एक महानुभाव से बात करते करते
बातचीत कुछ गलत दिशा में
चली गई
वे कहने लगे
कि कुछ लोग सदियों से
चली आ रही परम्पराओं को मानते ही नहीं
हर बात पर सवाल करके
अवज्ञा करने के बहाने ढूंढते हैं
बिना किसी बात का कारण जाने
परम्पराओं को रूढ़ियाँ कह देते हैं
ये आवारा होते हैं।

कि कुछ लोग
समाज की मशीन में
एक पुर्जे की तरह
फिट होने की बजाय
मनुष्य के अस्तित्व पर ही
सवाल खड़े कर सकते हैं
और अन्य कई होनहार लोगों को
जिनसे कुछ उम्मीद बाँधी जा सकती है
उनको अपनी चपेट में ले सकते हैं
ये आवारा होते हैं।

कि कुछ लोग
ओल्ड मांक की बोतलों के साथ
पिंक फ्लॉयड के गानों को सुनते हुए
समझते हैं कि वे
संगीत सुन रहे हैं
इस हाथ से जाती हुई पीढ़ी को
देखकर ही कह सकता हूँ
ये आवारा होते हैं।

कि कुछ लोग
समाज की प्रधानता के बजाय
व्यक्ति की प्रधानता पर
बल देने लगे हैं
अपनी संस्कृति की,
मूल्यों की,
भाषा की अवहेलना करने वाले
ये आवारा होते हैं।

फिर उन महानुभाव ने कहा
अरे बेटा!
तुमने बताया नहीं
तुम करते क्या हो?
मैंने कहा,
वही, आवारागर्दी।


धर्मवीर भारती की लिखी रचना की समीक्षा करने का भी एक अपना ही आनंद होता है। गुनाहों का देवता और सूरज का सातवाँ घोड़ा के बाद उनकी यह तीसरी रचना थी जो कि मैंने पढ़ी और यह कहा जा सकता है कि तीनों में पर्याप्त विविधता है। जैसा कि पहले भी इस बात पर ध्यान दिया गया है कि भारती जी अपनी रचनाओं की जो भूमिका या प्रस्तावना लिखते हैं वह भी अपने आप में बहुत रुचिपूर्ण होती है। अब 'अंधा युग' की भूमिका ही ले लीजिए। भारती जी ने उसमें अपनी असहाय स्थिति को बयान किया है और क्या बखूबी बयान किया है - "पर एक नशा होता है - अंधकार के गरजते महासागर की चुनौती को स्वीकार करने का, पर्वताकार लहरों से खाली हाथ जूझने का, अनमापी गहराइयों में उतरते जाने का और फिर अपने को सारे खतरों में डालकर आस्था के, प्रकाश के, सत्य के, मर्यादा के कुछ क्षणों को बटोर कर, बचा कर, धरातल तक ले जाने का - इस नशे में इतनी गहरी वेदना और इतना तीखा सुख घुला-मिला रहता है की उसके आस्वादन के लिए मन बेबस हो उठता है। उसी की उपलब्धि के लिए यह कृति लिखी गयी।"

धर्मवीर भारती द्वारा रचित 'अंधा युग'
'अंधा युग' एक दृश्य काव्य है, मतलब यह नाट्य विधा में लिखी गयी रचना है जिसके संवाद और नेपथ्य से उद्घोषणाएं काव्यात्मक हैं। ज्यादातर संवाद मुक्त-छंद और तुकांत कविता का मिश्रण हैं। शायद काव्यात्मक संवाद का चुनाव इसलिए किया गया क्योंकि सामान्य जनमानस के लिए पद्य समझना और कंठस्थ करना, गद्य की तुलना में कहीं आसान होता है। यह कारण हो सकता है कि ज्यादातर प्राचीन रचनायेें जो लिखावट के अविष्कार या सामान्य प्रचलन के पहले से ज़िंदा हैं, वह काव्य हैं। और जब गद्य और पद्य की चर्चा छिड़ी है तो 'अज्ञेय' जी की एक बात याद आ जाती है जो उन्होंने 'अरे यायावर रहेगा याद?' में कही थी - 'हमारी कविता बानी नहीं रही, लिखतम हो गई है; ह्रदय तक नहीं जाती वरन एक मष्तिष्क की शिक्षा-दीक्षा के संस्कारों की नली से होकर कागद पर ढाली जाती है जहाँ से दूसरा मष्तिष्क उसे संस्कारों की नली से उसे फिर खींचता है।'

