मैं कोई पत्र लिख रहा हूँ
जिसमें बयाँ न हो सकने वाली बातें हैं
और अपवाद स्वरूप मैं शामिल कर लेता हूँ
तारों के टूटने के कुछ चित्र
जिससे तुमको यकीन हो
कि मैं भी इसी ब्रह्माण्ड का सदस्य हूँ,
चला देता हूँ
समय के चक्र को
नाच उठती हैं घटनायें
बहुत सम्भव है
समय की चक्रीय अवधारणा में विश्वास रखते हुये
कभी खुद को पत्र लिखते हुये देख सकूँ।

तुम मेरा पत्र पढ़ रही हो
जो बातें पढ़ी नहीं जा सकती हैं
तुमने पत्र को समय की दिशा में रखकर
उनके सारे मानी भांप लिये हैं
और किसी सुपरनोवा की रोशनी की तरह
तुम्हारी आँखें चमक उठती हैं
भाव से भर उठती हैं,
यह याद करती हो
कि ब्रह्माण्ड में इतना रिक्त स्थान है
कि दो तारों के टकराने की संभावना नगण्य है।

समानांतर संसारों में
हमारी दुनियाएं ऐसे ही चलती रहती हैं
कभी कोई प्रतिभावान भौतिक विज्ञानी
अपनी थीसिस में
ऐसे संसारों के बीच कोई खोई हुई कड़ी ढूँढ़कर जोड़ देगा
और हमारी दुनियाएं मिल उठेगीं।


एक दिन जो ये टीले हैं
इनके पत्थर चूर होकर
रेत के कणों में बदल जायेंगे
और किसी आँधी में दूर कहीं उड़ जायेंगे
ये नदियों का बचा-खुचा पानी
सागर की शरण लेगा
और अपने जीवन को फिर से दोहरा देगा
इन खण्डहरों की अंतिम ईंट भी
एक दिन इतिहास को कोसने के लिये नहीं बचेगी
कई पीढ़ियों बाद संसार के लोग ऊब जायेंगे
और इतिहास के महत्व को नकार देंगे
तब यहाँ के रास्ते वीरान नज़र आयेंगे
तब कहा जायेगा
कि काल भटकता रहा देश में
जिस परिणति के लिये
जिस स्थायीपन के लिये
वह अब उसे प्राप्त हुआ,
पूछा जायेगा कि अंतिमता अनाकर्षक क्यों है?

और बाहरी अंतिमता के उस दौर के बाद
शायद मनुष्य आंतरिक अंतिमता की तरफ उन्मुख होगा
जहाँ फिर एक दौड़ शुरू होगी
जीवन को मतलब से सजा देने की,
कलम से कलम लड़ेगी
और वादों के टकराव शुरू होंगे
व्याकुलता के नए दौर शुरू होंगे
अस्तित्व का संकट फिर उठ खड़ा होगा
और अंतिमता की खोज ही अंतिमता बनती जायेगी,
क्या अंतिमता मात्र एक मृग-मरीचिका है?


अबकी बार जब आओगे तुम
कुछ नयी मिसालें लेकर आना,
पिछली बार तुम जिन मिसालों को लेकर आये थे
उन्हें आज़माकर देखा है मैंने,
कॉफी की चुस्कियों के साथ
एक अज़नबी दुनिया पर मढ़कर
वो मिसालें जब तुमने मुझे सौंपी थी
तो विरासत की कोई चीज समझकर
मैंने संभालकर रख ली थी,
किंवदंतियों का उपासक मैं अकेला नहीं था,
लेकिन धरातल पर आते-आते
वो मिसालें असहज होने लगीं
शायद आसमान में रहने की आदत से
ये मिसालें कुछ ढीठ हो गई थी
और मुझसे कुछ कहासुनी भी हुई,
अबकी बार जब आओगे तुम
कुछ नयी हिदायतें लेकर आना
ताकि उन मिसालों को उपयोग में लाया जा सके
और यह जाना जा सके
कि जंगल से दूर एक पेड़ कब तक बचता है

