खण्डहर ऐसे ही थोड़े बनते हैं
एक मज़बूत इमारत ऐसे ही थोड़े ग़ायब हो जाती है,

तथ्यों की एक-एक ईंट जोड़कर
उसने एक मज़बूत नींव बनायी होगी
तमाम भट्ठों की
अच्छी से अच्छी, जाँची-परखी हुई तथ्यों की ईंटें
जिन्हें बनाने में किन्हीं कारीगरों ने
सैकड़ों साल लगा दिए होंगे,
फिर उस नींव को
मुख्यधारा रूपी ज़मीन के नीचे
दबाया होगा
और विचारों की इमारत खड़ी की होगी
पहली बार में अगर अच्छे से न बना हो
तो उसने लच्छेदार भाषा का लेप भी लगाया होगा
आने-जाने वाले लोगों ने
उस इमारत की बहुत तारीफ की थी,

लेकिन विचारों की बस इमारतें ही नहीं होती हैं
विचारों की आँधियाँ भी होती हैं
चिन्तन के उच्च दबाव वाले क्षेत्रों से उठने वाली ये आँधियाँ
रास्ते में आने वाली विचारों की इमारतों को
धराशायी कर देती हैं,
तमाम आंदोलनों की, तमाम वादों* की ये आँधियाँ,
उसकी भी इमारत बच नहीं पायी थी
नींव अभी भी बची थी
तबाही की दास्ताँ सुनाने के लिए,
मजबूत थी या शायद ओझल थी,

ऐसी इमारतें हर रोज़ कहीं पनपती हैं
और खण्डहर बनकर रह जाती हैं,
शायद तुमने भी दो पैरों पर
चलते-फिरते खण्डहर देखे होंगे, अदीब?

*(वाद - ism)


उस शाम को
तब तक तो कोई उल्लेखनीय बात नहीं थी
वहाँ कुछ पीछे छोड़ देने पर विजय-भावना
पूरे माहौल में सुगन्ध की तरह फैली थी
जीवन का एक समारोह-सा हो रहा था
स्वर-लहरियाँ एक के पीछे एक दौड़ रही थीं
जीवटता वाद्य-यंत्रों से छन-छन कर आ रही थी
और तट के किनारे
जीवन का नृत्य जोरदार चल रहा था,
सूरज भी इन्हें देखने टीले के पीछे चला आया था।

लेकिन उस शाम एक अजीब बात हुई
उस शाम सूरज अस्त नहीं हुआ
मद्धम लहरों के ऊपर आ खड़ा हुआ
और नाचने लगा
वातावरण ने सूरज की लाली को आत्मसात कर लिया
उस शाम की अन्तिम किरणें
जैसे हर किसी के अंदर आकर बस गईं
और नयी स्फूर्ति के साथ
जीवन का नृत्य और भी जोरदार हो गया
इन सबको देखकर सूरज और भी बहक गया
समुद्र की सतह पर तरह-तरह की आकृतियाँ बनाने लगा
लहरों को अपने से दूर हमारी तरफ भेजने लगा
उस दिन सबने देखा था
कि सूरज अस्त नहीं हुआ था
बल्कि उसके पहले ही एक नया सूरज उग आया था
लाल, उत्साहित, नया, नहाया हुआ-सा
समय एक क्षण के लिए थमा
हम सबने सुनी अपने अंदर एक ध्वनि
एक चिर-परिचित ध्वनि
जो हमारे अंदर ही कहीं तिरस्कृत-सी रहती है
उस ध्वनि के शुरू हो जाने के बाद
अब वहाँ रहना प्रासंगिक नहीं रह गया था
हम नए उगे सूरज का
थोड़ा-थोड़ा अंश लेकर लौट आये थे।


Robert M. Pirsig had difficulty in finding a publisher for the book 'Zen and the Art of Motorcycle Maintenance.' In fact, this book holds the records of the most number of the rejections before getting published. As Pirsig says in the introduction that this book is not much related to the Buddhist branch Zen and is not too factual on the motorcycles either.' In this book, Pirsig goes on a travel on a motorcycle from Minnesota to San Francisco, but this is not the main theme or content of the book. During this travel, Pirsig undertakes a discussion of a major schism in the current philosophical thought, which is the major theme of the book. Based on his own experience in the college and in the life, Pirsig presents this ‘inquiry into values.’

'Zen and the Art of Motorcycle Maintenance' by Robert M. Pirsig
In the initial chapters, Pirsig discusses the scientific method. He says that to reach a conclusion while following a scientific method, one has to have many hypotheses and then verify these hypotheses in a controlled experiment disinterestedly to reach a conclusion and the conclusion thus arrived explains the observed behavior. Pirsig says that since an observation can have an infinite number of hypotheses to explain it, it is difficult to have one true hypothesis. Contrary to the impression of objectivity that is given to science, the formation of a hypothesis may be a work of intuition (credited to Einstein in the book). Pirsig notes that these are 'strange words for the origin of scientific knowledge.'

