कल:
वो बेचैनियों के उस दौर में था
जहाँ खालीपन उपासना की चीज थी
अकेलेपन के सान्निध्य में न जाने
कौन-कौन से विचारों की यात्रायें होती थीं,
जहाँ बैठकर वह सोचता था
कि अगर दुनिया ऐसी भी हो तो क्या गलत है,
जहाँ लकीर का फक़ीर न होना एक साधारण बात न रहकर
एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी बन जाती थी।

बेचैनियाँ भी वहीं थी
जो कभी न कभी अन्य से भी रु-ब-रु हुई ही थीं
पर उसके साथ हादसा हुआ था
बेचैनियाँ गई नहीं
उसमें समा गईं,
और वह उन्हीं बेचैनियों को सौंपता रहा
ज़माने के सही-गलत के मापदण्ड
जहाँ से कुछ नहीं निकलता था
बस एक ढर्रा
और सफलता-असफलता के मानक,
बेचैनियाँ बढ़ती गईं
उनकी ओट से देखा उसने सतही बातें
दुनिया को नई तरह से देखने की कोशिश भी की
लेकिन प्रकृति के कैनवास पर
सदियों से चढ़ाये कृत्रिम रंगों पर
उसके रंग बहुत देर टिक नहीं पाये,
उसकी बेचैनियों के शब्द
वाइजों के लिये परेशानी के सबब थे,
लेकिन वह चलता रहा
उस राह पर जहाँ मिलती थीं
कई राहें बेचैनियों की,
आवारापन की, पागलपन की
उन राहों पर जहाँ चलकर
अपने सामान्य रूप में
कहते हैं कि कोई लौटता नहीं।

आज:
अब वो पागल नहीं है
सभ्य लोगों के तौर-तरीके
उसने अपना लिये हैं
ये कैसे हुआ
किसी को नहीं पता,
सुना है कि सभ्य बनने के बाद
बहुत समय तक उसकी आवाज़ गायब थी।


जिन्दगी के दो छोर हैं,

पहला, जहाँ आत्म को एक रूप मिलता है
ब्रह्म से कुछ अलग
और जन्म लेती हैं सम्भावनायें
निराकार से साकार निकलता है
बिलख उठती है इकाई संरक्षण खोकर
हर एक रचना का
जो सबसे सशक्त रूपक है -
जन्म,
लो मिला,
पौ फूटती है
जीवन जितना लम्बा दिन लो शुरू हुआ।

दूसरा, जहाँ सम्भावनायें नियति से मिलती हैं
और किताब के अन्तिम पन्ने जैसी
एक संतुष्टि लिये रहती हैं
आत्म और परमात्म अलग नहीं रहते हैं
सार्थकता और निरर्थकता की बहस
मानी खोने लगती है
समय में गोधूलि वेला के रंग मिलने लगे हैं
घर चलें,
ब्रह्म में लीन होने का समय है
चलो,
पटाक्षेप।

इन्हीं दोनों छोरों के बीच
हम बाँधकर एक डोरी और उस पर चढ़कर
फासला तय करने का प्रयास करते हैं
कई बार देखने वाले तालियाँ खूब बजाते हैं
जहाँ दर्शकों के आनन्द के लिये
एक पैर से रस्सी पार करने से पहले
एक पल भी नहीं सोचते हैं
वो जो डोरी कहीं उलझी हुई रखी है
उसे देखने कौन जाता है
इस खेल का नाम जानते हो?
लो, मैंने कहा - जीवन।

अब निरपेक्ष होकर देखो,
जन्म एक घटना है
मृत्यु एक घटना है
जीवन जो बहुत बड़ा लगता है,
वो भी एक घटना है,
और ब्रह्म में ऐसी घटनायें होती रहती हैं।

(हरमन हेस की एक रचना से प्रेरित)


देखना और दिखना,
क्या एक ही बात होती है?

