भीड़ से मैं रोज़ाना गुज़रता हूँ
और भीड़ में एकदम साधारण चेहरे देखता हूँ
और उनमें खोजता हूँ
धरती, आसमान, दौर, दूरी,
सपने, नींद, रतजगे,
भूख, आराम, धूल, धूप
और ये औसत चेहरे हर जगह हैं;
ठेले पर मक्खियाँ हटाता हुआ एक जलेबी बेंचने वाला,
एक हाथ में नोटों की गड्डी सम्भालता हुआ
और दूसरे हाथ से पेट्रोल भरता हुआ,
बस की भीड़ में अपनी जेबें बचाता हुआ,
तीन रुपये की कलम बेंचता हुआ,
पीला हेल्मेट पहनकर इमारतें बनाता हुआ,
फ़ाइलों के ढेर में डूबा हुआ,
ऑफ़िस में सोता हुआ,
समुद्रतट पर ‘रोमैंटिक वाक' खोजता हुआ,
पार्टियों की शान बनकर रहने वाला,
मोटर साइकल आगे वाले पहिये पर रोककर दिखाता हुआ,
टी वी पर समाचार देखकर चिंतित होता हुआ,
भविष्य को देख लेने का भरोसा देता हुआ,
मंच से समस्याओं का निवारण देता हुआ,
हर एक औसत चेहरा
एक तरह से औसत ज़िंदगी जीता है,
औसत चेहरों के समुद्र में
डूबता रहता है
उतराता रहता है
जब तक साँस ज़िन्दा है तब तक,
समर्पण के पहले तक
घसीटती रहती हैं जिंदगियाँ चेतना को
समय के समक्ष
आत्म-समर्पण कर देने के ठीक पहले तक।


एक सुबह हमें बैठना है
बारिश में नीम के पेड़ के नीचे
और देखना है सूरज को रोककर रखे हुये बादलों को झूमते हुये
घोंसले से झाँकती हुयी एक गौरय्या को,
हमें उठना है और चल देना है
वहाँ जहाँ मिलते हैं धरती और आसमान
जहाँ टाँगा जाता है इंद्रधनुष
जहाँ से उठते हैं पक्षियों के झुण्ड।

एक दिन हमें बैठना है
किसी पहाड़ की ढलान पर
जहाँ बिछी हैं किसी पेड़ की
सींक जैसी पत्तियाँ,
और पिछली यात्रा के स्थान
खोजने हैं पहाड़ियों में
सोचना है कि कितनी राहें चली जा चुकी हैं
और कितनी बाक़ी हैं,
कितनी धारायें पार की जा चुकी हैं।

एक साँझ को सीपियाँ बटोरनी हैं
समुद्र के किनारे बैठकर
गिननी हैं लहरें
करना है विदा सूरज को
जैसे हम विदा करते हैं किसी प्रिय को
यह जानते हुये की अलगाव क्षणिक है
हमें मिलना ही है
और याद कर लेनी है
बीते हुये कल की दुनिया।

एक रात हमें देखना है
गिरते हुये एक पहाड़ी झरने को
जिसका दूधिया रंग चमकता है
रात के उजाले में
जैसे आसमान से उतरती हैं परियाँ,
हमें सुनना है झरने का गिरना
और व्यथित पानी का बेबस चले जाना,
कुरेदना है पानी की यादों को
और फिर छिप जाना है अपने बसेरे में।


ब्रह्माण्ड के निर्माण में
जितने भी परमाणुओं का प्रयोग हुआ है
उतने में
कुछ और भी उतने ही आसानी से बनाया जा सकता था
उन्हीं परमाणुओं के एक बहुत छोटे से समूह से
बनी हुयी हैं सारी इकाइयाँ
समस्त ब्रह्माण्ड की तुम भी
बस एक छोटी-सी इकाई मात्र हो।

'Free Will' का अस्तित्व है भी क्या?
ये जाना जा चुका है
कि शरीर की समस्त क्रियायें
रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा नियंत्रित की जाती हैं
यानी जिस समय हमें लगता है
कि हम स्वतंत्र रूप से सोच-विचार कर सकते हैं
उस समय भी कुछ रासायनिक प्रक्रियायें
हमें ठीक वैसा ही सोचने के लिये प्रयासरत होती हैं,
यह असहज करने वाला ख़याल है।

