मैं अब अस्तित्वविहीन हो गया हूँ,
मिटटी का एक टीला
जो धीरे-धीरे धंस रहा था
जहाँ से छलांग लगाकर मैं अस्तित्व में डूब सकता था
जिस पर खड़े होकर
मैंने उपस्थित होने की सारी प्रक्रियायें देखी थीं
जहाँ से भागकर
मैं अस्तित्व से बहुत दूर चला आया था;
ठोस रंगों का एक टुकड़ा
पानी में घूमने लगता है, लेकिन वह
सख्त था, घुलने से मना कर देता है
और अपनी अवस्था पर
प्रश्नचिन्ह लगाकर शांत हो जाता है;
अनुपस्थित, मान्यता से वंचित
ठोस रंगों का वह टुकड़ा
टीले की मिटटी में मिलता है
और रंग वाले उस लेप में
मध्यान्ह के सूरज के प्रकाश में
मैं अस्तित्वविहीनता की आकृति खोजता हूँ
और आह्वान करता हूँ
प्रकृति की प्रक्रियाओं का
जिन्हें कभी पूजना होगा,
और सोचता हूँ
कि विलीन होने की
एक और संभावना असफल हुई।
पहले जला था, फिर बुझा था वो।
घाटी की साँझ की हवाओं ने
उसे रोका नहीं था,
आधे चाँद ने उसे शीतलता देने की
कोई कोशिश नहीं की थी,
पहाड़ ने सोचा था
कि बढ़ती हुई लपटों को वह छिपा लेगा
ताकि कहीं से कोई सहायता न आ पाये
और नदी?
नदी सिमट गई घाटी के एक कोने में
मानो आंच से उसे भी डर लगता हो,
वह किस ध्येय के लिये जल रहा था
यह जानने की कोशिश किसी ने नहीं की
ऐसा इसलिये नहीं
कि यूँ जलना
बहुत सामान्य और बहुधा होने वाली बात थी,
इतनी तो लपटें थी भी नहीं
कि सब खुद जल जाने के डर से
बुझाने के लिये दौड़ पड़ें,
वह किसी ध्येय के लिये ही जल रहा हो
यह भी विश्वास से नहीं कहा जा सकता
हो सकता है
उसका जलना शुद्ध पागलपन का परिणाम रहा हो।
कई दिनों तक जला था वो
जब उसके मस्तिष्क से
सारा ईंधन समाप्त हो गया था,
जब उसके शरीर का हर एक टुकड़ा
प्रकृति से साक्षात्कार के लिये व्याकुल हो उठा,
तब जाकर बुझा था वो।
भोर और साँझ की दीवारों के बीच क़ैद
एक दिन को देखकर
हतप्रभ रह गया हूँ,
आठ प्रहरों से मिलने के लिये दिन
रोज़ पहाड़ लांघ कर आ जाता है
वही-वही दृश्य
वही कार्य रोज़
और दिन
समय की उन सलाखों के बीच
चहलकदमी करते हुये
कभी बूढ़ा नहीं होता,
हम सभी दर्शक
जिसे शाश्वत मानकर बैठ गए हैं
वह दिन भी कभी ऊब जायेगा
संघर्ष करेगा
समय के मापकों को
मानने से इंकार कर देगा
तब हमारी सभ्यता
निरंतरता की नींद से जाग उठेगी।
हज़ारों वर्ष पहले
ऐसी ही किसी एक कल्पना को
मनीषियों ने प्रलय का नाम दिया होगा।
आसमान से गिरा हुआ एक रंग
जो लहरों पर फैलता है
फिर छा जाता है
आँखों से जिसे ग्रहण करते हैं हम
खो जाता है कहीं हमारे अंदर
और बेचैन होकर
ढूँढ़ने लगते हैं
एक दूसरे की आँखों में वह रंग,
या पत्तियों के हिलने से
पेड़ों से गिरते हुये रंग के छोटे-छोटे कण
जो एक क्षण में ही
प्रकृति को जिन्दा करके
सामने खड़ा कर देते हैं
जहाँ से उपमायें ढूँढ़ी जा सकें,
या यह भी पूछना चाहिये
कि कोई रंग होता भी है क्या?
नाम देने से पहले
यह जान लेना चाहये
कि नाम दिया भी जा सकता है या नहीं
जिस क्षण तर्क करने की क्षमता क्षीण हो जाती है
यह ज्ञात हो जाता है
दूसरी हर एक बात से ऊपर
एक बात पुख्ता हो गई है
जब कोई रंग नहीं दिखता है
उस समय,
रंग की परिभाषा गढ़ सकोगे क्या अदीब?
(वैसे धर्मवीर भारती जी ने प्रणयोन्माद का रंग नीला माना है।)
और भी दूर हो जाता है अपनी बुलन्दियों से वो कभी-कभी।
कभी-कभी राह रुक जाती है चलते-चलते,
और यूँ ही चलता चला जाता है वो कभी-कभी ।
कभी-कभी रास्ता और वो पाला बदल लेते है,
और वो रास्ता होता है, राह मुसाफिर हो जाती है कभी-कभी।
कभी-कभी हासिल-ए-जिंदगी भूल जाता है वो,
और बेचैनियों के हवाले खुद को पाता है कभी-कभी।
कभी-कभी वह सिमटकर रंगमंच हो जाता है,
और बड़े नाट्यकार लड़ने लगते हैं उसके अंदर कभी-कभी।