एक रेगिस्तान है
मेरी आँखों के आगे फैला हुआ
जहाँ रेत ही रेत दिखती है हर तरफ
और दूरियाँ तय होती नज़र नहीं आ रही हैं
परिवर्तन की अनुपस्थिति के कारण
मीलों फैली रेत जिसपर चलता चला जाता हूँ
एकरसता में रस खोजने,
जहाँ रेतीली आँधियाँ चलती हैं
और कुछ देर के लिये एकरसता से
ध्यान भंग कर देती हैं
ऐसा ही एक रेगिस्तान
मेरे मन के अंदर भी है
जहाँ से कोई रास्ता सुलझता नहीं है
और जो दिखता है
वह बहुत दूर एक जैसा ही दिखता चला जाता है
और इस रेगिस्तान से ध्यान हटाने के लिये
मैं रेतीली आँधियाँ खोजता रहता हूँ।

एक पहाड़ है
जिसकी ढलान पर उगे हैं
पतली पत्तियों वाले पेड़
जो खड़े हैं इतनी उंचाई पर
डर को ठेंगा दिखाते हुये
उस पहाड़ के शिखर से
पत्थर गिरते रहते हैं
आम बात है
कभी-कभी ये पेड़
उन पत्थरों को गिरने से रोक लिया करते हैं
मैं दोनों ही पात्र अदा करता हूँ
कभी पत्थरों की तरह गिरता हूँ
(लाक्षणिक रूप से)
कभी पेड़ों की तरह खुद को संभाल लेता हूँ।

एक सड़क है
जो कुछ जगहों पर उबड़-खाबड़ है
लेकिन ज्यादातर जगह सही है
जिसके दोनों तरफ हैं हरे-भरे खेत
आदमी की ऊँचाई से ऊपर तक गन्ने के पौधे,
हरियाली आकर्षक है
लेकिन सड़क को अभी चलना होगा
मंजिल की तरफ
या उससे भी आगे
खेतों की पैदावार सड़क को नहीं मिल सकती
और वैसे ही जीवन है
जहाँ हरियाली का लालच है दोनों तरफ
और पहुँच में भी दिखता है
लेकिन जीवन को
अभी दूर-बहुत दूर जाना है
उबड़-खाबड़ रास्तों पर
अभी और चलना होगा।

एक नदी है
जो आस्था की घाटी से बहते हुये
अथाह सागर की चौखट पर खड़ी हो जायेगी
हिम्मत के साथ
जिसका सानी कोई नहीं होगा,
जिस नदी में किसी पुल के पास
या किसी प्रसिद्ध घाट के किनारे
डूबे हैं श्रद्धा के अंतहीन सिक्के तलहटी में,
जब जन्मी थी हिमालय की गोद में
तब बहुत सम्भावनायें थीं
अब एक लकीर पर
पानी को चलते चले जाना है
एक राह चुनने की अब उतनी सम्भावनायें नहीं हैं
नदी की यही गति है।

एक खेत है
जिसमें धान कुछ दिन पहले रोपा गया है
जिसको सींचने के लिये
नहर से पानी लगाना पड़ता है,
और जाना पड़ता है रात में
टॉर्च लेकर जंगल की तरफ
बांधने के लिए नयी मेड़
जो रखेगी पानी रोककर,
और अगले दिन जोरदार बारिश होती है
मेड़ बह जाती है
एक चौथाई खेत के साथ,
ये भविष्य की चुनौतियाँ
मौसम की मार, तेज फुहार
खेत के कहे में नहीं हैं
खेत चाहे तो बस तैय्यार रह सकता है
मेड़ें मजबूत की जा सकती हैं शायद।

एक रात है
रात अँधेरी है
अंधेरेपन की गूँज हर एक दिशा में व्याप्त है
प्रतिध्वनि में भी अंधेरापन ही सुनाई पड़ता है
ऊपर काले-काले बादलों के धब्बे
चाँद के सामने तैरते रहते हैं
और बादल ऊपर से ही देख लेते होंगे
टूटते हुये तारे
जिसको अपनी नासमझी में
दे देते होंगे कोई नयी कहानी,
अँधेरी सड़क से
हवा उड़ाती है सूखे पत्तों को
और जब पत्तों की आवाज़ रूकती है
तो रात का सूनापन बहुत बढ़ जाता है
दूर क्षितिज में
कहीं कड़कती है बिजली
प्रकाश की एक तलवार
समा जाती है धरती के सीने में
रात की तन्द्रा टूटती है
रात जूझती रहती है
लेकिन रात नींद का त्याग नहीं कर सकती।