'अंधा युग' का कथानक महाभारत युद्ध के समाप्ति काल से शुरू होता है। वैसे तो अब तक महाभारत काल की घटनाओं पर काफी साहित्य लिखा जा चुका है - जिनमें कर्ण पर लिखे गए 'रश्मिरथी' और 'सूतपुत्र' प्रमुख हैं, लेकिन 'अंधा युग' इनसे थोड़ा अलग है क्योंकि यह समाज में सच मान ली गई या सच प्रचारित की गई चीजों से अलग है। इसमें युद्ध के औचित्य को चुनौती दी गई है, कृष्ण भगवान द्वारा कहे गए शब्दों को विवाद में खींचा गया है, महाभारत में - जिसमें ऐसा कहा गया था कि धर्मयुद्ध का पालन किया गया है - कुटिल योजनाओं की झलक दिखलाई गई है। ऐसा कहा जा सकता है कि पात्रों के चारों ओर से आभा हटाकर उन्हें एक सामान्य मनुष्य की तरह चित्रित किया गया है।

'अंधा युग' में मनुष्य की भावनाओं का सजीव चित्रण किया गया है। कृष्णा ने अर्जुन को भले ही गीता में सत्य के लिए युद्ध करने का सन्देश दिया हो लेकिन युद्ध में भयानक विध्वंस देखकर सभी का मन खिन्न हो गया था। ऐसा लग रहा था कि जिन आदर्शों के लिए पूरा युद्ध लड़ा गया, वो सारे आदर्श झूठे थे। धृतराष्ट्र और गांधारी यह जानते हुए भी कि उनके पुत्र धर्म की तरफ से युद्ध नहीं कर रहे हैं, अपने पुत्रों की जीत की आस लगा रखे थे। यह उनकी ममता थी। अश्वत्थामा प्रायश्चित और बदले की भावना में जल रहा था। पूरे हस्तिनापुर में एक निराशा का वातावरण था। युद्ध के वीभत्स चेहरे को भारती जी ने बहुत अच्छे से चित्रित किया है।

प्रस्तुत दृश्यकाव्य में भारती जी ने पहरेदारों के माध्यम से किसी घटना को दूर से देखने वालों के मानसिक द्वंद्व का चित्रण किया है। पहरेदारों ने युद्ध में भाग नहीं लिया था लेकिन फिर भी राज्य की अव्यवस्था के कारण उनका मन उदास था। उन्होंने पहले राज्य का वैभव देखा था, अब राज्य का पराभव देख रहे थे। उनके माध्यम से भारती जी ने संभ्रांत वर्ग के निर्णयों का वंचितों पर पड़ने वाले प्रभावों को दिखाया है।


फागुन के किसी एक दिन
खेत में खड़ी अनगिनत
गेहूँ की बालियों में से
गेहूँ की एक बाली
अपनी सृजन क्षमता को जान बैठी
उसने जाना कि वह एक सर्जक है
सैकड़ों नए पौधों की
सैकड़ों नयी पीढ़ियों की
बस फिर क्या था
गेहूँ की उस बाली ने
सूखकर पकने से
साफ़ इंकार कर दिया
खेत में वो अकेली बाली
अभी तक हरी खड़ी थी।

सबकी समझ से बाहर
यह एक नयी समस्या थी
गाँव के कुछ समझदार लोगों को बुलाया गया
खेत के खेत
एक साथ पकने देख के आदी
उनकी समझ में भी नहीं आया
कि यह अकेली बाली
विद्रोह पर क्यों उतारू है
खाद मिटटी पानी हवा
कमी किस चीज में हुई आखिर
इस डर से
कि कहीं अन्य बालियाँ भी
इसी रास्ते पर न चल उठें
उस बाली को बाकी बालियों के साथ
काटने का आदेश दे दिया गया।

