धरती के किसी कोने में
कृत्रिम सुंदरताओं से बहुत दूर
बादलों से रहित साफ़ आसमान की सजावट में
तारों की एक दूधिया उजली पट्टी है
जिसके आकर्षण में
आकाश में और कुछ देखना नहीं होगा,
जो क्षितिज के
एक कोने से दूसरे कोने तक सरपट चली जाती है
जिसमें दिखते हैं रंग संसार के,
तारों की आकृतियाँ
और उन आकृतियों के नाम निकालने की चुनौती,
इन्हीं तारों के काफिले से भटका
एक तारा हमारा सूरज भी है
जो आकाशगंगा के किसी और कोने से
इन्हीं अनगिनत तारों की पट्टी के
किसी कोने में मौज़ूद
अपनी पहचान के लिये तरसता होगा,
इस उजली पट्टी के चार कोनों पर
चार तारों को गाड़कर
हमारा ग्रह उसमें तस्वीर देखने की कोशिश में लगा है,
और अंतरिक्ष के ललाट की शोभा बढाती
एक आकाशगंगा है
सुंदरता की कोई भी परिकल्पना
जिसके बिना अधूरी होगी।


उजालों की दुनिया से कोसों दूर
नुकीले पहाड़ों से टँगी एक घाटी में
अँधेरी रात के पर्दे में
छोटे-छोटे, लाखों-करोड़ों हमसफ़र मौज़ूद हैं
जहाँ से प्रकाश हम तक पहुँचने में
सदियाँ लगा देता है
(कुछ उससे भी दूर हैं)
जिन्हें देखा है
परियों वाले नाट्यमंचन में
मंच के पीछे पर्दे में
कई कोनों वाली
कार्डबोर्ड की चमकती आकृतियों में,
ऐसे तारों को देखना
सच्चाई के आमने-सामने खड़े होने जैसा है,
वो विशाल तारे भी हैं
जो आसानी से
सैकड़ों ये सौर-मण्डल लील जायें,
ऐसे तारों से बनी हजारों आकाशगंगायें हैं,
जहाँ सुपरनोवा जैसी घटनायें
चलती रहती हैं कई-कई उम्र तक,
अब आकाशगंगाओं के समूह भी पहचान लिये गये हैं
इन समूहों के समूह भी विचरते रहते हैं
दूर-दूर तक परिभाषाओं को खींचते हुये,
यह विराट का चित्र है
जिसमें एक मनुष्य नाम की संरचना को
कहीं खोजा नहीं जा सकता है,
कभी-कभी
अपने अस्तित्व का सही-सही आँकलन करना
जरुरी हो जाता है
तब चकाचौंध से दूर
रात के आकाश को एकटक निहारने
किसी निर्जन जगह जाना होता है।


एक दिन हम नहीं बोलेंगे
या तो बंदूकें हमारे लिये बोला करेंगी
या बंदूकें हमारी ज़ुबान छीन चुकी होंगी।

एक दिन जब हमारे तुम्हारे मतभेद बहुत बढ़ जायेंगे
विचारधारायें जो वैसे तो सिंहासन से उतरती नहीं हैं
लेकिन हमको दूर करने उतरेंगी
और हम एक दूसरे को सुनने की जगह
अपनी बातें सुनाते रहेंगे
इसके बाद भी अगर मतभेद दूर नहीं होते हैं
तो हम बंदूकें चलाकर तुरंत मतभेद हल कर लिया करेंगे।

एक दिन विरोध के तरीके बहुत बदल जायेंगे
ये भाषण, ये लेख, ये सभायें
ये पैम्फलेट, ये गोष्ठियाँ
ये सभ्य मानवों के वार्तालाप
हमारे विरोध को जताने में नाकामयाब रहेंगी
ये मतभेदों का सम्मान जैसी बातें हवाई लगने लगेंगी
तब हम बंदूकें उठाकर अपना विरोध जता देंगे।

