1.
समुद्री लहर का एक टुकड़ा
तट से कुछ दूर नाचता था
एक ऐसी धुन में
जिसे तट पर अकेले बैठकर ही सुना जा सकता था
और गिरता उठता था अपनी ही जगह पर,

सूरज की एक किरण
कई क्षण पहले चली थी अपने स्रोत से
और अपना ध्येय निश्चित कर लिया था,
अंतरिक्ष के किसी कोने से चलकर
उसे मिलना है किसी से,

एक क्षण भर के लिये बस
वो लहर और किरण मिले थे
और चमक उठा था
स्पेस और टाइम का वह कोना
अगले क्षण सब कुछ था
लेकिन ऐसा बहुत कुछ था
जो कि नहीं था।


2.
गरम लाल सूरज
डूबता है समुद्र में
और करता है संघर्ष जाने के पहले
लेकिन गहरी उच्छ्वास छोड़कर बुझ जाता है,

संघर्ष के अवशेष में बची हैं चिंगारियाँ,
कुछ चिंगारियाँ तारों के रूप में
आसमान में टँगी हैं
और कुछ चिंगारियाँ तैरती हैं समुद्र में
मछुआरों के लैम्प में।


हड्डियों का ढाँचा मात्र रह गया एक मनुष्य
ढोता है अपनी पीठ पर
अपने से कई गुना ज़्यादा बड़ी एक घण्टी
जिसमें समय आता है
तो होती है कोई ध्वनि
और वह मनुष्य
घण्टी को ढोने का कारण जान लेता है।

समय को ढोते रहना है
समय के साथ क़दम-ताल नहीं मिलाना है
समय हमारी हड्डियाँ तोड़ देगा
लेकिन हम समय को
अपने ऊपर लदा हुआ देख भी नहीं पायेंगे।

तारीखें बदलती हैं
कैलेंडर बदलते हैं
सदियाँ बदलती हैं
निज़ाम बदलते हैं
हम भी बदल जाते हैं
लेकिन समय की पकड़ ढीली नहीं होती है।

समय के भार से
हम सीधे खड़े नहीं हो सकते हैं
और देख नहीं सकते हैं रास्ता
चलते रहना है बस चलने के लिये
रुक गये
तो समय का भार और भी बढ़ने लगेगा।

समय है यहाँ
और समय यहाँ हमेशा रहेगा
समय की नज़रों में
हम आवारा हैं,
समय फिर से चाबी भार देगा
और हम दौड़ने लगेंगे।


1.
आज कसीनी ने अंतिम सिग्नल दिये हैं
और फिर विलीन हो गया है
शनि ग्रह के वातावरण में
पर उससे पहले दे गया है
पृथ्वी ग्रह की एक दुर्लभ तस्वीर
काले पर्दे में तैरता एक नीला गोला
जिसके आसपास कोई नहीं है
इतना अकेला है,
निपट अकेला,
और इसी छोटे से गोले पर
हम अपने बड़े होने के भ्रम में
आसमान सर पर उठा लेते हैं।

2.
कॉस्मोस के किसी एपिसोड में
देखा था कि कार्ल सेगन
वॉयजर वन से ली गई
धरती की फ़ोटो पर मुग्ध हो गये थे
क्या विज्ञान के लिये भी पागलपन
किसी में हो सकता है?
बाक़ी पागलपन से तो अच्छा ही होगा।
या पागलपन कोई भी अच्छा नहीं होता?

3.
सदियों से
पृथ्विवासियों ने आकाश में चमकती वस्तुओं को
मानकर रखा है
कि वो धरती पर हो रही घटनाओं का
वहीं से नियंत्रण करती हैं
क्या पता सुदूर, किसी और ग्रह पर
धरती के उपग्रह छोड़ने पर
कुछ और मानी निकलते हों।


यक्ष ऊवाच -
धर्मराज!
इन पक्षियों को देखो
इनको देखकर
समझा नहीं जा सकता है
कि इनका अस्तित्व में होना
होना है या हो जाना है
पक्षियों ने भी कोई इशारा नहीं किया है
कि कुछ जाना जा सके;
प्रकृति की आकृतियों को देखो
तो कभी लगता है
कि वे हैं
फिर कभी लगता है
कि नहीं, वे हो गयी हैं,
जहाँ आदमी से कोई कहे
कि जो हो वो रहो
लेकिन आदमी क्या है
क्या आदमी यह जानता है?
होने और हो जाने की परिभाषा क्या है?
दोनों में से महत्वपूर्ण किसे कहा जा सकता है?