हंसिया चलती रही
गेहूँ की वह बाली चिल्लाती रही -
मैं सर्जक हूँ
मैं सृजन का कारक हूँ
मैं सकल विश्व की रचना का
एक क्षुद्र मापक हूँ
मैं ब्रह्मा हूँ
एक छोटी भावी सृष्टि का
मैं अधिनायक हूँ
मैं जीव मात्र में जीवन का संचालक हूँ
मैं जीवन का संचायक हूँ;
अंत में वह बाली भी
कट कर धरती पर आ गिरी
और झोंक दी गई
किन्हीं जरूरतों में
चुपचाप खप जाने के लिए।


बहुत वर्ष पहले विविध भारती के एक कार्यक्रम में प्रस्तोता ने गुलज़ार की तारीफ करते हुए उनके बारे में कहा था कि गुलज़ार की कविताओं में बहुत सारे शब्द ऐसे हैं जो कि एकदम काव्यात्मक नहीं लगते हैं, अगर पारम्परिक दृष्टि से देखा जाये तो, लेकिन उन शब्दों को भी गुलज़ार ने क्या खूबी से कविताओं में पिरोया है। इस घटना के बहुत दिनों बाद जब गुलज़ार की लिखा हुआ नज़्मों का संग्रह पुखराज पढ़ने का मिला तो वो विविध भारती के पुराने दिन फिर से ताज़ा हो गए जब ‘गीला मन शायद, बिस्तर के पास पडा हो … एक सौ सोलह चाँद की रातें’, ‘दिल ढूंढता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन’ या ‘तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी’ जैसे सदाबहार गाने सुने जाते थे। वैसे तो गुलज़ार की बहुमुखी प्रतिभा को सिर्फ अकाव्यात्मक शब्दों का प्रयोग करने के लिए ही नहीं जाना जाता, फिर भी यह उनकी विशेष कला है। और प्रस्तुतकर्ता ने उदारहरण के लिए जो गाना सुनाया था वो आँधी फिल्म का किशोर कुमार और लता मंगेशकर का गाया हुआ गाना था -
इस मोड़ से जाते हैं कुछ सुस्त-क़दम रस्ते, कुछ तेज़-क़दम राहें
पत्थर की हवेली को, शीशे के घरौंदों में, तिनकों के नशेमन तक
इस मोड़ से जाते हैं कुछ सुस्त-क़दम रस्ते, कुछ तेज़-क़दम राहें

'pukhraj' by gulzar
गुलज़ार की नज़्मों में एक बात महत्वपूर्ण रूप से उभर कर आती है और वो है उनका प्रकृति के विभिन्न किरदारों का प्रयोग। रात, सुबह, शाम, दरख़्त, चाँद, धूप, सूरज, मौसम, घर और आँख इत्यादि का नज़्मों में जमकर प्रयोग किया गया है। जैसे इन सभी किरदारों को विभिन्न तरह से कुछ पेश करने को कहा गया हो और यह ज़िम्मेदारी इन्होंने सहर्ष स्वीकार की हो। और प्रकृति के इन आयामों की खूबियों या कमियों का इस्तेमाल करके मानसिक परिस्थितियों को अभिव्यक्त किया गया है । मिसाल के लिए एक नज़्म का टुकड़ा पेश करता हूँ-
एक और सफ्हे पे यूं लिखा है :
"कभी कभी रात की सियाही,
कुछ ऐसी चेहरे पे जम सी जाती हैं
लाख रगड़ूं,
सहर के पानी से लाख धोऊं
मगर वो कालख नहीं उतरती !
मिलोगी जब तुम पता चलेगा
मैं और भी काला हो गया हूँ"
ये हाशिए में लिखा हुआ है :
"मैं धूप में जल के इतना काला नहीं हुआ था
कि जितना इस रात में सुलग के सियाह हुआ हूँ"