एक दिन बंदूकें जिंदगी बहुत आसान कर देंगी
तब जो सुनने में असहज लगता है
उसे आसानी से चुप करा दिया जायेगा
जो लोगों से अभी करा पाना मुश्किल है
तब वो भी करा लिया जायेगा
एक दिन हम सम्मेलनों की मेजों पर
बंदूकें भेज दिया करेंगे
जिनकी बंदूकें ज्यादा आधुनिक होंगी
वो अपने पक्ष में फैसले लिवा लायेंगे।

(गौरी लंकेश, पंकज मिश्र, राजदेव रंजन, कलबुर्गी, रुद्रेश,  पानसरे, लक्ष्मणानंद सरस्वती, दाभोलकर, सन्दीप कोठारी और वैचारिक मतभेद में मारे गये अन्य अनेक अनाम लोगों के नाम।)


पिछली बार जब बारिश हुई थी न,
तब घर के बाहर की सड़क पर
एक चहारदीवारी पर एक पेड़ झुक आया था,
उसकी एक शाखा की एक बड़ी लम्बी सी पत्ती
जो आसमान से गुजरे हुये किसी रॉकेट की लकीर सी लगती थी
रास्ते में कौतूहल से भरी उपस्थित थी,
जब भी घर से निकलना होता
और पेड़ के नीचे पहुँचता
वो पत्ती हमेशा मेरे माथे पर
अपने धारदार किनारे परोस देती,
और हवा में फिर दूर छिटककर जा खड़ी होती,
कोई पंछी जब उस पत्ती पर बैठकर गाया करता था
तब वह पत्ती कितनी शांति से उसे सुना करती थी,
सुबह उस पत्ती से मेरा मिलना हमेशा हुआ करता था
और तब विचार क्रम टूटता था
जैसे दूर गया हुआ एक मुसाफिर
घर की याद से बिफर गया हो।

बहुत दिनों बाद एक दिन उसी सड़क से गुजरा,
कोई वहाँ से नदारद था,
कल रात की आँधी उस पत्ती को लील गयी होगी,
मैं चारों ओर उसे खोजता हूँ,
घर से बाहर अब भी निकलता हूँ
लेकिन लगता है
जैसे मेरी सुबह हुई ही न हो,
या जैसे मैं अपनी गली आया ही न हूँ।


गरम हवा के थपेड़ों से गाँव जूझता है
एक थका हारा मनुष्य
आधी धूप - आधी छाँव में
नीम के पेड़ के नीचे सोता है
सपना आया है
कि धान के खेत का पानी
सूरज ने यकायक सोख लिया है,
होगा,
अब उठा नहीं जाता है।

प्यास से परेशान एक पंछी
बढ़ता है नदी के किनारे की तरफ
आँच से झुलसी, सिमटी-सी नदी
पालती है सूखी भैंस-बकरियों का पेट
भूख से बौखलाया हुआ
एक घड़ियाल घात लगाकर बैठा है
आने वाले पंछी के लिये
भूख-प्यास-आँच का यह खेल
यहाँ हर दिन खेला जाता है
सूरज बुझे तो शायद यहाँ
युद्धविराम की घोषणा हो।

निरखू मछलियाँ पकड़ लाया है
दिन भर तपकर
जश्न की कोई बात मिली है आज
आज दावत होगी
हाँ, थोड़ा बुखार है उसे,
नहीं, ठीक हो जायेगा
ज्यादा चिंता की बात नहीं है
हाँ, दावत तो आज है ही
और हाँ, पण्डत से पूँछना
कि बारिश का कोई जोग बन रहा है क्या।


