समन्दर से खींचकर
किनारे पर लगा दी गयी नाव को
जैसे जीवन से उठाकर
मृत्यु के दर्शन दे दिये गये हैं,
लकड़ी के पटरे
जिन्हें लहरों की गति नापने की आज़ादी थी
आज रेत की शय्या पर बैठकर दिन जाया करते हैं
और समय ने कई बार देखा है
कि एक-एक करके ये लकड़ियाँ
गायब होती चली जाती हैं,
धूल की परतें
नाव का जीवन धूमिल कर देंगी
कभी-कभी कुछ लहरें नाव तक पहुँच जाती हैं
और ऐसी आवाज़ होती है
जिसे बड़ी तड़प में ही शायद सुना गया है
जीवन का एक टुकड़ा मिलते ही
नाव बिलख उठती है
जिसके आँसुओं को समीर बिखरा ले जाती है।

पर क्यों,
नाव को समन्दर में ही क्यों जाना है,
और कोई तरीका नहीं निकाल सकती क्या ये नाव
समय में विलीन होने का?
जलाने के लिये लकड़ियाँ,
बच्चों के लुकाछिपी खेलने का स्थान,
यात्रियों के लिये चित्र लेने का स्थान
जिसके पार्श्व में सूर्यास्त सावधानी से लगाया गया हो,
कितने सारे कार्य हैं
जिनमें नाव उद्देश्य पा सकती है,
लेकिन खोज पाती नहीं हैं।

और यह मात्र देखकर जाना नहीं जा सकता
कि ये नाव
समन्दर में जाने की आदी क्यों हैं।


मुझे बूँदों का संगीत सुनना था

एक बेहद बेसुरा संगीत
जिसमें फड़फड़ाती हैं भुजायें बूँदों की
धरती की सतह पर
चोट कर आवाज़ निकालने से पहले
और भागती हैं
हवा की क़ैद से
जैसे हवा स्वयं भागती है बांसुरी की क़ैद से।

सुनना था वह संगीत
जिसे बूँदें बादलों से उठाकर
लहरों को सौंप देती हैं
जिसे समुद्र की गहराई में
सुरक्षित रखा जा सके
जिसे लहरें किनारे पर ला पटकती हैं,
जिसे सुनाया ही न गया हो
क्या उसे भी संगीत कहा जा सकता है?
दो खूँटियों से बंधे तांबे के तारों से
कहीं कम संगीत तो नहीं जमा है इन बूँदों में?

छप्पर से टपकती हुयी बूँदों का
दोहराव से रहित
बने नियमों से अलग
गिरना निरंतर जारी है
जैसे उँगलियाँ बरसती है पर सारंगी पर
और खो बैठती हैं सुरों की सारी समझ
मैं अगर बूँदों का संगीत समझने के काबिल भी होता
तो भी क्या मैं समझ पाता?


छज्जों की कई परतों से,
जो कि एक दूसरे से कई फीट की दूरी पर हैं,
गिरती हैं बूँदें
और खिड़की से निहारती हैं
एक कृत्रिम संसार
और सूँघती हैं उदास करने वाला उच्छ्वास
इन बातों के मशविरे
बादलों की दुनिया में कहीं नहीं हैं।

कारखानों की काली धूल से दबी पत्तियाँ हैं
जहाँ बूँदें आश्रय लेती हैं
कुछ देर के विश्राम के लिये,
कालिख से सन जाती हैं बूँदें
दम घुटता है
धरती पर गिरती हैं
बूँदों का टप-टप बढ़ चला है
या बैठा पेड़ वहाँ बड़बड़ाता है।

पहली बार में एक बूँद गिरी थी
धरती प्यासी थी
बूँद को खुले हाथों ले लिया था धरती ने
हमें वह बूँद खोजनी है
ट्यूब वेल लगाओ, कुँए खोदो
नहीं, हिम्मत नहीं हारनी है
आखिरी बूँद तक उलच देंगे
पहली बूँद खोजते-खोजते।

पसरी थी लम्बी क़तार कारों की सड़क पर
मंज़िल तक पहुँचने के लिये बेताब
कुछ बूँदें गिरती हैं
अफरा तफरी मच जाती है
लोगों के कवच बाहर निकल आते हैं
बाकी भागते हैं शरण के लिये
जैसे दूसरे ग्रह के वासी उतर रहे हैं धरती पर;
बूँदों, तुम्हारा स्वागत हर जगह नहीं होगा।


उच्छ्वास - Exhalation.


