फिर लगा दी जाती हैं
सदियों से गैर-जाँची, गैर-परखी चली आयी
परम्पराओं की बेड़ियाँ
किन्हीं पैरों में;
वही ढेर सारे नुस्खे
जिनको अपनाकर
आदमी जीवन से सन्तुलन बनाकर रह सकता है
और समय के मंथन में मिले
एक विशेष युग को
उन्हीं बेड़ियों को सौंप देने पर ही
अस्तित्व में रहा जा सकता है,
और यही एक मुद्दे की बात थी
बाकी तो बेड़ियाँ कौन सा मुद्दा छोड़ती हैं
यह सहज अनुभव से जाना जा सकता है।

और इन बेड़ियों से
छूट जाना असम्भव ही है,
बस आदतबाज़ बनकर निकला जा सकता है।


एक आवाज़ थी
जो उसने क्रांति के ग्रंथों से
थोड़ी-थोड़ी इकठ्ठा करके
सम्भालकर रख लिया था कि कभी बोला जा सकेगा
बड़े होकर वह आवाज़ और भी बढ़ी उसमें
वह और भी तड़प उठा
वह आवाज़ निकालने को,
वह क़िताबी ज्ञान को
क्रांति समझ लेता है
और झुलसता है प्रचलित दौर के चलन से
और भागा है फिर से
निर्णय के केंद्र से
ताकि चुनौती देने का मौका न आये,
उसकी आवाज़ अब नहीं आती है,
दूर जाते जाते वह आवाज़
साँझ की लाली में घुलकर कहीं गायब हो गयी थी
हर आवाज़ों पर संगीत नहीं जमाया जाता,
क्षितिज के पार लोग
सुना है उसे याद भी नहीं करते
मृत होने के बाद

बहुत दिन बाद
उनकी आत्मायें मिलीं
और सबकी यही एक शिकायत रही,
कि मेरा दौर क्रांतिकारी नहीं था


मैं कोई पत्र लिख रहा हूँ
जिसमें बयाँ न हो सकने वाली बातें हैं
और अपवाद स्वरूप मैं शामिल कर लेता हूँ
तारों के टूटने के कुछ चित्र
जिससे तुमको यकीन हो
कि मैं भी इसी ब्रह्माण्ड का सदस्य हूँ,
चला देता हूँ
समय के चक्र को
नाच उठती हैं घटनायें
बहुत सम्भव है
समय की चक्रीय अवधारणा में विश्वास रखते हुये
कभी खुद को पत्र लिखते हुये देख सकूँ।

तुम मेरा पत्र पढ़ रही हो
जो बातें पढ़ी नहीं जा सकती हैं
तुमने पत्र को समय की दिशा में रखकर
उनके सारे मानी भांप लिये हैं
और किसी सुपरनोवा की रोशनी की तरह
तुम्हारी आँखें चमक उठती हैं
भाव से भर उठती हैं,
यह याद करती हो
कि ब्रह्माण्ड में इतना रिक्त स्थान है
कि दो तारों के टकराने की संभावना नगण्य है।

समानांतर संसारों में
हमारी दुनियाएं ऐसे ही चलती रहती हैं
कभी कोई प्रतिभावान भौतिक विज्ञानी
अपनी थीसिस में
ऐसे संसारों के बीच कोई खोई हुई कड़ी ढूँढ़कर जोड़ देगा
और हमारी दुनियाएं मिल उठेगीं।


एक दिन जो ये टीले हैं
इनके पत्थर चूर होकर
रेत के कणों में बदल जायेंगे
और किसी आँधी में दूर कहीं उड़ जायेंगे
ये नदियों का बचा-खुचा पानी
सागर की शरण लेगा
और अपने जीवन को फिर से दोहरा देगा
इन खण्डहरों की अंतिम ईंट भी
एक दिन इतिहास को कोसने के लिये नहीं बचेगी
कई पीढ़ियों बाद संसार के लोग ऊब जायेंगे
और इतिहास के महत्व को नकार देंगे
तब यहाँ के रास्ते वीरान नज़र आयेंगे
तब कहा जायेगा
कि काल भटकता रहा देश में
जिस परिणति के लिये
जिस स्थायीपन के लिये
वह अब उसे प्राप्त हुआ,
पूछा जायेगा कि अंतिमता अनाकर्षक क्यों है?

और बाहरी अंतिमता के उस दौर के बाद
शायद मनुष्य आंतरिक अंतिमता की तरफ उन्मुख होगा
जहाँ फिर एक दौड़ शुरू होगी
जीवन को मतलब से सजा देने की,
कलम से कलम लड़ेगी
और वादों के टकराव शुरू होंगे
व्याकुलता के नए दौर शुरू होंगे
अस्तित्व का संकट फिर उठ खड़ा होगा
और अंतिमता की खोज ही अंतिमता बनती जायेगी,
क्या अंतिमता मात्र एक मृग-मरीचिका है?


अबकी बार जब आओगे तुम
कुछ नयी मिसालें लेकर आना,
पिछली बार तुम जिन मिसालों को लेकर आये थे
उन्हें आज़माकर देखा है मैंने,
कॉफी की चुस्कियों के साथ
एक अज़नबी दुनिया पर मढ़कर
वो मिसालें जब तुमने मुझे सौंपी थी
तो विरासत की कोई चीज समझकर
मैंने संभालकर रख ली थी,
किंवदंतियों का उपासक मैं अकेला नहीं था,
लेकिन धरातल पर आते-आते
वो मिसालें असहज होने लगीं
शायद आसमान में रहने की आदत से
ये मिसालें कुछ ढीठ हो गई थी
और मुझसे कुछ कहासुनी भी हुई,
अबकी बार जब आओगे तुम
कुछ नयी हिदायतें लेकर आना
ताकि उन मिसालों को उपयोग में लाया जा सके
और यह जाना जा सके
कि जंगल से दूर एक पेड़ कब तक बचता है

अबकी बार जब आओगे तुम
कुछ नयी मिसालें लेकर आना