कल रात में
बारिश की बूँदों को
चिर-परिचित ध्वनि के साथ
यूँ ही थिरकते देखा
तेज गति से आती हुई बूँद
अपनी तुलना में
किसी विशाल जलराशि से मिलकर
चौंक उठती थी
शायद उसमें भी
विशालता को पाने की
कुछ ज्यादा ही जल्दी थी।

यह भी देखा
कि ताल, झील, नदियाँ
सब धीरज धारण कर
जैसे जिम्मेदारियों से दबे हुये
इन नयी बूँदों की प्रतीक्षा में थे
यह भी देखा
कि ये बूँदें
जलराशि में
इतना घुलमिल गई थी
कि उनको पहचान पाना भी
अब लगभग असम्भव था।

मैंने अपने चारों ओर की दुनिया देखी
तो मुझे बूँदों का बर्ताव
कुछ जाना पहचाना सा लगा
और यह ख्याल आया
कि शायद
विशालता के लिये
स्वयं को खो देना
पहली शर्त है। 


Fyodor Dostoevsky has been considered as one of the founders of twentieth-century existentialism and by saying that I can hint that this short story is also an 'existentialist' work. 'The dream of a ridiculous man' may be among the first works of existentialism along with Dostoevsky's 'Notes from the underground.' In this story, Dostoevsky describes a dream, that the protagonist of this story had and via that dream he expresses his views on philosophical questions such as why do we exist or what is the purpose of the life. Central to the objective of this story is the thought that has gone to the questions like what has happened to humankind and why did that happen.

'The Dream Of A Ridiculous Man' by Fyodor Dostoevsky
Divided into five chapters, this short story is a tale of a man who is devoid of any purpose in life and decides to end his life. Then he dreams something which changes the whole narrative of the life for him. In the earlier chapters, Dostoevsky describes the condition of the protagonist in which he knows many things and because of that, he is in a state of bliss. He says that he need not explain that to anyone because no one will understand. This theme can be found in other writers of the 'existentialism' genre such as Jean-Paul Sartre and Albert Camus. In their works also, we can see that protagonist wonders what others are doing and does that have any meaning.

As for as the purpose of the life is concerned, there have been philosophical questions such as if there is no purpose of life, should one end it. If the whole universe is devoid of any meaning should one commit suicide? Albert Camus has addressed these questions in his now phenomenal work 'The Myth of Sisyphus.' In 'The Dream of a Ridiculous Man', Dostoevsky has described that even a small incidence might force a person to think about his existence and find the purpose where there was none to start with.

Dostoevsky also considers the question that what has happened to humankind and why problems like conflict, hatred, bloodshed and suffering exist. He presents a picture in which all such problems were not there and humankind was satisfied with what they had. Then first blood was spilled and things gradually become what they are now. Dostoevsky's attention to the problems afflicting the world is praiseworthy. In the end, author presents the conclusion, 'the chief thing is to love others like yourself, that's the chief thing and that's everything, nothing else is wanted - you will find out at once how to arrange it all.'


‘कवि-मन’ अज्ञेय जी के डायरी अंशों का संकलन है। साधारणतया हम किसी रचनाकार की कृति को तभी देखते हैं जब वह रचनाकार उस से पूर्णतया संतुष्ट होता है और उसे लगता है कि अब इसे पाठकों के समक्ष लाया जा सकता है, लेकिन किसी लेखक की डायरी में उसके विचार, उसके सोचने के तरीके का पता लगता है। ‘कवि-मन’ में हम अज्ञेय जी के इसी रूप से रूबरू होते हैं। इस संकलन में अज्ञेय जी ने समाज, राजनीति और साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर अपनी राय रखी है। कई जगहों पर लघुकथायें हैं जिन पर बाद में अज्ञेय जी ने शायद विस्तृत कहानियाँ लिखी हों। कुछ कविताओं के अंश हैं, जो शायद पूर्ण होने के बाद किसी काव्य-संकलन में स्थान पा गए हों।

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ द्वारा रचित ‘कवि-मन’
विभिन्न ‘टीपों’ में अज्ञेय जी का राजनीतिक वर्ग के विरुद्ध गुस्सा झलकता है। ऐसे ही कुछ विचार हमने उस दौर के अन्य साहित्यकारों की रचनाओं में भी देखे हैं, जैसे दुष्यंत कुमार की ‘साये में धुप’ और धर्मवीर भारती के ‘ठेले पर हिमालय’ के साहित्यिक निबन्ध इत्यादि। एक ‘टीप’ देखिये - “लेखक है? आज़ाद है? मारो साले को। पिटाई से न सधे बदनाम करो; संखिया-धतूरा कुछ खिला दो, पागलखाने में डाल दो। ये सब भी बेकार हो जायें तो शाल-दुशाला, पद-पुरस्कार से लाद कर कुचल दो - वह तो ब्रह्मास्त्र है।” अज्ञेय जी आज़ादी की लड़ाई में स्वयं जेल गए थे इसलिए स्वतंत्रता के बाद की सरकारों से उनकी उम्मीदें भी अधिक थीं, जिन्हें पूरा होते न देख उनका निराश होना स्वाभाविक था।