व्याख्यायें बहुत हैं
जिसने ब्रह्म को जिस तरह से देखा
उसने उसकी उसी तरह से व्याख्या की
ब्रह्म सबकी व्याख्याओं से दूर रहा
व्याख्याओं से सत्य नहीं बदलता
सत्य नाम से परे है
लेकिन नाम दिये बिना
सत्य बताया नहीं जा सकता
क्या इसीलिये सत्य जाना नहीं जा सकता?
सत्य जानने के पहले
स्वयं सत्य की परिभाषा लिखनी पड़ेगी
उसके बाद ही किसी घटना को
'सत्य' के विशेषण से नवाज़ा जा सकेगा।

बिखरी हुयी हैं galaxies
पसरा हुआ है space
और फैला हुआ है time
जैसा हमें दिखता है संसार आज
वो परिवर्तन है
वरना विज्ञान मानता है
कि समय की शुरुआत में
सब एक था
उससे पहले के समय की कल्पना बेतुकी है।

विज्ञान यह भी मानता है
कि जीवन का एक ही स्रोत है
सभी जीवों का जीवन एक ही प्रक्रिया का परिणाम है
और उनमें अंतर
विभिन्न अवस्थाओं के परिणाम हैं
(वैसे तो और भी सिद्धांत हैं
लेकिन इसे लगभग मान ही लिया गया है)
और इस तरह से
जीवन की उत्पत्ति
एक अनियंत्रित, अनियमित घटना थी।

रेल की पटरियों की तरह
जीवन जाता है घने जंगलों में
और फिर से निकल आता है उसी तरह
जंगल के दूसरी तरफ़ से
बिना किसी बदलाव के;
जीवन की कोशिश यही है
कि स्थापित हो जाया जाये
और बदलाव सिर्फ़ बाहरी हों?

रात के दिये
जानते हैं अंधकार का स्थायित्व,
विशालतम तारों से निकलने वाला प्रकाश भी
अंतरिक्ष के अंधकार पर
विजय प्राप्त नहीं कर सकता
जब तक किसी पिण्ड से टकरा नहीं जाये,
मानी तब तक मानी नहीं हैं
जब तक कोई उनमें ख़ुद को खोज न ले,
स्वतंत्र रचना
स्वतंत्र रचनाकार
क्या मात्र भ्रम हैं?

सर्द दिन की किसी दोपहर
जब माहौल सुबह-सा होगा
तब सुनहरी धूप के लिये तरसते हुये
यह ख़याल आना चाहिये
कि सूरज निर्बाध गति से
काटता है चक्कर galaxy के केंद्र के चारों ओर,
वैसे ही चमकता है,
वैसे ही चलती हैं सौर आँधियाँ
ब्रह्म के अनुपात के आगे
ये मौसम, ये दिन-रात, सुबह-शाम
सब hyperlocalized घटनायें हैं।

समय चक्रीय है
रास्ते गोल-गोल घूमते हैं
सबसे बड़ी उपलब्धि यह है
कि जहाँ से शुरुआत हो
वहीं अंत के लिए वापस आ जाना
बिना क्षय के,
और यात्रा के बारे में सोचना;
प्रकृति में सबको
यह उपलब्धि हासिल नहीं है,
समय को भी नहीं, सूरज को भी नहीं।

एक सादे काग़ज़ पर
बनाते हैं कुछ आड़ी-तिरछी लकीरें
और फिर दे देते हैं उन्हें कुछ मानी
अलग-अलग लोगों के मानी भी
अलग हो सकते हैं;
क्या जीवन भी कुछ ऐसे ही नहीं है?
सबने जीवन को
अपने-अपने मानी दे दिये हैं
क्या सिर्फ़ तुलना करके जाना जा सकता है
कि कौन सा मानी सम्पूर्ण है?
क्या अपने दिये हुये मानी से
संतोष किया जा सकता है?

मनुष्य और प्रकृति में
तालमेल भी है, प्रतियोगिता भी,
किसको प्राथमिकता है
इस बात पर अभी तक
एकमत नहीं हो पाया गया है
मनुष्य भी तो एक तरह से प्रकृति का भाग है
तो क्या यह कहा जा सकता है
कि जो मनुष्य कर रहा है
वह प्रकृति कर रही है?