In the current system of thought, there are two broad categories - Romantic and Classical. The Romantic school of thought is concerned with the appearance, being and some level of mysticism. It is concerned with beauty and other aesthetic values. The Classical school of thought, on the other hand, is concerned with knowing things in detail, knowing what causes a process to happen in a certain way and only in that way. This is much closer to the discourse that the western philosophy has embraced for last two thousand years. The questions that Pirsig asks are does classical school has no beauty. Are romantic and classical schools so incompatible?

In last few chapters of the book, Pirsig cites historical figures such as Aristotle in the discussion of rhetoric and dialectic. As Aristotle said that 'Rhetoric is an art because it can be reduced to a rational system of order.' Pirsig, a believer in dialectic (where a person investigates the veracity of an opinion), Pirsig could never accept this. A good Rhetorician never follows a rule and howsoever one tries, it can never be established that certain rules make a better rhetoric. Rhetoric represents quality and dialectic represents truth and we need to find a way so that these two can co-exist. In the ancient times, quality and truthfulness co-existed, but later philosophical traditions separated them leading to many of the problems of current thought.

Throughout this book, Pirsig narrates the story by two of his versions. His past self, whom he has named Phaedrus, is looking for the reason and rationality. Because of this, he has to undergo hardships as his doubts could not be clarified by the big names in the relevant field. He was deemed to be an unorthodox person. His current self is more compromising and able to make amends. Pirsig’s son Chris, his companion on the bike trip, had seen his past. That is why whenever Pirsig sunk into deep philosophical thoughts, Chris got worried that he may be returning to his past. At the end of the book, the author reconciles himself with his past.


तुमने कभी रेलगाड़ी से बाहर
पानी फेंककर देखा है, अदीब?
कुछ दूर तो वह एक रेखा में धार बनकर चली जाती है
फिर अचानक 90 अंश के कोण पर
हिंसात्मक रूप से छितराकर
बहुत तेजी से ओझल हो जाती है।
तुमने वहाँ दर्शन देखने की कोशिश नहीं की?
कै़द करके रखी हुई किसी राशि की अकुलाहट,
या यूँ ही विभिन्न आयामों को आत्मसात कर लेने की उद्विग्नता,
या अनेक घटक इकाइयों में प्रतियोगिता,
या फिर सार्थकता की तलाश में निरंतर प्रयासरत कुछ बूँदें।
तुमने दर्शन वहाँ नहीं देखा
जहाँ उसे देख पाना बहुत आसान था,
तुमने उसे देखा मन और पदार्थ के विभाजन में
नियंत्रित और नियंता की परिभाषाओं में 
सत्ता के प्रतिष्ठानों की बनावट में
भूत और भविष्य के सम्बंधों के निर्धारण में।
तो पानी की धार के व्यवहार को
एंट्रोपी बढ़ाने की एक सरल परिभाषा में गढ़कर
आसानी से बातों में उड़ा देना 
उचित ही है न, अदीब?


'कितने पाकिस्तान' कमलेश्वर का लिखा हुआ एक प्रयोगवादी उपन्यास है। इस उपन्यास को 2003 के साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया था। यह उपन्यास बाकी उपन्यासों से कई मामलों में अलग है। पहला, इसमें सामान्य घटनायें, जैसे उपन्यासों में होती हैं, नहीं हैं, बल्कि ऐतिहासिक घटनाओं का लेखक के नज़रिये से वर्णन है। दूसरा, पात्र बहुत कम हैं। ऐसा कहना भी सर्वथा उचित ही होगा कि मुख्य पात्र समय है क्योंकि सारा कथानक उसी के इर्दगिर्द घूमता है। उपन्यास में सदियों से चले आ रही हिंसा और मारकाट के प्रति गहरा क्षोभ है। पात्रों की इस कमी को इतिहास के प्रसिद्ध व्यक्तियों को कटघरे में लाकर दूर किया गया है। 

कमलेश्वर द्वारा रचित 'कितने पाकिस्तान'
कहानी का संचालन एक पात्र अदीब करता है। जैसा कि नाम से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अदीब एक साहित्यकार या बुद्धिजीवी है जिसे अपनी जिम्मेदारियों का अहसास है और उसे लगता है कि अनेक वर्गों में जनता को बाँटकर फायदा उठाया जा रहा है। अदीब को लगता है कि ऐसे समय में लेखकों, पत्रकारों और अन्य बुद्धिजीवियों को कुछ करना पड़ेगा। अदीब अगर नायक है तो सलमा को नायिका कहा जा सकता है लेकिन कथानक में उसे स्थान कम ही मिला है। सलमा के माध्यम से कमलेश्वर ने कृत्रिम सीमाओं को लेकर निराशा व्यक्त की है। अदीब और सलमा के वार्तालाप के माध्यम से लेखक ने समाज के नियमों में खुद को ढाल न पाने वाले लोगों की चिंता दिखायी है। कहानी में एक और पात्र है जिसे अर्दली के नाम से पुकारा गया है। यह एक मजबूत पात्र है जिसने जगह जगह पर लोगों के दोगलेपन को उजागर किया है। 