अबकी बार जब आओगे तुम
कुछ नयी मिसालें लेकर आना


कल:
वो बेचैनियों के उस दौर में था
जहाँ खालीपन उपासना की चीज थी
अकेलेपन के सान्निध्य में न जाने
कौन-कौन से विचारों की यात्रायें होती थीं,
जहाँ बैठकर वह सोचता था
कि अगर दुनिया ऐसी भी हो तो क्या गलत है,
जहाँ लकीर का फक़ीर न होना एक साधारण बात न रहकर
एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी बन जाती थी।

बेचैनियाँ भी वहीं थी
जो कभी न कभी अन्य से भी रु-ब-रु हुई ही थीं
पर उसके साथ हादसा हुआ था
बेचैनियाँ गई नहीं
उसमें समा गईं,
और वह उन्हीं बेचैनियों को सौंपता रहा
ज़माने के सही-गलत के मापदण्ड
जहाँ से कुछ नहीं निकलता था
बस एक ढर्रा
और सफलता-असफलता के मानक,
बेचैनियाँ बढ़ती गईं
उनकी ओट से देखा उसने सतही बातें
दुनिया को नई तरह से देखने की कोशिश भी की
लेकिन प्रकृति के कैनवास पर
सदियों से चढ़ाये कृत्रिम रंगों पर
उसके रंग बहुत देर टिक नहीं पाये,
उसकी बेचैनियों के शब्द
वाइजों के लिये परेशानी के सबब थे,
लेकिन वह चलता रहा
उस राह पर जहाँ मिलती थीं
कई राहें बेचैनियों की,
आवारापन की, पागलपन की
उन राहों पर जहाँ चलकर
अपने सामान्य रूप में
कहते हैं कि कोई लौटता नहीं।

आज:
वो पागल नहीं है
सभ्य लोगों के तौर-तरीके
उसने अपना लिये हैं
ये कैसे हुआ
किसी को नहीं पता,
सुना है कि सभ्य बनने के बाद
बहुत समय तक उसकी आवाज़ गायब थी।


जिन्दगी के दो छोर हैं,

पहला, जहाँ आत्म को एक रूप मिलता है
ब्रह्म से कुछ अलग
और जन्म लेती हैं सम्भावनायें
निराकार से साकार निकलता है
बिलख उठती है इकाई संरक्षण खोकर
हर एक रचना का
जो सबसे सशक्त रूपक है -
जन्म,
लो मिला,
पौ फूटती है
जीवन जितना लम्बा दिन लो शुरू हुआ।

दूसरा, जहाँ सम्भावनायें नियति से मिलती हैं
और किताब के अन्तिम पन्ने जैसी
एक संतुष्टि लिये रहती हैं
आत्म और परमात्म अलग नहीं रहते हैं
सार्थकता और निरर्थकता की बहस
मानी खोने लगती है
समय में गोधूलि वेला के रंग मिलने लगे हैं
घर चलें,
ब्रह्म में लीन होने का समय है
चलो,
पटाक्षेप।

इन्हीं दोनों छोरों के बीच
हम बाँधकर एक डोरी और उस पर चढ़कर
फासला तय करने का प्रयास करते हैं
कई बार देखने वाले तालियाँ खूब बजाते हैं
जहाँ दर्शकों के आनन्द के लिये
एक पैर से रस्सी पार करने से पहले
एक पल भी नहीं सोचते हैं
वो जो डोरी कहीं उलझी हुई रखी है
उसे देखने कौन जाता है
इस खेल का नाम जानते हो?
लो, मैंने कहा - जीवन।

अब निरपेक्ष होकर देखो,
जन्म एक घटना है
मृत्यु एक घटना है
जीवन जो बहुत बड़ा लगता है,
वो भी एक घटना है,
और ब्रह्म में ऐसी घटनायें होती रहती हैं।

(हरमन हेस की एक रचना से प्रेरित)