वो लौ बहुत धुँआ छोड़ती है
और शीशे पर पुती कालिख के कारण
पूरी तरह बाहर दिख भी नहीं पाती है
अहाते में एक खूँटी पर टँगी है लालटेन
तेज हवा चल रही है
संघर्षरत लौ भभकती है
लौ के दोनों किनारे
आसमान छूने को लपकते हैं।

बौराया हुआ एक कुत्ता
टीन की छत के नीचे आकर बैठ गया है
भौंकता है न जाने किस पर
लौ की अनिरंतरता पर
या हवा की साँय साँय पर
या भौंकने के सिवा कुछ कर नहीं सकता
तो अब बस भौंकता ही रहता है।

अँधेरे की इस यात्रा में
लौ के साथी चाँद-तारे आज नहीं आयेंगे
ये हवा से कहला भेजा है
सलाह भी दी है
कि लड़ते रहना
लड़ाई का कारण पता चलने तक
अगली लड़ाई में
इस लड़ाई में तुम्हारे योगदान के लिये
तुम्हारे ऊपर कवितायें लिखी जायेंगी।

ठिठुरती हुयी लौ
बढ़ती रही रात के पथ पर
जूझती रही स्वयं से
लड़ाई के औचित्य के सवालों पर
मंदिर के दीये की तरह
लालटेन की लौ की उपासना क्यों नहीं होती?


बालकनी का एक कोना है
जिसमें गिरते हैं अमलतास के फूल
और हवा से इकट्ठे हो जाते हैं
दूसरे कोने में,
खिड़की के कोने से
एक नयी इमारत दिखती है
जिसके कोने में मशीनें लगी हैं
हड़बड़ी में
चार कोनों से स्थान को घेर लेने में;

बादलों का एक कोना
उमड़ते-घुमड़ते हुये
अचानक ठिठकता है
पीछे मुड़कर देखता है
सड़क के कोने में
एक वर्ग मीटर के चटाई पर बैठी
गुटखा बेंचती हुई एक महिला को
और बरसता नहीं है;

समुद्र तट का एक कोना
जिसमें सीपियाँ भर-भर कर पड़ी हैं
हाँ, तुम कहोगे तो तुम्हारे लिये कुछ रंग-बिरंगी ले आऊंगा
जिन्हें तुम सजाकर रख देना
ड्राइंग-रूम के किसी कोने में;

एक सफ़र है
जिसके कोने में दो शख्स चलते हैं
लेकिन बीच में मिलने तक
वो कुछ और हो चुके होते हैं
एक दूसरे से बचने के लिये कोना खोजते हैं,
सफ़र कहीं कोनों में खोकर समाप्त हो जाता है;

नींद के कोने में
एक सपना उगना अभी शुरू हुआ है
सपने के कोने में
तुम्हारी आवाज़ धीरे-धीरे तेज होती जाती है
मैं सहसा जाग पड़ता हूँ
आँख के कोने से देखता हूँ
नहीं, ऐसा तो कुछ दिखता नहीं है
अँधेरे के कोनों में;

मैं सभी कोनों को
किसी कोने में छिपा नहीं सकता हूँ
मन के कोने से बस देख सकता हूँ
जीवन के किसी कोने में पहुँचकर
सभी कोनों को
ब्रह्म के किसी कोने में सौंप देना होगा।


मैंने कहीं पढ़ा था
कि किसी कविता को पढ़ते हुये
विचारों की एक ही श्रंखला से
दो व्यक्तियों का गुजरना
और भावनाओं की लहरों में
अपने समझबूझ की नाव पर बैठकर
एक ही तरह से हिचकोले खाना,
किसी आत्मीय को
शब्दों के माध्यम से ढूँढ़ लेने जैसा है
और मैंने सोचा था
कि शब्दों का यह जोड़
जिसके मतलब अनगिनत, अनिर्धारित होते हैं
उसमें किसी एक ही कल्पना के
दो मन में एक साथ आ जाने की सम्भावना
न के बराबर होती है,
उस स्थिति में
हमें एक कविता की कुछ पंक्तियों के
मानी मिले हैं एक जैसे,
असंख्य किताबों की असंख्य कविताओं में
एक वो कविता है
जो कहीं दूर से
धीरे-धीरे
हमारी आत्माओं में घुलने लगी है।


तुमने कह दिया है
और यह बड़ी बात है।
जिस दौर में
सांसें चलती रहें
बस यही जीवन का पर्याय हो जाये
जहाँ हम अपने आसपास की मुश्किलों को देखकर
आंखें मूँद लें
और मान लें
कि कुछ बदलाव लाना हमारी जिम्मेदारी से बाहर है
जहाँ शोषण के खिलाफ
कुछ भी बोलना बस खानापूरी रह जाये
जहाँ कोई कुछ सोचता न हो
और मान लेता हो
कि अच्छा दौर उसके बिना कुछ किये
आखिरकार आ ही जायेगा
जिस दौर में कोई अन्याय के विरुद्ध लड़ता न हो
किसी की जिंदगी प्रभावित न होती हो
जिस दौर में अख़बारों की सुर्खियाँ
आवारा भीड़ के कारनामों से भरी रहती हैं
लेकिन उन पर अपनी सहूलियत के मुताबिक़
चुप रहा जाये
जहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मायने
किसी स्वप्नलोक समाज की परिकल्पना के आगे धूमिल हो जायेंगे,
उस दौर में तुमने व्यवस्था के विरुद्ध कुछ कह दिया है,
और यह बड़ी बात है।