अज्ञेय जी ने पश्चिमी और भारतीय साहित्य के बीच तुलना को लेकर भी सवाल खड़े किये हैं। उनका कहते हैं कि भारतीय साहित्य पश्चिम के साँचे में क्यों ढले। भारतीय साहित्य का एक अलग और स्वतंत्र स्वरुप भी तो हो सकता है। शायद अज्ञेय जी का ऐसा सोचना सही भी था क्योंकि जिस परिवेश में भारतीय साहित्य की रचना हुई थी वह पश्चिम के वातावरण से बहुत भिन्न था और कभी कभी मुंशी प्रेमचंद के खांटी गँवई माहौल वाली कहानियाँ या उपन्यास पढ़ते समय आपको यह अहसास हुआ भी हो; या कभी धर्मवीर भारती के उपन्यास पढ़ते समय लगा हो कि यह परिवेश पश्चिम के साहित्य में नहीं उमड़ सकता। डायरी की एक कतरन में अज्ञेय जी ने पौराणिकी का अध्ययन करने वाले लोगों की पुनर्लेखन की मनोवृत्ति पर भी प्रहार किया है। उनका कहना है कि ये धार्मिक रचनायें उस समय के परिवेश के लिए उचित थीं, उसका इस समय से तुलना करना सही नहीं है।

इन डायरी के अंशों में अज्ञेय जी को अपने कवि होने का बखूबी अहसास है। उन्होंने कई ‘टीपों’ में समाज को एक कवि के नज़रिए से देखने का प्रयास किया है। और कई अंशों में तो लघु कविता का विषय ही यही है कि किसी सामान्य घटना को कवि कैसे अलग तरह से देखता है। शायद कविता के प्रसंग ऐसे ही निकलते हों। अज्ञेय जी ने एक कवि के दायित्व को भी कुछ ‘टीपों’ में स्थान दिया है। अज्ञेय जी एक सच्चे विद्रोही थे जिनकी ज़िन्दगी और जिनकी रचनायें काल और स्थान की सीमाओं को लाँघने के लिए बेताब थी और जिनके लिए प्रचलित परिपाटी को चुनौती देना लेखनी का एक उद्देश्य था। अज्ञेय जी सोचने के लिए मजबूर करते हैं। एक जगह वह सवाल करते हैं कि जैसे जनता को वही सरकार मिलती है जिसके वह लायक होती है, तो क्या समाज को वही साहित्य मिलता है जिसके लिए वह योग्य होती है।


एक महानुभाव से बात करते करते
बातचीत कुछ गलत दिशा में
चली गई
वे कहने लगे
कि कुछ लोग सदियों से
चली आ रही परम्पराओं को मानते ही नहीं
हर बात पर सवाल करके
अवज्ञा करने के बहाने ढूंढते हैं
बिना किसी बात का कारण जाने
परम्पराओं को रूढ़ियाँ कह देते हैं
ये आवारा होते हैं।

कि कुछ लोग
समाज की मशीन में
एक पुर्जे की तरह
फिट होने की बजाय
मनुष्य के अस्तित्व पर ही
सवाल खड़े कर सकते हैं
और अन्य कई होनहार लोगों को
जिनसे कुछ उम्मीद बाँधी जा सकती है
उनको अपनी चपेट में ले सकते हैं
ये आवारा होते हैं।

कि कुछ लोग
ओल्ड मांक की बोतलों के साथ
पिंक फ्लॉयड के गानों को सुनते हुए
समझते हैं कि वे
संगीत सुन रहे हैं
इस हाथ से जाती हुई पीढ़ी को
देखकर ही कह सकता हूँ
ये आवारा होते हैं।

कि कुछ लोग
समाज की प्रधानता के बजाय
व्यक्ति की प्रधानता पर
बल देने लगे हैं
अपनी संस्कृति की,
मूल्यों की,
भाषा की अवहेलना करने वाले
ये आवारा होते हैं।

फिर उन महानुभाव ने कहा
अरे बेटा!
तुमने बताया नहीं
तुम करते क्या हो?
मैंने कहा,
वही, आवारागर्दी।


