के सामने तैरते रहते हैं
और बादल ऊपर से ही देख लेते होंगे
टूटते हुये तारे
जिसको अपनी नासमझी में
दे देते होंगे कोई नयी कहानी,
अँधेरी सड़क से
हवा उड़ाती है सूखे पत्तों को
और जब पत्तों की आवाज़ रूकती है
तो रात का सूनापन बहुत बढ़ जाता है
दूर क्षितिज में
कहीं कड़कती है बिजली
प्रकाश की एक तलवार
समा जाती है धरती के सीने में
रात की तन्द्रा टूटती है
रात जूझती रहती है
लेकिन रात नींद का त्याग नहीं कर सकती।
एक मंदिर है
पहाड़ की चोटी पर बैठा हुआ
निर्जन है
जहाँ लोग मंदिर देखने नहीं
मंदिर की छत से दुनिया देखने आते हैं,
मंदिर उम्र के उस पड़ाव में है
जहाँ सिर्फ इतिहास पर गर्व किया जा सकता है
(इतिहास गौरवशाली रहा है)
लेकिन वर्तमान में यह प्रांगण
कुछ पुरानी दीवारों का
बस एक समूह बनकर रह गया है
जिसमें बसती हैं वीरानियाँ
और बरामदों में रात के अँधेरे में गूँजती हैं
कहानियाँ एक भव्य इतिहास की,
मंदिर से कुछ दूर एक बस्ती है
जहाँ बन आये हैं छोटे-छोटे नये मंदिर कई
लोगों का आना-जाना लगा रहता है जहाँ
बूढ़ा मंदिर अचरज से भरा नहीं है
हर एक मंदिर को इस दौर से गुजरना ही है।
एक पेड़ है
जिसकी जड़ें गड़ी हैं गहरे तक
और नतीजतन
वह खड़ा है संतुलित नयी धरती पर
कभी मैं उस पेड़ के पास पहुँच जाता
तो पेड़ बड़ा खुश हो जाता
और सुनाता मुझे किस्से
पिछले ज़माने में आयी आँधियों के
जिनसे समाज को मिलते थे रूप
और इतिहास को पन्ने
बूढ़ा पेड़ मुझसे बताता है
उन आँधियों के बारे में भी
जो पेड़ों से टकराकर टूट गयीं
और बड़ी नहीं हो पायीं
एक सम्भावना बनकर बस रह गयीं,
मैं उस पेड़ की जड़ में पानी डाल आता हूँ
और मना आता हूँ कि वो हवा दे और अँधियों को,
और यात्रा है
तो दोबारा तो मिलना होगा ही।
एक समुद्रतट है
जहाँ ईर्ष्या से लहरें
कदमों के निशां मिटा देती हैं
और झगड़ती हैं एक दूसरे से,
बहुत दूर सागर की गहराइयों में
जहाँ प्रकाश पहुँचता नहीं है
वहाँ भी यात्रा के नये कारण खोज लिये गये हैं,
रेत के किनारे दूर कहीं
लहरों को लील लेने के लिये प्रयासरत हैं,
दूर कहीं एक द्वीप
सागर से बाहर निकला है
और डूबते सूरज की रौशनी में चमकता है,
रात में चाँद देखता है ऊपर से
समुद्र में मछुआरों के लैंप
किसी नयी दुनिया में
तारों से नज़र आते हैं,
मुझे एक दिन बैठना है समुद्र के किनारे
दिन से रात और रात से दिन कर देना है।
लेकिन समय एक नहीं है
समय दो हैं
पहले समय में
हम समय को धीमा करके
दूसरा समय देखते हैं
और सापेक्षता के सिद्धान्त के तहत
हमें दूसरा समय बहुत तेज भागता हुआ लगता है
समय हमसे बहुत दूर भागता है
हमारा समय पिछड़ता रहता है
एक दिन हाँफते हुये
पराजय स्वीकार कर लेता है
वह समय अब चलता नहीं है,
समय नहीं चलेगा अब
बस हमारा चलना बाकी रह गया है।
यात्रायें कभी समाप्त नहीं होती हैं
यात्राओं के बस रूप बदलते रहते हैं
यात्रायें बस देश और काल की नहीं होती हैं
रोज़मर्रा की जिंदगी भी एक यात्रा है
जिसमें श्रद्धा से
लगाना होता है गले से एक गंतव्य
और सच्चे यात्री की तरह
भटकने मात्र से घर बैठना शुरू नहीं कर दिया जाता,
सच्चे यात्री
गंतव्य पूँछकर यात्रा शुरू नहीं करते हैं
राह और मंज़िल में भेदभाव नहीं करते हैं
ये देखने नहीं जाते
जो कि देखा जा चुका है
और लेखों में आ गया है
बल्कि वह जो अभी तक आकार ही नहीं ले पाया है।
