ये निर्मल शीतल जल
ये छोटे पत्थरों के ऊपर छोटी लहरियाँ
घाटी में सूरज को देखने के
बस कुछ चुनिन्दा पहर
और हर चीज के अस्तित्व को
उद्देश्य देती हुई सिमटी हुई धारा,
किनारे पर खड़ा होकर सोचता हूँ
कि मानी एकतरफा क्यों होते हैं।

ये सूरज-चाँद को दिये गए रूपक
कभी कुछ बढ़ा-चढ़ाकर
तो कभी चाशनी में डुबोकर
पेश की गई शब्दों की लड़ियाँ,
ये झील का पानी
जिसमें हवा के संगीत में
अगाध श्रद्धा से नाचती हैं सूरज की किरणें
कभी इस बात से वाकिफ़ होगा
कि रोज की इन बातों के कुछ मानी भी होते हैं
जो कि हमने इन्हें दे दिये हैं।

कभी शायद हवा का एक झोंका
किसी पगौड़ा से उलझाई हुई झंडियों के माध्यम से
ये बोल सकेगा
कि ये जो मानी तुमने दिये हैं
इनसे अलग बहुत से मानी हैं
तुम मुझे सुनो तो सही।
सदियों से मुझ जैसे बहुतों ने
तुम्हें मानी देने की कोशिश की है,
क्या ऐसा नहीं हो सकता
कि तुम मुझे मानी दो, स्पीति?


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