खुली हुई किताब है
जिसके आधे पन्ने में
तुम्हारी पसंदीदा कविता का एक टुकड़ा फैला हुआ है,
मोमबत्ती धीरे-धीरे मद्धम होती हुई
बुझने की तरफ अग्रसर है,
मेज़ के कोने से मोमबत्ती की रोशनी गिरती है
और समा जाती है पूरे कमरे में,
चौंककर रात तड़प उठती है
रात को फिर से शुरू होने का मौका देते हुये
दरवाज़े खोल देता हूँ
दूर किसी मंदिर की आखिरी आरती के घण्टे बज रहे हैं,
दूर गाड़ियों की आवाज़ से पता चलता है
कि शहर अपनी ज़िन्दगी जी रहा है,
सुस्ताया हुआ सा एक लैंप
सड़क को पीली रोशनी से नहला देता है,
ऐसा लगता है
कि मौसम का एक किनारा कुछ नया हो गया है।

शायद,
सोने से पहले
रात एक बार तुमसे टकरा गयी है।


यहाँ लोगों ने मुझे बताया है
कि सामने के इस मंदिर में
देवता बारह बरस में बस एक बार आते हैं
तब मंदिर के कपाट खोले जाते हैं
और ग्रामवासी यहाँ इकठ्ठा होते हैं,
हर्षोल्लास का माहौल होता है,
उस अंतराल में यह मंदिर
बस जिज्ञासा की एक वस्तु बनकर रह जाता है।

अदीब,
क्या तुम यह बता सकते हो
कि आखिर देवता मंदिर छोड़कर क्यों गये होंगे?
या कहाँ गये होंगे?


प्रशंसा की ज्यादातर वस्तुयें
उदासी पर आधारित होती हैं
यह साहित्य, कला और संगीत के रूपों में
सहज दिख जाता है,
क्या यह कहना चाहिये
कि सुंदरता और सहानुभूति
एक दूसरे से जुड़े हुये हैं
या इसे किसी दौर-विशेष का चलन कहकर
नकार देना चाहिये,
सत्य हमेशा सुन्दर नहीं होता
सुंदरता हमेशा शिव नहीं होती
सुंदरता उदास करती है
तो सत्य हो भी जाये
शिव नहीं हो सकती।

और क्या यह कहा जा सकता है
कि सुंदरता का देवता
उदासी का भी देवता रहा होगा?


दो नदियाँ जहाँ मिलती हैं
दूर तक फैली घाटियों से आकर
सर्पीली धाराओं में बदल जाती हैं
और मिलती हैं एक दूसरे से
जैसे दो आकाशगंगायें खिंची आ रही हों
एक दूसरे की तरफ गुरुत्वाकर्षण से
लेकिन बहुत धीरे-धीरे चलते-चलते,
आकार लेती हैं संगम के आसपास कुछ ऐसे
कि जिसके आगे
सारे स्केच निरस्त हो जाते हैं
असहाय खड़ा देखता रहता हूँ कैनवास की तरफ
रंगों में सूखी हुई एक कूँची लिये हुये
जो नदी में भीग जायेगी
तभी चित्र बना पायेगी
और आवाज़ होती है कल-कल की
जैसे किसी नव-सन्यासी के हाथ में आकर
एक सारंगी धन्य हो गयी हो
और अपनी तान से मोह लेने की जिद पर अड़ गयी हो।

सामने एक मठ की जर्जर दीवारें हैं
जहाँ कुछ मठाधीशों ने बैठकर
ब्रह्माण्ड की परिकल्पना पर चिंतन किया होगा
और संगम के मानी तलाशे होंगे
जिसे बाद में
ग्रामवासियों में बाँट दिया गया होगा
मठ की दीवारें
अब नूतनता का भार उठा सकने में
अब उतना समर्थ नहीं रह गयी हैं शायद
और कहीं दूर से
जीवनदर्शन को फिर से परिभाषित करने के संकल्प
प्रतिध्वनित हो रहे होंगे,
नीचे अर्ध चंद्राकार इस गाँव में
चित्र बनाने के लिये बहुत तत्व मौजूद हैं
मैं प्रयासरत हूँ।