युधिष्ठिर ऊवाच -
चलायमान संसार में
स्वयं का सम्पूर्ण ज्ञान हो जाना ही होना है
जहाँ अपने साथ संघर्ष नहीं होता है
और अपनी राह पर निश्चिन्त चलते रहना होता है,
और हो जाना है वह
जहाँ आदमी एक स्वयं से निकलकर
दूसरा स्वयं अपना लेता है
और छिपा देता है भूतकाल को वर्तमान में
और फिर से पा लेता है उत्साह जीने का;
पूर्ण रूप से इनमें से कोई भी अपना लेना
सत्य प्राप्त कर लेने जैसा है
और शायद दोनों राहें
कभी अदृश्य स्थान पर मिलें
और एक हो जायें
और मिटा दें होने और हो जाने के अंतर को,
तब तक दोनों में महत्वपूर्ण कौन है
यह ठीक से कहा नहीं जा सकता है।


यक्ष ऊवाच -
धर्मराज!
ये तालाब के किनारे खड़े वृक्षों को देखो
बीज से जन्म लेकर
फलदार बड़े पेड़ बनने तक के पूरे समय को देखो
और एक दिन ये वृक्ष भी सूख जायेंगे,
और ये मछलियाँ
क्षणिक जीवन में कूदते हुये
कुछ समय बाद अदृश्य हो जायेंगी,
ये तालाब का पानी आज यहाँ है
कल कहीं और, किसी और रूप में होगा,
तब इन सबके जीवन की
कभी व्याख्या होगी
और ये पूछा जायेगा
कि इन वृक्षों ने, इन मछलियों ने, इस पानी ने
जीवन भर जो किया
क्या उसको जीवन जी लेना माना जा सकता है?


युधिष्ठिर ऊवाच -
श्रीमान!
जीवन कम से कम दो कहे जा सकते हैं
(वैसे परिभाषायें कितनी भी गढ़ी जा सकती हैं)
एक वो जो जिया गया है
और एक वो जो जिया सकता है,
जो जिया जा सकता है
जब वो जी लिया जाता है
तो वह पुराना हो जाता है
लेकिन उसके बाद भी
बहुत कुछ जी सकना बचा रहेगा,
दोनों ही जीवन हमारे किये गये कार्यों से अलग
सम्भावनाओं के रूप में
सदैव अस्तित्व में रहेंगे,
अतः
जीवन जीने में
या जीवन जी सकने में
जीवन जी लेना कौन सा है
यह जाना ही नहीं जा सकता है।


मैं सुबह जब घर से निकलता हूँ
तो मैं बहुत बड़ा दार्शनिक होता हूँ,
मेरे पास
संसार की हर एक समस्या के लिये
अचूक नुस्ख़े होते हैं,
मैं मानता हूँ
कि दुनिया मेरी है
और मेरे लिये ही बनी है,
मैं ये भी मानता हूँ
कि दर्शनशास्त्रियों की थ्योरीज़ में है कोई ताक़त
और इनमें से ही कोई थ्योरी
संसार में यूटोपिया लाने का माद्दा रखती है
जिसके लिये तर्क किया जाना ज़रूरी है,
यह मंशा होती है
कि सत्य निकालकर लाया जाये
और उजाले के लिये खड़ा किया जाये
ताकि मिटाई न जा सके सभ्यता की प्रगति
और खोई न जा सके
उपलब्धियाँ मनुष्य प्रजाति की,
मैं यह जानता हूँ
कि भविष्य की राह पर चला जा सकता है
और पाया जा सकता है मोक्ष
जिस रूप में मैंने उसे देखा है,
उठा सकता हूँ
संसार का भार अपने तर्कों पर
और देख सकता हूँ संसार के पार,
देखो, मैं सुबह बहुत आशावादी होता हूँ।