अगर उपन्यास का सार निकालने की कोशिश की जाए तो यही आयेगा कि सदियों से चली आ रही विभाजन की परम्परा बंद हो और मनुष्य एक मनुष्य की तरह जीवित रह सके। धर्म के नाम पर, भगवान के नाम पर, जाति के नाम पर, विचारधारा के नाम पर, भाषा के नाम पर और वर्ण के नाम पर विभाजन अब बंद होने चाहिये। कमलेश्वर ने अपनी बात को पुख्ता तरीके से रखने के लिये सम-सामायिक घटनाओं का उल्लेख किया है जैसे कोसोवो, पूर्वी तिमोर, सोमालिया, कश्मीर आदि जगहों पर हो रहे आंदोलन और प्रतिहिंसा। इसके मूल में जाने की लेखक ने कोशिश की है तो पाया है कि कहीं न कहीं किसी अन्य ताकत ने ये पहचान के संकट खड़े किये और फिर उसके बाद जब जनता विभाजित हो गयी तो उसका फायदा उठाया, वरना कोई कारण नहीं है कि दो अलग पहचान के लोग साथ नहीं रह सकते।

इतिहास जैसा हम जानते हैं और जैसा हमें पढ़ाया जाता है उसके प्रति भी कमलेश्वर ने अपनी राय दी है। मसलन अयोध्या जन्म-भूमि और बाबरी मस्ज़िद के विवाद के पीछे जो कारण बताया जाता है और जो अब राजनीतिक हो गया है उसको कमलेश्वर ने झूठ कहा है। मुगलकालीन कई अभिलेखों और पत्रों को उद्धृत करके यह बताने की कोशिश की गई है कि बाबरी मस्ज़िद की प्रचलित कहानी सही नहीं है। अगर यह सत्य है तो यह एक रुचिकर बात है कि इतिहासकारों का ध्यान अभी तक इस ओर क्यों नहीं गया और अगर गया भी है तो यह विचार मुख्यधारा में क्यों नहीं आ पाये। कमलेश्वर ने यह बताने की कोशिश की है जनता को बाँटकर रखने से उन पर नियंत्रण करना कितना आसान हो जाता है। अगर कोई शासक लोगों को साथ लेकर चल नहीं पाता है तो वह धर्म का सहारा लेकर शासन करना चाहता है। कमलेश्वर ने यह बात दाराशिकोह और औरंगज़ेब के बीच खींचतान को केंद्र में रखकर दिखाया है। 

उपन्यास में वामपंथी विचारधारा के तत्व देखने को मिलते हैं और पश्चिम की व्यवस्थाओं के प्रति गुस्सा देखने को मिलता है। इसका कारण यह भी हो सकता है कि सामंतवादी विचारधारा को भारत में लाने के बाद यहाँ जनता की स्थिति ख़राब ही हुई है। पूँजीवाद और उसके द्वारा लायी गयी व्यवस्थाओं के प्रति कमलेश्वर का रुख बहुत उत्साही नहीं रहा है। साथ ही साथ धर्म के उपदेशकों को समस्या का एक भाग माना गया है, जैसा कि हमने औरंगज़ेब के प्रसंग में और अन्य जगहों पर देखा है। इस उपन्यास में एक सन्देश है जिसे लोग आत्मसात करने में कहाँ तक सफल रहेंगे यह तो नहीं कहा जा सकता है, लेकिन इतिहास से सीखने को काफी कुछ है यह दिखता है। 

जैसा की पुस्तक की भूमिका में कमलेश्वर ने ख्याति-प्राप्त लेखकों की प्रतिक्रियाओं का हवाला देते हुये लिखा है कि इसे उपन्यास के एक प्रचलित ढांचे में देखने में बहुत दिक्कत हुई। लेकिन प्रयोगवाद की यही तो एक पहचान होती है कि एक प्रयोग पहचानी जा चुकी परम्पराओं से भिन्न होता है। एक लेखक ने पुस्तक की समीक्षा करते हुये इसकी शब्दावली को आसानी से ग्रहण करने वाला बताया है और जैनेन्द्र की भाषा से तुलना करते हुये इस समाज के ज्यादा करीब पाया है। मैंने जैनेन्द्र को तो अभी तक नहीं पढ़ा है लेकिन ‘कितने पाकिस्तान’ जरूर बोलचाल की हिंदी का प्रयोग करता है जिसमें उर्दू के शब्द भी हैं और तत्सम भी। जो भी भाषा अपने विचारों को व्यक्त कर जाये वही उचित होती है।