दीवारें तोड़नी हैं
इससे पहले कि वह दीवार खड़ी हो जाये
मुझे उठना है
और दीवार से टकराकर
लहूलुहान हो जाना है।
मेरे सामने भागती है एक भीड़
सबने अपने कन्धों पर लाद रखे हैं
लकड़ियों के लट्ठे
जो हैं भुजायें किसी युवा जंगल की
इससे पहले कि यह लकड़ियाँ
गाड़ दी जायें
बना दी जायें चहारदीवारी
और रोक लें मुझको
मुझे पहुँचना है
और रोकना है उस भीड़ को।
एक कांटेदार पेड़ की कुछ शाखायें
काट कर रख दी गयी हैं धूप में
कल पत्तियाँ सूख कर गिर जायेंगी
तब इस डाल को रख दिया जायेगा किसी मेड़ पर
और बाँट दी जायेगी जबरदस्ती ज़मीन फिर से
जलाना चाहता हूँ
उस डाल को किसी चूल्हे में
जहाँ से सिर्फ धुँआ निकले
कोई दीवार न निकले।
नदी के सीने को खोदकर
एक ट्रक निकला है
ढोता है बालू
जो बनवाती हैं दीवारें,
जाओ, जाओ,
बादलों से कहो कि बरस पड़ें
और बहा दे पूरा बालू,
हवाओं से कहो कि चल पड़ें
और सब छितरा दें,
और रास्तों से कहो कि वे उलझ जायें
और घूमता रहे उन्हीं में वो ट्रक
इससे पहले कि वो ट्रक अपनी मंज़िल तक पहुँच जाये
उसे रोकना है।
मैं उस शरीर में बँधी हूँ
जिसके कदमों को चूमती है चाँदनी रेत
और बालों को छूकर निकलती है घाटी की हवा,
जिसके एक तरफ बहती है नदी
और दूसरी तरफ चढ़ता है आसमां,
एक वृत्त में दौड़ता हुआ वह शरीर
और हाँफता हुआ
अपने चारों तरफ़
अपनी सी दुनिया ढूँढ़ता हुआ,
ब्रह्म में भटकी हुयी
मैं उस शरीर की अल्पकालिक यात्री हूँ।
2.
मेरी खोज में न राहें मेरा कहना मानती हैं
और न ही मानता है ये सफर
मेरे उद्देश्य में
न ही कोई नीरसता है
और न ही कोई नीरवता है
हाँ, थोड़ी विवशता है
मेरी राह में
अब न जीतें हैं
अब न हारें हैं
वैसे तो मैं आत्मा हूँ
और तथाकथित रूप से बहुत महत्व की हूँ
लेकिन समय में मैं एक बहुत महत्वहीन अनुचर हूँ।
3.
और फिर एक दिन
शरीरों की इस यात्रा में
करोड़ों वर्षों के बाद
दिन ज्यादा उजले होंगे
रातें कम अंधियारी होती जायेंगी
और तब तक मैं रह गयी
रचयिता की कृति में उलझकर
तब आसमान झुलसता हुआ
मुझसे मेरी जिंदगी माँगने आ खड़ा होगा
तब मैं भागती फिरूँगी
एक नयी खोज पर चर्चा करने के लिये
मगर कहूँगी किससे
कि सूरज धरती को लील गया है।
समन्दर से खींचकर
किनारे पर लगा दी गयी नाव को
जैसे जीवन से उठाकर
मृत्यु के दर्शन दे दिये गये हैं,
लकड़ी के पटरे
जिन्हें लहरों की गति नापने की आज़ादी थी
आज रेत की शय्या पर बैठकर दिन जाया करते हैं
और समय ने कई बार देखा है
कि एक-एक करके ये लकड़ियाँ
गायब होती चली जाती हैं,
धूल की परतें
नाव का जीवन धूमिल कर देंगी
कभी-कभी कुछ लहरें नाव तक पहुँच जाती हैं
और ऐसी आवाज़ होती है
जिसे बड़ी तड़प में ही शायद सुना गया है
जीवन का एक टुकड़ा मिलते ही
नाव बिलख उठती है
जिसके आँसुओं को समीर बिखरा ले जाती है।
पर क्यों,
नाव को समन्दर में ही क्यों जाना है,
और कोई तरीका नहीं निकाल सकती क्या ये नाव
समय में विलीन होने का?
जलाने के लिये लकड़ियाँ,
बच्चों के लुकाछिपी खेलने का स्थान,
यात्रियों के लिये चित्र लेने का स्थान
जिसके पार्श्व में सूर्यास्त सावधानी से लगाया गया हो,
कितने सारे कार्य हैं
जिनमें नाव उद्देश्य पा सकती है,
लेकिन खोज पाती नहीं हैं।
और यह मात्र देखकर जाना नहीं जा सकता
कि ये नाव
समन्दर में जाने की आदी क्यों हैं।