जिस पगडण्डी में बैठकर
आसमान को स्केचबोर्ड पर टांग कर
प्रकृति की रंगों वाली थाली से कूँची में लेकर
मैं रंग भर रहा हूँ
उसके पीछे कुछ दूर जाकर एक झील है
जिसमें सूर्यास्त के अलग-अलग रंग दिखते हैं,
एक, उस सूरज का जो चला गया है
अपने पीछे हल्की छाया छोड़कर
जिसमें उदास शांत झील का पानी
साँझ के चाँद को डुबो लेता है,
दूसरा, उस सूरज का जो अभी अस्त नहीं हुआ है
और जिसकी गर्माहट में पानी ने
तलहटी को किरणों को सौंप दिया है
झील की गहराई पुलकित होकर
सूरज को देखने किनारे पर आ खड़ी होती है,
झील को घेरे खड़े हैं
घास के कुछ छोटे-बड़े गट्ठर
जो शायद झील की प्रशंसा सुनकर
यहाँ आ गये होंगे।

नीचे एक राह है
जो नदी का पीछा करते करते चली जायेगी
संकरी होती हुये
जिस पर चलते हुये हम
इतिहास के रंगों में हम सराबोर हो जायेंगे
लेकिन हम कहीं पहुंचेंगे नहीं
राहें कहीं पहुँचती नहीं हैं
पहुँचते हम मनुष्य हैं
राहें चलती चली जाती हैं
मनुष्य के अंदर से लेकर
ब्रह्माण्ड के अनदेखे, अकल्पित कोनों तक;
और कच्ची मिटटी की बनी दीवारों से
हज़ार साल पहले के रंग
मैं अपने चित्र में रंगने के लिये ले आया हूँ
मरुस्थलीय कृत्रिम खेती की तरह नहीं
खालिस प्राकृतिक, जिजीविषा से बनाये गए रंग
जिसने अपने आपको सहेज कर रखा है
विपरीत परिस्थितियों में रहने के बाद भी।

स्पीति,
कुछ महीने पहले मैं तुमसे मिला था,
या शायद कुछ वर्ष हो गये हैं,
तबसे एक अदद चित्र के प्रयास में
कैनवास में कौन-कौन सी आड़ी-तिरछी रेखायें नहीं खींची गयी हैं
कौन-कौन से रंगों के मिश्रण नहीं आजमाये गये हैं
कौन-कौन से चित्रकार के नुस्खे नहीं पढ़े गये हैं
लेकिन मैं तुम्हारा चित्र नहीं बना सका,
और मेरे लिये यह
वास्तविकता से साक्षात्कार की बात थी,
क्योंकि अपनी रंगों की दुनिया में डूबा हुआ
मैं अपनी तरह का एक अदना चित्रकार था।


एक सड़क थी
जो दर्रे के ऊपर से गुजरती थी
एक बस वहाँ से गुजरी
तेज चलती हुई हवा का एक झोंका
उस बस में आकर बैठ गया
और वह रास्ते के हर एक शख्स से
गर्मजोशी से मिलता रहा
कुछ घण्टों की कठिन यात्रा के बाद
वह झोंका बस से उतरा
और झील के पानी पर तैरने लगा
और चिढ़ाने लगा सूरज की किरणों को,
फिर वह झोंका पहाड़ पर चढ़ गया
और वहाँ से गिराने लगा
रेत के टुकड़ों को,
वह झोंका ज़मीन पर अवतरित हुआ
नदी में बहते हुये
पत्थरों से टकराने लगा
और वह घाटी की आबो-हवा में व्याप्त हो गया
जिस से हर एक क्षण निमंत्रण सा लगने लगा था
और उसने वातावरण को एक सधे उन्माद से भर दिया
जिसे मैंने हर एक प्राण में
अक्षुण्ण पाया था।

मैं उसी सड़क से लौटा
हवा का झोंका अपने साथ रख लाया था
आज भी कभी-कभी
हवा का वह झोंका मेरे अंदर चलने लगता है
मैं पंछी बनकर उड़ने लगता हूँ
विहंगम दृश्य मेरे सामने नाचने लगते हैं
मैं अपने आप को
किसी बौद्ध मठ में लाल कालीन पर बैठा हुआ
ध्यानरत देख पाता हूँ।