शाम को जब घर लौटता हूँ
तब दर्शन सारा भूल चुका होता हूँ
और यथार्थवादी होता हूँ
(वो भी शायद अपने आप में एक तरह का दर्शन है)
दुनिया देखने के लिये सभी थ्योरीज़ के चश्मे हटाने ज़रूरी हैं
(शेक्सपीयर ने कहा था
कि स्वर्ग और पृथ्वी पर उतने से ज़्यादा चीज़ें हैं
जितने की कल्पना अभी तुम्हारे दर्शनों में की गयी हैं)
और दुनिया जैसी है
उसको वैसी ही देखने का प्रयास करता हूँ
और दुनिया कैसी है
ये जानने का प्रयास अपने अनुभव से ही कीजिये।


कहीं एक सूखा पत्ता था
मैंने उसका शाखा से मिलन कराकर छोड़ दिया।
कहीं बर्फ का पिघला पानी जमा हो गया था
मैंने पत्थर से रास्ता खोदकर उसे नदी से जोड़ दिया।

कहीं एक चिंगारी ख़त्म होने की कगार पर थी
मैंने ईंधन देकर उसे भड़का दिया।
कहीं वेदना से व्याकुल एक टहनी टूटने वाली थी
मैंने उसकी आँखों में देखकर उसे हड़का दिया।

कहीं चाँद, तारों और ब्रह्माण्ड की बातें हो रही थीं
मैंने कहा था मैं खाका खींच लूँगा।
कहीं किसी किताब के आखिरी पन्ने पर असहाय खड़ा मिलूँगा
मैं जानता हूँ कि मुट्ठियाँ भींच लूँगा।

कहीं एक लहर थी जो पत्थर चूर करने के प्रयास में थी
मैंने उसके समर्पण को देखा, और कहा, खूब।
कहीं एक आँधी चल रही थी जिसमें बड़े वृक्ष उखड़ रहे थे
उसने मुझसे अपना जवाब माँगा, मैंने कहा, दूब।

कहीं एक बारिश थी जिसमें पनपते थे नये-नये बुलबुले
मैंने रात में बल्ब की रौशनी को उसमें घोल दिया।
कहीं हवा थी ठण्ड से ठिठुरी हुयी घर के बाहर खड़ी
मैंने आमंत्रण दिया और खिड़कियों को खोल दिया।

कहीं एक साँझ थी जो दिन से बिछड़कर थी परेशान
मैंने उसे रात से बचाकर चित्र में क़ैद कर दिया।
कहीं एक सवेरा बैठा था नींद खुलने से सुस्त था
मैंने उसे पूरब की ओर लुढ़काकर रौशनी से लैस कर दिया।

कहीं समय था जो इतिहास को बदलने का निश्चय कर चुका था
मैं उससे मुखातिब हुआ और पूँछा - क्या यहीं?
कहीं एक मोटी पोथी थी जो इतिहास की धारा में बही थी
मैंने उसे पढ़ा और जवाब पाया - क्यों नहीं?

कहीं एक शब्द था अपने अर्थ से बिछड़ा हुआ
मैंने उसे परिप्रेक्ष्य देकर उसका संघर्ष कर दिया व्यर्थ।
कहीं एक छन्द था अपने रूपक से अलग-थलग
मैंने उसे एक और मानी देकर कर दिया और भी असमर्थ।

कहीं दर्द की दरिया मिली कराहते हुये धीरे चलती हुयी
मैंने शब्दों का बाँध बना दिया और कहा रुको।
कहीं हवा में झूमती एक प्रतिभावान शाखा मिली
मैंने जिम्मेदारी का बोझ उस पर लादते हुए कहा झुको।

मैं नया कवि हूँ, कुछ कहने के प्रयास में हूँ
मुझे जो मिला, मैंने जो देखा, मैंने उन्हें शब्दों में बुना।
दुनिया जैसी हमने देखी है, हम सभी जानते हैं
मैंने एक नयी दुनिया गढ़ने के लिये शब्दों को चुना।