दी हुयी परिभाषा
और स्वयं खोजी गयी परिभाषा में
कौन उत्तम है
यह जानने का मापक क्या हो सकता है?
(हरमन हेस के सिद्धार्थ ने इनमें से दूसरा रास्ता चुना था)
जब तक परिभाषा खोज न ली जाये
क्या तब तक जीवन जीने का इंतज़ार किया जाये?

जीवन का यूँ तो कोई प्रत्यक्ष मानी नहीं है
और यह बात सालती रही है
मनुष्य जाति को युगों से,
धर्म, दर्शन, विज्ञान, बोली, भाषा,
कविता, त्योहार, बाज़ार, भोग,
ये सब जीवन को तर्कसंगत मानी देने की कोशिशों का ही परिणाम हैं
इतना सब होने के बाद भी
यह नहीं कहा जा सकता
कि जीवन को परिभाषित कर देना
पहले से आसान हो गया है।

और लगभग तभी से
प्रयास जारी है यह जानने के लिये भी
कि मनुष्य की ब्रह्माण्ड में स्थिति क्या है,
उपनिषद में कहा गया है
'तत्त्वमसि'
अर्थात 'तुम' 'वह' हो
और इसकी व्याख्यायें भी अनेक की गयी हैं :
आत्म ब्रह्म है, ब्रह्म आत्म है;
आत्म को जान लेना ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेना है;
आत्म ब्रह्म की एक इकाई मात्र है;
आत्म ब्रह्म की एक अवस्था है;
इत्यादि,
पर उससे पहले यह जानना पड़ेगा
कि 'तत्' क्या है, 'त्वम' क्या है;
'अस्ति' के मायने क्या हैं?
physical presence या consciousness?

गौतम बुद्ध सिखाते थे स्वयं को त्याग देना
मतलब आत्म की उपस्थिति ही
सांसारिक दुखों का कारण है
इस तरह से
बुद्ध मानते थे
कि 'तत्' को 'त्वम' से जोड़ देने में
उस 'आत्म' के जीवन में
दुखों का प्रवेश हो जायेगा,
'तत्' के समक्ष 'मम' की उपस्थिति कैसी है
इस बात पर अभी विवाद है।


जितना लड़ना है इसलिये
कि कोई कारण लड़ने योग्य है
उतना तो लड़ना है ही
उससे थोड़ा ज़्यादा इसलिये लड़ना है
कि अहम् की संतुष्टि हो।

जितना जूझना है
ताकि जूझने से मुक्ति मिल जाये
उतना तो जूझना है ही
थोड़ा उसके बाद भी जूझना है
जूझने में मज़ा आ गया है।

जितना उतरना है नदी में
ख़ुद को भिगोने के लिये
उतना तो उतरना है ही
थोड़ा उसके बाद भी उतरना होगा
गहराई का अंत जानने के लिये।

जितना देखा गया है
और सहेज लिया गया है
उतना तो चित्र बनाना है ही
जो अभी अदृश्य है
उसकी भी रचना करनी होगी
ताकि भविष्य उसमें से
अपनी राह खोज सके।

जितना ख़ुद से दूर जाया जा सकता है
उतना चले जाने के बाद भी
ख़ुद से और दूर जाने की
सम्भावना बनी रहेगी,
और दूर कोनों में बैठे हैं
मेरे अलग-अलग रूप,
जो खींचते हैं जीवन को अलग-अलग दिशाओं में
पूरा जीवन जीने के बाद भी
इनमें से किसी रूप के अनुसार
जीवन जीना बचा रहेगा।


1.
समुद्री लहर का एक टुकड़ा
तट से कुछ दूर नाचता था
एक ऐसी धुन में
जिसे तट पर अकेले बैठकर ही सुना जा सकता था
और गिरता उठता था अपनी ही जगह पर,

सूरज की एक किरण
कई क्षण पहले चली थी अपने स्रोत से
और अपना ध्येय निश्चित कर लिया था,
अंतरिक्ष के किसी कोने से चलकर
उसे मिलना है किसी से,