मानवीय रिश्तों में एक दुसरे की महत्ता को गुलज़ार ने स्वीकारा है। कई नज़्मों में उन्होंने अपनी नज़्मों को ही अपना सहारा माना है या नज़्मों को शायर का सहारा मांगते हुए दिखाया है। शायद एक दूसरे के साथ बहुत दिनों तक समय व्यतीत करते हुए दोनों एक दूसरे के सुख दुःख के साथी हो गए हैं। रिश्तों पर लिखते हुए गुलज़ार ने प्रेमी-प्रेमिका पर तो लिखा ही है , साथ ही साथ बेटी, माँ पर भी लिखा है। घर के किसी भुला दिए गए सदस्य की याद में गुलज़ार लिखते हैं -
और कई साल के बाद
मेरे माली ने उसे खोद निकाला है ज़मीन से
सारे बगीचे में फैली हुई निकली हैं जड़ें,
बरसों पाले हुए रिश्ते की तरह
जिसकी शाखें तो हरी रहतीं हैं,लेकिन
उस पर,फूल फल आते नहीं

गुलज़ार की नज़्में आदमी के अकेलेपन की साथी होती हैं। और शायद ये नज़्में महफ़िलों में सुनाने के लिए नहीं हैं। रात को जब तन्हा चाँद को देखते हुए कुछ समय गुज़र जाता है तो अनायास ही गुलज़ार की चाँद पर लिखी गयी अनगिनत नज़्मों में से कोई एक याद आ जाती है। ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि चाँद गुलज़ार के पसंदीदा प्रतीकों में से एक रहा है । और जब चाँद की बात हुई तो रात की बात होना भी लाज़मी है क्योंकि दोनों एक दूसरे के साथ ही रहते हैं और एक दूसरे के बिना शायद दोनों के गुण उभर कर सामने न आ सकें।
खिड़कियाँ बंद है दीवारों के सीने तंडे
पीठ फेरे हुए दरवाज़ों के चेहरे चुप हैं
मेज कुर्सी हैं कि खामोशी के धब्बे जैसे
फर्श मे दफ़्न हैं सब आहटें सारे दिन की
सारे माहौल पे ताले-से पड़े हैं चुप के

तेरी आवाज़ की इक बूँद जो मिल जाए कहीं
आख़िरी साँसों पे है रात- ये बच जायेगी

गुलज़ार ने सरल उर्दू का प्रयोग किया है। कुछ शब्द मुश्किल लग सकते हैं जिनके मानी एक बार में शायद समझ में न आएं जिसके लिए पुस्तक के अंत में शब्दार्थ का कोना दिया गया है। शब्दों से ज्यादा गुलज़ार का ज़ोर विचारों पर रहा है और नज़्मों की आखिरी पंक्तियों में गुलज़ार गहरी बातें कह जाते हैं। उदाहरण के लिए -
साँस की कँपकंपी नहीं जाती
जख्म भरते नहीं आँखों के
दर्द के एक-एक रेशे को
खींच कर यूँ उधेड़ता है दिल
जिस्म की एडियों से छोटी तक
तार-सा इक निकलता जाता है
चीख़ भींचे हुए हूँ दाँतों में

तुमने भेजा तो है सहेली को
जिस्म के ज़ख़्म देख जाएगी
रूह का दर्द कौन देखेगा?


रोज़मर्रा की बातों से अलग कुछ बात करते हैं
चलो आज बिना बात ही कुछ बात करते हैं।

क़िताबों के बीच वो अब भी महक उठता है
सूखा फूल जिससे कभी पुरानी बात करते हैं।

कभी इक रात में खो गयी थी बहुत सी बातें
लोग बेवज़ह ही नहीं चाँद से बात करते हैं।

तुम्हें यकीं नहीं था तो खुद कर के देखते
साहिल पे बैठकर मौज़ों की बात करते हैं।

तुम्हारी क़ुर्बानी से मुतासिर नहीं यहाँ कोई
लोग अब भी मीरा सुकरात की बात करते हैं।

उस एक नज़्म को सीने से लगा बैठे कब के
जिसके एक एक हुरूफ़ इंक़लाबी बात करते हैं।

ज़माने को तो कर दिया है नाउम्मीद तुमने
यायावर चलो अब रूह से कुछ बात करते हैं।

मुतासिर - impress
साहिल - shore
मौज़ - waves
हुरूफ़ - The letters of the Arabic alphabet