(अज्ञेय की कविता ‘नया कवि : आत्म-स्वीकार’ को समर्पित।)


एक रेगिस्तान है
मेरी आँखों के आगे फैला हुआ
जहाँ रेत ही रेत दिखती है हर तरफ
और दूरियाँ तय होती नज़र नहीं आ रही हैं
परिवर्तन की अनुपस्थिति के कारण
मीलों फैली रेत जिसपर चलता चला जाता हूँ
एकरसता में रस खोजने,
जहाँ रेतीली आँधियाँ चलती हैं
और कुछ देर के लिये एकरसता से
ध्यान भंग कर देती हैं
ऐसा ही एक रेगिस्तान
मेरे मन के अंदर भी है
जहाँ से कोई रास्ता सुलझता नहीं है
और जो दिखता है
वह बहुत दूर एक जैसा ही दिखता चला जाता है
और इस रेगिस्तान से ध्यान हटाने के लिये
मैं रेतीली आँधियाँ खोजता रहता हूँ।

एक पहाड़ है
जिसकी ढलान पर उगे हैं
पतली पत्तियों वाले पेड़
जो खड़े हैं इतनी उंचाई पर
डर को ठेंगा दिखाते हुये
उस पहाड़ के शिखर से
पत्थर गिरते रहते हैं
आम बात है
कभी-कभी ये पेड़
उन पत्थरों को गिरने से रोक लिया करते हैं
मैं दोनों ही पात्र अदा करता हूँ
कभी पत्थरों की तरह गिरता हूँ
(लाक्षणिक रूप से)
कभी पेड़ों की तरह खुद को संभाल लेता हूँ।

एक सड़क है
जो कुछ जगहों पर उबड़-खाबड़ है
लेकिन ज्यादातर जगह सही है
जिसके दोनों तरफ हैं हरे-भरे खेत
आदमी की ऊँचाई से ऊपर तक गन्ने के पौधे,
हरियाली आकर्षक है
लेकिन सड़क को अभी चलना होगा
मंजिल की तरफ
या उससे भी आगे
खेतों की पैदावार सड़क को नहीं मिल सकती
और वैसे ही जीवन है
जहाँ हरियाली का लालच है दोनों तरफ
और पहुँच में भी दिखता है
लेकिन जीवन को
अभी दूर-बहुत दूर जाना है
उबड़-खाबड़ रास्तों पर
अभी और चलना होगा।

एक नदी है
जो आस्था की घाटी से बहते हुये
अथाह सागर की चौखट पर खड़ी हो जायेगी
हिम्मत के साथ
जिसका सानी कोई नहीं होगा,
जिस नदी में किसी पुल के पास
या किसी प्रसिद्ध घाट के किनारे
डूबे हैं श्रद्धा के अंतहीन सिक्के तलहटी में,
जब जन्मी थी हिमालय की गोद में
तब बहुत सम्भावनायें थीं
अब एक लकीर पर
पानी को चलते चले जाना है
एक राह चुनने की अब उतनी सम्भावनायें नहीं हैं
नदी की यही गति है।

एक खेत है
जिसमें धान कुछ दिन पहले रोपा गया है
जिसको सींचने के लिये
नहर से पानी लगाना पड़ता है,
और जाना पड़ता है रात में
टॉर्च लेकर जंगल की तरफ
बांधने के लिए नयी मेड़
जो रखेगी पानी रोककर,
और अगले दिन जोरदार बारिश होती है
मेड़ बह जाती है
एक चौथाई खेत के साथ,
ये भविष्य की चुनौतियाँ
मौसम की मार, तेज फुहार
खेत के कहे में नहीं हैं
खेत चाहे तो बस तैय्यार रह सकता है
मेड़ें मजबूत की जा सकती हैं शायद।

