खुली हुई किताब है
जिसके आधे पन्ने में
तुम्हारी पसंदीदा कविता का एक टुकड़ा फैला हुआ है,
मोमबत्ती धीरे-धीरे मद्धम होती हुई
बुझने की तरफ अग्रसर है,
मेज़ के कोने से मोमबत्ती की रोशनी गिरती है
और समा जाती है पूरे कमरे में,
चौंककर रात तड़प उठती है
रात को फिर से शुरू होने का मौका देते हुये
दरवाज़े खोल देता हूँ
दूर किसी मंदिर की आखिरी आरती के घण्टे बज रहे हैं,
दूर गाड़ियों की आवाज़ से पता चलता है
कि शहर अपनी ज़िन्दगी जी रहा है,
सुस्ताया हुआ सा एक लैंप
सड़क को पीली रोशनी से नहला देता है,
ऐसा लगता है
कि मौसम का एक किनारा कुछ नया हो गया है।
शायद,
सोने से पहले
रात एक बार तुमसे टकरा गयी है।
यहाँ लोगों ने मुझे बताया है
कि सामने के इस मंदिर में
देवता बारह बरस में बस एक बार आते हैं
तब मंदिर के कपाट खोले जाते हैं
और ग्रामवासी यहाँ इकठ्ठा होते हैं,
हर्षोल्लास का माहौल होता है,
उस अंतराल में यह मंदिर
बस जिज्ञासा की एक वस्तु बनकर रह जाता है।
अदीब,
क्या तुम यह बता सकते हो
कि आखिर देवता मंदिर छोड़कर क्यों गये होंगे?
या कहाँ गये होंगे?
प्रशंसा की ज्यादातर वस्तुयें
उदासी पर आधारित होती हैं
यह साहित्य, कला और संगीत के रूपों में
सहज दिख जाता है,
क्या यह कहना चाहिये
कि सुंदरता और सहानुभूति
एक दूसरे से जुड़े हुये हैं
या इसे किसी दौर-विशेष का चलन कहकर
नकार देना चाहिये,
सत्य हमेशा सुन्दर नहीं होता
सुंदरता हमेशा शिव नहीं होती
सुंदरता उदास करती है
तो सत्य हो भी जाये
शिव नहीं हो सकती।
और क्या यह कहा जा सकता है
कि सुंदरता का देवता
उदासी का भी देवता रहा होगा?
दो नदियाँ जहाँ मिलती हैं
दूर तक फैली घाटियों से आकर
सर्पीली धाराओं में बदल जाती हैं
और मिलती हैं एक दूसरे से
जैसे दो आकाशगंगायें खिंची आ रही हों
एक दूसरे की तरफ गुरुत्वाकर्षण से
लेकिन बहुत धीरे-धीरे चलते-चलते,
आकार लेती हैं संगम के आसपास कुछ ऐसे
कि जिसके आगे
सारे स्केच निरस्त हो जाते हैं
असहाय खड़ा देखता रहता हूँ कैनवास की तरफ
रंगों में सूखी हुई एक कूँची लिये हुये
जो नदी में भीग जायेगी
तभी चित्र बना पायेगी
और आवाज़ होती है कल-कल की
जैसे किसी नव-सन्यासी के हाथ में आकर
एक सारंगी धन्य हो गयी हो
और अपनी तान से मोह लेने की जिद पर अड़ गयी हो।
सामने एक मठ की जर्जर दीवारें हैं
जहाँ कुछ मठाधीशों ने बैठकर
ब्रह्माण्ड की परिकल्पना पर चिंतन किया होगा
और संगम के मानी तलाशे होंगे
जिसे बाद में
ग्रामवासियों में बाँट दिया गया होगा
मठ की दीवारें
अब नूतनता का भार उठा सकने में
अब उतना समर्थ नहीं रह गयी हैं शायद
और कहीं दूर से
जीवनदर्शन को फिर से परिभाषित करने के संकल्प
प्रतिध्वनित हो रहे होंगे,
नीचे अर्ध चंद्राकार इस गाँव में
चित्र बनाने के लिये बहुत तत्व मौजूद हैं
मैं प्रयासरत हूँ।
जिस पगडण्डी में बैठकर