धर्मवीर भारती की लिखी रचना की समीक्षा करने का भी एक अपना ही आनंद होता है। गुनाहों का देवता और सूरज का सातवाँ घोड़ा के बाद उनकी यह तीसरी रचना थी जो कि मैंने पढ़ी और यह कहा जा सकता है कि तीनों में पर्याप्त विविधता है। जैसा कि पहले भी इस बात पर ध्यान दिया गया है कि भारती जी अपनी रचनाओं की जो भूमिका या प्रस्तावना लिखते हैं वह भी अपने आप में बहुत रुचिपूर्ण होती है। अब 'अंधा युग' की भूमिका ही ले लीजिए। भारती जी ने उसमें अपनी असहाय स्थिति को बयान किया है और क्या बखूबी बयान किया है - "पर एक नशा होता है - अंधकार के गरजते महासागर की चुनौती को स्वीकार करने का, पर्वताकार लहरों से खाली हाथ जूझने का, अनमापी गहराइयों में उतरते जाने का और फिर अपने को सारे खतरों में डालकर आस्था के, प्रकाश के, सत्य के, मर्यादा के कुछ क्षणों को बटोर कर, बचा कर, धरातल तक ले जाने का - इस नशे में इतनी गहरी वेदना और इतना तीखा सुख घुला-मिला रहता है की उसके आस्वादन के लिए मन बेबस हो उठता है। उसी की उपलब्धि के लिए यह कृति लिखी गयी।"

धर्मवीर भारती द्वारा रचित 'अंधा युग'
'अंधा युग' एक दृश्य काव्य है, मतलब यह नाट्य विधा में लिखी गयी रचना है जिसके संवाद और नेपथ्य से उद्घोषणाएं काव्यात्मक हैं। ज्यादातर संवाद मुक्त-छंद और तुकांत कविता का मिश्रण हैं। शायद काव्यात्मक संवाद का चुनाव इसलिए किया गया क्योंकि सामान्य जनमानस के लिए पद्य समझना और कंठस्थ करना, गद्य की तुलना में कहीं आसान होता है। यह कारण हो सकता है कि ज्यादातर प्राचीन रचनायेें जो लिखावट के अविष्कार या सामान्य प्रचलन के पहले से ज़िंदा हैं, वह काव्य हैं। और जब गद्य और पद्य की चर्चा छिड़ी है तो 'अज्ञेय' जी की एक बात याद आ जाती है जो उन्होंने 'अरे यायावर रहेगा याद?' में कही थी - 'हमारी कविता बानी नहीं रही, लिखतम हो गई है; ह्रदय तक नहीं जाती वरन एक मष्तिष्क की शिक्षा-दीक्षा के संस्कारों की नली से होकर कागद पर ढाली जाती है जहाँ से दूसरा मष्तिष्क उसे संस्कारों की नली से उसे फिर खींचता है।'

'अंधा युग' का कथानक महाभारत युद्ध के समाप्ति काल से शुरू होता है। वैसे तो अब तक महाभारत काल की घटनाओं पर काफी साहित्य लिखा जा चुका है - जिनमें कर्ण पर लिखे गए 'रश्मिरथी' और 'सूतपुत्र' प्रमुख हैं, लेकिन 'अंधा युग' इनसे थोड़ा अलग है क्योंकि यह समाज में सच मान ली गई या सच प्रचारित की गई चीजों से अलग है। इसमें युद्ध के औचित्य को चुनौती दी गई है, कृष्ण भगवान द्वारा कहे गए शब्दों को विवाद में खींचा गया है, महाभारत में - जिसमें ऐसा कहा गया था कि धर्मयुद्ध का पालन किया गया है - कुटिल योजनाओं की झलक दिखलाई गई है। ऐसा कहा जा सकता है कि पात्रों के चारों ओर से आभा हटाकर उन्हें एक सामान्य मनुष्य की तरह चित्रित किया गया है।

'अंधा युग' में मनुष्य की भावनाओं का सजीव चित्रण किया गया है। कृष्णा ने अर्जुन को भले ही गीता में सत्य के लिए युद्ध करने का सन्देश दिया हो लेकिन युद्ध में भयानक विध्वंस देखकर सभी का मन खिन्न हो गया था। ऐसा लग रहा था कि जिन आदर्शों के लिए पूरा युद्ध लड़ा गया, वो सारे आदर्श झूठे थे। धृतराष्ट्र और गांधारी यह जानते हुए भी कि उनके पुत्र धर्म की तरफ से युद्ध नहीं कर रहे हैं, अपने पुत्रों की जीत की आस लगा रखे थे। यह उनकी ममता थी। अश्वत्थामा प्रायश्चित और बदले की भावना में जल रहा था। पूरे हस्तिनापुर में एक निराशा का वातावरण था। युद्ध के वीभत्स चेहरे को भारती जी ने बहुत अच्छे से चित्रित किया है।

प्रस्तुत दृश्यकाव्य में भारती जी ने पहरेदारों के माध्यम से किसी घटना को दूर से देखने वालों के मानसिक द्वंद्व का चित्रण किया है। पहरेदारों ने युद्ध में भाग नहीं लिया था लेकिन फिर भी राज्य की अव्यवस्था के कारण उनका मन उदास था। उन्होंने पहले राज्य का वैभव देखा था, अब राज्य का पराभव देख रहे थे। उनके माध्यम से भारती जी ने संभ्रांत वर्ग के निर्णयों का वंचितों पर पड़ने वाले प्रभावों को दिखाया है।