एक रात है
रात अँधेरी है
अंधेरेपन की गूँज हर एक दिशा में व्याप्त है
प्रतिध्वनि में भी अंधेरापन ही सुनाई पड़ता है
ऊपर काले-काले बादलों के धब्बे
चाँद के सामने तैरते रहते हैं
और बादल ऊपर से ही देख लेते होंगे
टूटते हुये तारे
जिसको अपनी नासमझी में
दे देते होंगे कोई नयी कहानी,
अँधेरी सड़क से
हवा उड़ाती है सूखे पत्तों को
और जब पत्तों की आवाज़ रूकती है
तो रात का सूनापन बहुत बढ़ जाता है
दूर क्षितिज में
कहीं कड़कती है बिजली
प्रकाश की एक तलवार
समा जाती है धरती के सीने में
रात की तन्द्रा टूटती है
रात जूझती रहती है
लेकिन रात नींद का त्याग नहीं कर सकती।

एक मंदिर है
पहाड़ की चोटी पर बैठा हुआ
निर्जन है
जहाँ लोग मंदिर देखने नहीं
मंदिर की छत से दुनिया देखने आते हैं,
मंदिर उम्र के उस पड़ाव में है
जहाँ सिर्फ इतिहास पर गर्व किया जा सकता है
(इतिहास गौरवशाली रहा है)
लेकिन वर्तमान में यह प्रांगण
कुछ पुरानी दीवारों का
बस एक समूह बनकर रह गया है
जिसमें बसती हैं वीरानियाँ
और बरामदों में रात के अँधेरे में गूँजती हैं
कहानियाँ एक भव्य इतिहास की,
मंदिर से कुछ दूर एक बस्ती है
जहाँ बन आये हैं छोटे-छोटे नये मंदिर कई
लोगों का आना-जाना लगा रहता है जहाँ
बूढ़ा मंदिर अचरज से भरा नहीं है
हर एक मंदिर को इस दौर से गुजरना ही है।

एक पेड़ है
जिसकी जड़ें गड़ी हैं गहरे तक
और नतीजतन
वह खड़ा है संतुलित नयी धरती पर
कभी मैं उस पेड़ के पास पहुँच जाता
तो पेड़ बड़ा खुश हो जाता
और सुनाता मुझे किस्से
पिछले ज़माने में आयी आँधियों के
जिनसे समाज को मिलते थे रूप
और इतिहास को पन्ने
बूढ़ा पेड़ मुझसे बताता है
उन आँधियों के बारे में भी
जो पेड़ों से टकराकर टूट गयीं
और बड़ी नहीं हो पायीं
एक सम्भावना बनकर बस रह गयीं,
मैं उस पेड़ की जड़ में पानी डाल आता हूँ
और मना आता हूँ कि वो हवा दे और अँधियों को,
और यात्रा है
तो दोबारा तो मिलना होगा ही।

एक समुद्रतट है
जहाँ ईर्ष्या से लहरें
कदमों के निशां मिटा देती हैं
और झगड़ती हैं एक दूसरे से,
बहुत दूर सागर की गहराइयों में
जहाँ प्रकाश पहुँचता नहीं है
वहाँ भी यात्रा के नये कारण खोज लिये गये हैं,
रेत के किनारे दूर कहीं
लहरों को लील लेने के लिये प्रयासरत हैं,
दूर कहीं एक द्वीप
सागर से बाहर निकला है
और डूबते सूरज की रौशनी में चमकता है,
रात में चाँद देखता है ऊपर से
समुद्र में मछुआरों के लैंप
किसी नयी दुनिया में
तारों से नज़र आते हैं,
मुझे एक दिन बैठना है समुद्र के किनारे
दिन से रात और रात से दिन कर देना है।

लेकिन समय एक नहीं है
समय दो हैं
पहले समय में
हम समय को धीमा करके
दूसरा समय देखते हैं
और सापेक्षता के सिद्धान्त के तहत
हमें दूसरा समय बहुत तेज भागता हुआ लगता है
समय हमसे बहुत दूर भागता है
हमारा समय पिछड़ता रहता है
एक दिन हाँफते हुये
पराजय स्वीकार कर लेता है
वह समय अब चलता नहीं है,
समय नहीं चलेगा अब
बस हमारा चलना बाकी रह गया है।