धरती के किसी कोने में
कृत्रिम सुंदरताओं से बहुत दूर
बादलों से रहित साफ़ आसमान की सजावट में
तारों की एक दूधिया उजली पट्टी है
जिसके आकर्षण में
आकाश में और कुछ देखना नहीं होगा,
जो क्षितिज के
एक कोने से दूसरे कोने तक सरपट चली जाती है
जिसमें दिखते हैं रंग संसार के,
तारों की आकृतियाँ
और उन आकृतियों के नाम निकालने की चुनौती,
इन्हीं तारों के काफिले से भटका
एक तारा हमारा सूरज भी है
जो आकाशगंगा के किसी और कोने से
इन्हीं अनगिनत तारों की पट्टी के
किसी कोने में मौज़ूद
अपनी पहचान के लिये तरसता होगा,
इस उजली पट्टी के चार कोनों पर
चार तारों को गाड़कर
हमारा ग्रह उसमें तस्वीर देखने की कोशिश में लगा है,
और अंतरिक्ष के ललाट की शोभा बढाती
एक आकाशगंगा है
सुंदरता की कोई भी परिकल्पना
जिसके बिना अधूरी होगी।


उजालों की दुनिया से कोसों दूर
नुकीले पहाड़ों से टँगी एक घाटी में
अँधेरी रात के पर्दे में
छोटे-छोटे, लाखों-करोड़ों हमसफ़र मौज़ूद हैं
जहाँ से प्रकाश हम तक पहुँचने में
सदियाँ लगा देता है
(कुछ उससे भी दूर हैं)
जिन्हें देखा है
परियों वाले नाट्यमंचन में
मंच के पीछे पर्दे में
कई कोनों वाली
कार्डबोर्ड की चमकती आकृतियों में,
ऐसे तारों को देखना
सच्चाई के आमने-सामने खड़े होने जैसा है,
वो विशाल तारे भी हैं
जो आसानी से
सैकड़ों ये सौर-मण्डल लील जायें,
ऐसे तारों से बनी हजारों आकाशगंगायें हैं,
जहाँ सुपरनोवा जैसी घटनायें
चलती रहती हैं कई-कई उम्र तक,
अब आकाशगंगाओं के समूह भी पहचान लिये गये हैं
इन समूहों के समूह भी विचरते रहते हैं
दूर-दूर तक परिभाषाओं को खींचते हुये,
यह विराट का चित्र है
जिसमें एक मनुष्य नाम की संरचना को
कहीं खोजा नहीं जा सकता है,
कभी-कभी
अपने अस्तित्व का सही-सही आँकलन करना
जरुरी हो जाता है
तब चकाचौंध से दूर
रात के आकाश को एकटक निहारने
किसी निर्जन जगह जाना होता है।


एक दिन हम नहीं बोलेंगे
या तो बंदूकें हमारे लिये बोला करेंगी
या बंदूकें हमारी ज़ुबान छीन चुकी होंगी।

एक दिन जब हमारे तुम्हारे मतभेद बहुत बढ़ जायेंगे
विचारधारायें जो वैसे तो सिंहासन से उतरती नहीं हैं
लेकिन हमको दूर करने उतरेंगी
और हम एक दूसरे को सुनने की जगह
अपनी बातें सुनाते रहेंगे
इसके बाद भी अगर मतभेद दूर नहीं होते हैं
तो हम बंदूकें चलाकर तुरंत मतभेद हल कर लिया करेंगे।

एक दिन विरोध के तरीके बहुत बदल जायेंगे
ये भाषण, ये लेख, ये सभायें
ये पैम्फलेट, ये गोष्ठियाँ
ये सभ्य मानवों के वार्तालाप
हमारे विरोध को जताने में नाकामयाब रहेंगी
ये मतभेदों का सम्मान जैसी बातें हवाई लगने लगेंगी
तब हम बंदूकें उठाकर अपना विरोध जता देंगे।

एक दिन बंदूकें जिंदगी बहुत आसान कर देंगी
तब जो सुनने में असहज लगता है
उसे आसानी से चुप करा दिया जायेगा
जो लोगों से अभी करा पाना मुश्किल है
तब वो भी करा लिया जायेगा
एक दिन हम सम्मेलनों की मेजों पर
बंदूकें भेज दिया करेंगे
जिनकी बंदूकें ज्यादा आधुनिक होंगी
वो अपने पक्ष में फैसले लिवा लायेंगे।

(गौरी लंकेश, पंकज मिश्र, राजदेव रंजन, कलबुर्गी, रुद्रेश,  पानसरे, लक्ष्मणानंद सरस्वती, दाभोलकर, सन्दीप कोठारी और वैचारिक मतभेद में मारे गये अन्य अनेक अनाम लोगों के नाम।)