यूँ ही नहीं मान लेना चाहिये
कि मैं और तुम किसी बात पर सहमत हैं
बिम्ब तुम्हारे हैं
और मानी मेरे हैं
परिदृश्य तुम्हारे हैं, कहानी मेरी है
हवा तुम्हारी है, संगीत मेरा है
और देखा जाये तो
अर्थपूर्ण तुम्हारा है ही क्या?

तुमने मुझे आकाशगंगा दिखाई
मैंने वहाँ देखा कृत्रिम प्रकाश से दूर
एक गाँव का बचपन,
तुमने मुझे सबसे ऊँचे गाँवों में से
कुछ एक दिखा दिए
मैंने देखा वहाँ जिजीविषा
प्रकृति के सामने खड़े होने का दुस्साहस,
तुमने मुझे घाटी में
टूटी हुई पगडण्डियाँ दिखाईं
मैंने वहाँ देखा
वैश्विक नाट्यमंच की टूटी हुई कड़ियाँ,
तुमने मुझे लाल-सफ़ेद रंग के घर दिखाये
मैंने उनमें खोजे
किसी दूर देश के वास्तु के खोये हुये उदहारण।

मैंने वहाँ वह नहीं देखा
जो दिख रहा था,
मैंने वहाँ वही देखा,
जो मैं देखने गया था, स्पीति।


नदी आज की तरह शांत
हमेशा से नहीं थी
अब घाटी के किसी कोने में सिमटकर
एक गौरवमयी इतिहास पर
इतराने या उसके बारे में सोचकर
पश्चाताप करने के अलावा चारा ही क्या है,
नदी के बीचो-बीच एक पत्थर
अब दिखने लग गया था
जिस पर दिखते हैं काटे जाने के निशान
जो किसी तेज धारा ने
अपने पराक्रम काल में बनाये होंगे,
कुछ सौ मीटर की दूरी पर जाकर
नदी ठहरी है पिछली कुछ पीढ़ियों से
लोग नदी देखने वहीं जाते हैं,
वहीं पास के एक टीले से
सूरज नदी को सुनहरी रोशनी में
नहलाकर ही सोने जाता है,
जहाँ सुनते हैं
कि सदियाँ एक दूसरे से मिलने आती हैं
इतिहास अपनी कलम से
भविष्य को दिशा दिखा रहा होता है
सच और झूठ
उपयुक्तता के तराजू में तौले जा रहे होते हैं,
सुनो, तुम नदी को यहाँ मत देखो
ये नदियाँ अब घाटियों में नहीं बहतीं
अब ये बहती हैं
समय में, काल में,
वह देखो दूर किसी काल की नदी
वर्तमान के महासागर में अभी अभी मिली है
जहाँ से फिर कई पल
बादल बनकर उठेंगे
और फिर कुछ नदियाँ बह उठेंगीं।

शायद नदी की यह पतली धारा भी
किसी दिन सूख ही जायेगी
लेकिन रह जायेगी
इन पत्थरों पर, इतिहास की दिशा पर, जनमानस पर,
एक अमिट छाप।


इंतज़ार की इन्तहा
कहीं कहीं दिखती है मानिये,
दशकों से नदी किनारे खड़े ये पेड़
या इनसे पहले इसी अवस्था में
यहीं पर खड़े इनके पूर्वज
कब से नदी की धार को
टकटकी लगाए देखते हैं
इन्होंने धूप से बचाकर छाँव भी दी है
हवाओं का खेल भी साथ खेला है
सावन में बादलों के अंधेरे में
साथ घबराये भी होंगे
नदी को पत्तियों के माध्यम से
साल के चक्र भी कई गिनायें होंगे
मगर एक लफ्ज़ भी उसके लिए नहीं बोला;
नदी ने भी नहीं;
एक सच्ची श्रद्धा से
सृष्टि चलती रही।

मगर पतझड़ के मौसम में
एक पीली पत्ती नदी पर गिरी
उसकी छुवन से नदी की सतह पुलकित हो उठी
जहाँ कहते हैं कि नावें घूमने लगती हैं,
उस पत्ती को नदी उलट-पलटकर देखने लगी;
क्या कहते हो?
वह पत्ती नहीं है?
अरे हाँ!
हाँ, प्रेम पत्र।