यात्रायें कभी समाप्त नहीं होती हैं
यात्राओं के बस रूप बदलते रहते हैं
यात्रायें बस देश और काल की नहीं होती हैं
रोज़मर्रा की जिंदगी भी एक यात्रा है
जिसमें श्रद्धा से
लगाना होता है गले से एक गंतव्य
और सच्चे यात्री की तरह
भटकने मात्र से घर बैठना शुरू नहीं कर दिया जाता,
सच्चे यात्री
गंतव्य पूँछकर यात्रा शुरू नहीं करते हैं
राह और मंज़िल में भेदभाव नहीं करते हैं
ये देखने नहीं जाते
जो कि देखा जा चुका है
और लेखों में आ गया है
बल्कि वह जो अभी तक आकार ही नहीं ले पाया है।


दीवारें तोड़नी हैं
इससे पहले कि वह दीवार खड़ी हो जाये
मुझे उठना है
और दीवार से टकराकर
लहूलुहान हो जाना है।

मेरे सामने भागती है एक भीड़
सबने अपने कन्धों पर लाद रखे हैं
लकड़ियों के लट्ठे
जो हैं भुजायें किसी युवा जंगल की
इससे पहले कि यह लकड़ियाँ
गाड़ दी जायें
बना दी जायें चहारदीवारी
और रोक लें मुझको
मुझे पहुँचना है
और रोकना है उस भीड़ को।

एक कांटेदार पेड़ की कुछ शाखायें
काट कर रख दी गयी हैं धूप में
कल पत्तियाँ सूख कर गिर जायेंगी
तब इस डाल को रख दिया जायेगा किसी मेड़ पर
और बाँट दी जायेगी जबरदस्ती ज़मीन फिर से
जलाना चाहता हूँ
उस डाल को किसी चूल्हे में
जहाँ से सिर्फ धुँआ निकले
कोई दीवार न निकले।

नदी के सीने को खोदकर
एक ट्रक निकला है
ढोता है बालू
जो बनवाती हैं दीवारें,
जाओ, जाओ,
बादलों से कहो कि बरस पड़ें
और बहा दे पूरा बालू,
हवाओं से कहो कि चल पड़ें
और सब छितरा दें,
और रास्तों से कहो कि वे उलझ जायें
और घूमता रहे उन्हीं में वो ट्रक
इससे पहले कि वो ट्रक अपनी मंज़िल तक पहुँच जाये
उसे रोकना है।


1.
मैं उस शरीर में बँधी हूँ
जिसके कदमों को चूमती है चाँदनी रेत
और बालों को छूकर निकलती है घाटी की हवा,
जिसके एक तरफ बहती है नदी
और दूसरी तरफ चढ़ता है आसमां,
एक वृत्त में दौड़ता हुआ वह शरीर
और हाँफता हुआ
अपने चारों तरफ़
अपनी सी दुनिया ढूँढ़ता हुआ,
ब्रह्म में भटकी हुयी
मैं उस शरीर की अल्पकालिक यात्री हूँ।

2.
मेरी खोज में न राहें मेरा कहना मानती हैं
और न ही मानता है ये सफर
मेरे उद्देश्य में
न ही कोई नीरसता है
और न ही कोई नीरवता है
हाँ, थोड़ी विवशता है
मेरी राह में
अब न जीतें हैं
अब न हारें हैं
वैसे तो मैं आत्मा हूँ
और तथाकथित रूप से बहुत महत्व की हूँ
लेकिन समय में मैं एक बहुत महत्वहीन अनुचर हूँ।

3.
और फिर एक दिन
शरीरों की इस यात्रा में
करोड़ों वर्षों के बाद
दिन ज्यादा उजले होंगे
रातें कम अंधियारी होती जायेंगी
और तब तक मैं रह गयी
रचयिता की कृति में उलझकर
तब आसमान झुलसता हुआ
मुझसे मेरी जिंदगी माँगने आ खड़ा होगा
तब मैं भागती फिरूँगी
एक नयी खोज पर चर्चा करने के लिये
मगर कहूँगी किससे
कि सूरज धरती को लील गया है।