एक क्षण भर के लिये बस
वो लहर और किरण मिले थे
और चमक उठा था
स्पेस और टाइम का वह कोना
अगले क्षण सब कुछ था
लेकिन ऐसा बहुत कुछ था
जो कि नहीं था।


2.
गरम लाल सूरज
डूबता है समुद्र में
और करता है संघर्ष जाने के पहले
लेकिन गहरी उच्छ्वास छोड़कर बुझ जाता है,

संघर्ष के अवशेष में बची हैं चिंगारियाँ,
कुछ चिंगारियाँ तारों के रूप में
आसमान में टँगी हैं
और कुछ चिंगारियाँ तैरती हैं समुद्र में
मछुआरों के लैम्प में।


हड्डियों का ढाँचा मात्र रह गया एक मनुष्य
ढोता है अपनी पीठ पर
अपने से कई गुना ज़्यादा बड़ी एक घण्टी
जिसमें समय आता है
तो होती है कोई ध्वनि
और वह मनुष्य
घण्टी को ढोने का कारण जान लेता है।

समय को ढोते रहना है
समय के साथ क़दम-ताल नहीं मिलाना है
समय हमारी हड्डियाँ तोड़ देगा
लेकिन हम समय को
अपने ऊपर लदा हुआ देख भी नहीं पायेंगे।

तारीखें बदलती हैं
कैलेंडर बदलते हैं
सदियाँ बदलती हैं
निज़ाम बदलते हैं
हम भी बदल जाते हैं
लेकिन समय की पकड़ ढीली नहीं होती है।

समय के भार से
हम सीधे खड़े नहीं हो सकते हैं
और देख नहीं सकते हैं रास्ता
चलते रहना है बस चलने के लिये
रुक गये
तो समय का भार और भी बढ़ने लगेगा।

समय है यहाँ
और समय यहाँ हमेशा रहेगा
समय की नज़रों में
हम आवारा हैं,
समय फिर से चाबी भार देगा
और हम दौड़ने लगेंगे।


1.
आज कसीनी ने अंतिम सिग्नल दिये हैं
और फिर विलीन हो गया है
शनि ग्रह के वातावरण में
पर उससे पहले दे गया है
पृथ्वी ग्रह की एक दुर्लभ तस्वीर
काले पर्दे में तैरता एक नीला गोला
जिसके आसपास कोई नहीं है
इतना अकेला है,
निपट अकेला,
और इसी छोटे से गोले पर
हम अपने बड़े होने के भ्रम में
आसमान सर पर उठा लेते हैं।

2.
कॉस्मोस के किसी एपिसोड में
देखा था कि कार्ल सेगन
वॉयजर वन से ली गई
धरती की फ़ोटो पर मुग्ध हो गये थे
क्या विज्ञान के लिये भी पागलपन
किसी में हो सकता है?
बाक़ी पागलपन से तो अच्छा ही होगा।
या पागलपन कोई भी अच्छा नहीं होता?

3.
सदियों से
पृथ्विवासियों ने आकाश में चमकती वस्तुओं को
मानकर रखा है
कि वो धरती पर हो रही घटनाओं का
वहीं से नियंत्रण करती हैं
क्या पता सुदूर, किसी और ग्रह पर
धरती के उपग्रह छोड़ने पर
कुछ और मानी निकलते हों।

(16 Sept 2017)


यक्ष ऊवाच -
धर्मराज!
इन पक्षियों को देखो
इनको देखकर
समझा नहीं जा सकता है
कि इनका अस्तित्व में होना
होना है या हो जाना है
पक्षियों ने भी कोई इशारा नहीं किया है
कि कुछ जाना जा सके;
प्रकृति की आकृतियों को देखो
तो कभी लगता है
कि वे हैं
फिर कभी लगता है
कि नहीं, वे हो गयी हैं,
जहाँ आदमी से कोई कहे
कि जो हो वो रहो
लेकिन आदमी क्या है
क्या आदमी यह जानता है?
होने और हो जाने की परिभाषा क्या है?
दोनों में से महत्वपूर्ण किसे कहा जा सकता है?