आसमान को स्केचबोर्ड पर टांग कर
प्रकृति की रंगों वाली थाली से कूँची में लेकर
मैं रंग भर रहा हूँ
उसके पीछे कुछ दूर जाकर एक झील है
जिसमें सूर्यास्त के अलग-अलग रंग दिखते हैं,
एक, उस सूरज का जो चला गया है
अपने पीछे हल्की छाया छोड़कर
जिसमें उदास शांत झील का पानी
साँझ के चाँद को डुबो लेता है,
दूसरा, उस सूरज का जो अभी अस्त नहीं हुआ है
और जिसकी गर्माहट में पानी ने
तलहटी को किरणों को सौंप दिया है
झील की गहराई पुलकित होकर
सूरज को देखने किनारे पर आ खड़ी होती है,
झील को घेरे खड़े हैं
घास के कुछ छोटे-बड़े गट्ठर
जो शायद झील की प्रशंसा सुनकर
यहाँ आ गये होंगे।
नीचे एक राह है
जो नदी का पीछा करते करते चली जायेगी
संकरी होती हुये
जिस पर चलते हुये हम
इतिहास के रंगों में हम सराबोर हो जायेंगे
लेकिन हम कहीं पहुंचेंगे नहीं
राहें कहीं पहुँचती नहीं हैं
पहुँचते हम मनुष्य हैं
राहें चलती चली जाती हैं
मनुष्य के अंदर से लेकर
ब्रह्माण्ड के अनदेखे, अकल्पित कोनों तक;
और कच्ची मिटटी की बनी दीवारों से
हज़ार साल पहले के रंग
मैं अपने चित्र में रंगने के लिये ले आया हूँ
मरुस्थलीय कृत्रिम खेती की तरह नहीं
खालिस प्राकृतिक, जिजीविषा से बनाये गए रंग
जिसने अपने आपको सहेज कर रखा है
विपरीत परिस्थितियों में रहने के बाद भी।
स्पीति,
कुछ महीने पहले मैं तुमसे मिला था,
या शायद कुछ वर्ष हो गये हैं,
तबसे एक अदद चित्र के प्रयास में
कैनवास में कौन-कौन सी आड़ी-तिरछी रेखायें नहीं खींची गयी हैं
कौन-कौन से रंगों के मिश्रण नहीं आजमाये गये हैं
कौन-कौन से चित्रकार के नुस्खे नहीं पढ़े गये हैं
लेकिन मैं तुम्हारा चित्र नहीं बना सका,
और मेरे लिये यह
वास्तविकता से साक्षात्कार की बात थी,
क्योंकि अपनी रंगों की दुनिया में डूबा हुआ
मैं अपनी तरह का एक अदना चित्रकार था।
एक सड़क थी
जो दर्रे के ऊपर से गुजरती थी
एक बस वहाँ से गुजरी
तेज चलती हुई हवा का एक झोंका
उस बस में आकर बैठ गया
और वह रास्ते के हर एक शख्स से
गर्मजोशी से मिलता रहा
कुछ घण्टों की कठिन यात्रा के बाद
वह झोंका बस से उतरा
और झील के पानी पर तैरने लगा
और चिढ़ाने लगा सूरज की किरणों को,
फिर वह झोंका पहाड़ पर चढ़ गया
और वहाँ से गिराने लगा
रेत के टुकड़ों को,
वह झोंका ज़मीन पर अवतरित हुआ
नदी में बहते हुये
पत्थरों से टकराने लगा
और वह घाटी की आबो-हवा में व्याप्त हो गया
जिस से हर एक क्षण निमंत्रण सा लगने लगा था
और उसने वातावरण को एक सधे उन्माद से भर दिया
जिसे मैंने हर एक प्राण में
अक्षुण्ण पाया था।
मैं उसी सड़क से लौटा
हवा का झोंका अपने साथ रख लाया था
आज भी कभी-कभी
हवा का वह झोंका मेरे अंदर चलने लगता है
मैं पंछी बनकर उड़ने लगता हूँ
विहंगम दृश्य मेरे सामने नाचने लगते हैं
मैं अपने आप को
किसी बौद्ध मठ में लाल कालीन पर बैठा हुआ
ध्यानरत देख पाता हूँ।