एक मंदिर है
पहाड़ की चोटी पर बैठा हुआ
निर्जन है
जहाँ लोग मंदिर देखने नहीं
मंदिर की छत से दुनिया देखने आते हैं,
मंदिर उम्र के उस पड़ाव में है
जहाँ सिर्फ इतिहास पर गर्व किया जा सकता है
(इतिहास गौरवशाली रहा है)
लेकिन वर्तमान में यह प्रांगण
कुछ पुरानी दीवारों का
बस एक समूह बनकर रह गया है
जिसमें बसती हैं वीरानियाँ
और बरामदों में रात के अँधेरे में गूँजती हैं
कहानियाँ एक भव्य इतिहास की,
मंदिर से कुछ दूर एक बस्ती है
जहाँ बन आये हैं छोटे-छोटे नये मंदिर कई
लोगों का आना-जाना लगा रहता है जहाँ
बूढ़ा मंदिर अचरज से भरा नहीं है
हर एक मंदिर को इस दौर से गुजरना ही है।

एक पेड़ है
जिसकी जड़ें गड़ी हैं गहरे तक
और नतीजतन
वह खड़ा है संतुलित नयी धरती पर
कभी मैं उस पेड़ के पास पहुँच जाता
तो पेड़ बड़ा खुश हो जाता
और सुनाता मुझे किस्से
पिछले ज़माने में आयी आँधियों के
जिनसे समाज को मिलते थे रूप
और इतिहास को पन्ने
बूढ़ा पेड़ मुझसे बताता है
उन आँधियों के बारे में भी
जो पेड़ों से टकराकर टूट गयीं
और बड़ी नहीं हो पायीं
एक सम्भावना बनकर बस रह गयीं,
मैं उस पेड़ की जड़ में पानी डाल आता हूँ
और मना आता हूँ कि वो हवा दे और अँधियों को,
और यात्रा है
तो दोबारा तो मिलना होगा ही।

एक समुद्रतट है
जहाँ ईर्ष्या से लहरें
कदमों के निशां मिटा देती हैं
और झगड़ती हैं एक दूसरे से,
बहुत दूर सागर की गहराइयों में
जहाँ प्रकाश पहुँचता नहीं है
वहाँ भी यात्रा के नये कारण खोज लिये गये हैं,
रेत के किनारे दूर कहीं
लहरों को लील लेने के लिये प्रयासरत हैं,
दूर कहीं एक द्वीप
सागर से बाहर निकला है
और डूबते सूरज की रौशनी में चमकता है,
रात में चाँद देखता है ऊपर से
समुद्र में मछुआरों के लैंप
किसी नयी दुनिया में
तारों से नज़र आते हैं,
मुझे एक दिन बैठना है समुद्र के किनारे
दिन से रात और रात से दिन कर देना है।

लेकिन समय एक नहीं है
समय दो हैं
पहले समय में
हम समय को धीमा करके
दूसरा समय देखते हैं
और सापेक्षता के सिद्धान्त के तहत
हमें दूसरा समय बहुत तेज भागता हुआ लगता है
समय हमसे बहुत दूर भागता है
हमारा समय पिछड़ता रहता है
एक दिन हाँफते हुये
पराजय स्वीकार कर लेता है
वह समय अब चलता नहीं है,
समय नहीं चलेगा अब
बस हमारा चलना बाकी रह गया है।

यात्रायें कभी समाप्त नहीं होती हैं
यात्राओं के बस रूप बदलते रहते हैं
यात्रायें बस देश और काल की नहीं होती हैं
रोज़मर्रा की जिंदगी भी एक यात्रा है
जिसमें श्रद्धा से
लगाना होता है गले से एक गंतव्य
और सच्चे यात्री की तरह
भटकने मात्र से घर बैठना शुरू नहीं कर दिया जाता,
सच्चे यात्री
गंतव्य पूँछकर यात्रा शुरू नहीं करते हैं
राह और मंज़िल में भेदभाव नहीं करते हैं
ये देखने नहीं जाते
जो कि देखा जा चुका है
और लेखों में आ गया है
बल्कि वह जो अभी तक आकार ही नहीं ले पाया है।


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