युधिष्ठिर ऊवाच -
चलायमान संसार में
स्वयं का सम्पूर्ण ज्ञान हो जाना ही होना है
जहाँ अपने साथ संघर्ष नहीं होता है
और अपनी राह पर निश्चिन्त चलते रहना होता है,
और हो जाना है वह
जहाँ आदमी एक स्वयं से निकलकर
दूसरा स्वयं अपना लेता है
और छिपा देता है भूतकाल को वर्तमान में
और फिर से पा लेता है उत्साह जीने का;
पूर्ण रूप से इनमें से कोई भी अपना लेना
सत्य प्राप्त कर लेने जैसा है
और शायद दोनों राहें
कभी अदृश्य स्थान पर मिलें
और एक हो जायें
और मिटा दें होने और हो जाने के अंतर को,
तब तक दोनों में महत्वपूर्ण कौन है
यह ठीक से कहा नहीं जा सकता है।


यक्ष ऊवाच -
धर्मराज!
ये तालाब के किनारे खड़े वृक्षों को देखो
बीज से जन्म लेकर
फलदार बड़े पेड़ बनने तक के पूरे समय को देखो
और एक दिन ये वृक्ष भी सूख जायेंगे,
और ये मछलियाँ
क्षणिक जीवन में कूदते हुये
कुछ समय बाद अदृश्य हो जायेंगी,
ये तालाब का पानी आज यहाँ है
कल कहीं और, किसी और रूप में होगा,
तब इन सबके जीवन की
कभी व्याख्या होगी
और ये पूछा जायेगा
कि इन वृक्षों ने, इन मछलियों ने, इस पानी ने
जीवन भर जो किया
क्या उसको जीवन जी लेना माना जा सकता है?


युधिष्ठिर ऊवाच -
श्रीमान!
जीवन कम से कम दो कहे जा सकते हैं
(वैसे परिभाषायें कितनी भी गढ़ी जा सकती हैं)
एक वो जो जिया गया है
और एक वो जो जिया सकता है,
जो जिया जा सकता है
जब वो जी लिया जाता है
तो वह पुराना हो जाता है
लेकिन उसके बाद भी
बहुत कुछ जी सकना बचा रहेगा,
दोनों ही जीवन हमारे किये गये कार्यों से अलग
सम्भावनाओं के रूप में
सदैव अस्तित्व में रहेंगे,
अतः
जीवन जीने में
या जीवन जी सकने में
जीवन जी लेना कौन सा है
यह जाना ही नहीं जा सकता है।


मैं सुबह जब घर से निकलता हूँ
तो मैं बहुत बड़ा दार्शनिक होता हूँ,
मेरे पास
संसार की हर एक समस्या के लिये
अचूक नुस्ख़े होते हैं,
मैं मानता हूँ
कि दुनिया मेरी है
और मेरे लिये ही बनी है,
मैं ये भी मानता हूँ
कि दर्शनशास्त्रियों की थ्योरीज़ में है कोई ताक़त
और इनमें से ही कोई थ्योरी
संसार में यूटोपिया लाने का माद्दा रखती है
जिसके लिये तर्क किया जाना ज़रूरी है,
यह मंशा होती है
कि सत्य निकालकर लाया जाये
और उजाले के लिये खड़ा किया जाये
ताकि मिटाई न जा सके सभ्यता की प्रगति
और खोई न जा सके
उपलब्धियाँ मनुष्य प्रजाति की,
मैं यह जानता हूँ
कि भविष्य की राह पर चला जा सकता है
और पाया जा सकता है मोक्ष
जिस रूप में मैंने उसे देखा है,
उठा सकता हूँ
संसार का भार अपने तर्कों पर
और देख सकता हूँ संसार के पार,
देखो, मैं सुबह बहुत आशावादी होता हूँ।

शाम को जब घर लौटता हूँ
तब दर्शन सारा भूल चुका होता हूँ
और यथार्थवादी होता हूँ
(वो भी शायद अपने आप में एक तरह का दर्शन है)
दुनिया देखने के लिये सभी थ्योरीज़ के चश्मे हटाने ज़रूरी हैं
(शेक्सपीयर ने कहा था
कि स्वर्ग और पृथ्वी पर उतने से ज़्यादा चीज़ें हैं
जितने की कल्पना अभी तुम्हारे दर्शनों में की गयी हैं)
और दुनिया जैसी है
उसको वैसी ही देखने का प्रयास करता हूँ
और दुनिया कैसी है
ये जानने का प्रयास अपने अनुभव से ही कीजिये।