वोल्गा से गंगा राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखा हुआ एक कहानी संग्रह है जिसमें कहानियों का विषय इतिहास की घटनाओं पर रखा गया है। इस पुस्तक में लेखक ने आर्य आक्रमण सिद्धांत को पूरी तरह से मानते हुये उसके चारों ओर कहानियों को लिखा है। उस समय शायद यह सिद्धांत इतना विवादित न रहा हो। हालांकि पुस्तक के अंत में भदन्त आनंद कौसल्यायन ने इस पुस्तक की आलोचनाओं के बारे में लिखा है कि किस तरह से सांकृत्यायन को नग्नवादी, ब्राह्मण विरोधी कहकर इस पुस्तक के उद्द्येश्य पर सवाल खड़े किये गए थे। कुछ इसी तरह की भावना इस पुस्तक के दूसरे संस्करण की भूमिका में सांकृत्यायन जी ने व्यक्त किये हैं। आनंद कौसल्यायन ने सफाई में ज्यादा कुछ न लिखते हुये सिर्फ इतना लिखा है कि यदि किसी को आलोचना करनी ही थी तो कम से कम राहुल सांकृत्यायन के जितना अध्ययन तो किया होता। सांकृत्यायन को उनके ज्ञान के कारण साहित्यिक उद्धरणों में महापण्डित के नाम से भी जाना जाता है। आज के समय भाषा के अलावा और अन्य वैज्ञानिक पद्धतियों से आर्य आक्रमण सिद्धांत के मूल में जाने की कोशिश की गयी है। किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की बजाय यह सिद्धांत और विवादित हो गया है।

राहुल सांकृत्यायन द्वारा रचित 'वोल्गा से गंगा'
इस पुस्तक की पहली कहानी वोल्गा तट की है। वहाँ पर आज से 8000 साल पहले किसी जनजाति के पारवारिक ढाँचे, खान-पान, रहन-सहन के बारे में उल्लेख किया गया है। कहना न होगा कि उस समय की कहानियों में प्रामाणिक बातों की अपेक्षा कल्पनाशीलता की भरमार है लेकिन उसके लिए लेखक को दोष नहीं दिया जा सकता। वस्तुतः भारत के इतिहास की प्रामाणिकता बुद्ध और महावीर के समय के बाद बहुत बढ़ गयी थी जिसके दो कारण थे। पहला, बौद्ध और जैन धर्म के ग्रंथों में देवताओं की अत्यधिक प्रशंसा की जगह उस समय के वास्तविक सामाजिक स्थितियों का चित्रण किया गया है। दूसरा किसी एक ग्रन्थ में कही गयी बातों को किसी दूसरे ग्रन्थ से तुलना करके उसकी सच्चाई जानी जा सकती है। सिकंदर के आक्रमण के बाद भारत के राजाओं और शहरों का ज़िक्र यवनी साहित्य में भी मिल सकता है।

अन्य कहानियों में वैदिक भारत, उत्तर-वैदिक भारत, बुद्ध के समय के ऊपर कहानियाँ लिखी गयी हैं। इस पुस्तक में जातिवाद के कारणों में जाने की कोशिश की गयी है। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार पहले आर्य जातियों में कार्य का विभाजन नहीं था। हर एक मनुष्य हर एक कार्य कर सकता था। जब आर्य जातियाँ भारतीय उपमहाद्वीप में आयीं तो उन्होंने व्यापार प्रधान समुदायों को देखा जहाँ एक मुखिया के पास अत्यधिक शक्ति केंद्रित रहती थी। आर्यों में सत्ता लोभी लोगों ने इस व्यवस्था को अपना लिया था। धीरे धीरे यह व्यवस्था अपनी जड़ मजबूत करती गयी और इसको बदलना लगभग असम्भव हो गया। आर्यों और गैर-आर्यों के बीच के युद्धों को लेखक ने अपने शब्दों में व्यक्त किया है जिसके कुछ कुछ उल्लेख महाग्रंथों में मिलते हैं। मध्यकाल तक पिछड़ी जातियों में उच्च जातियों के प्रति इतना क्षोभ आ गया था कि उन्होंने विदेशी शासन को भी अच्छा माना है।

पुस्तक की आखिरी कहानियों में लेखक ने साम्यवाद को भारत की बुराइयों के हल के रूप में प्रस्तुत किया है। उस समय सोवियत संघ की कहानियों को सुनकर एक बार लग सकता है कि सामन्तवादी व्यवस्था का अन्त हो गया था और शासन का एकमात्र उद्द्येश्य लोगों का कल्याण था। जातिवाद और आय में घोर असमानता जैसी समस्याओं का हल साम्यवाद कहा गया है। इतने वर्ष बीत जाने के बाद पीछे मुड़कर देखा जाये तो सोवियत के साम्यवाद को पूरी तरह सफल नहीं कहा जा सकता। निरंकुशता किसी भी तरह की हो उसे सराहनीय नहीं कहा जा सकता है। यह भी हो सकता है कि सोवियत संघ में साम्यवाद को अच्छे से लागू न किया गया हो। लेकिन इसके माध्यम से सांकृत्यायन जी ने दबे कुचले वर्ग की समस्याओं को एक आवाज दी है।

पुस्तक में बीस कहानियाँ हैं और उनके बीच में कुछ सौ वर्षों का अंतराल दिया गया है। इन कहानियों के मध्य परिवर्तन विश्वसनीय बन रहता है। 8000 वर्षों के समय में लेखक ने पूरे इतिहास का एक निचोड़ प्रस्तुत कर दिया है। कहानियों की शैली में पर्याप्त विविधता दिखती है। विवरण, वार्तालाप, आत्मकथा, प्रपंच आदि के माध्यम से लेखक ने लोगों की सोच को व्यक्त किया है और समाज में आते हुये बदलाव पर लोगों की प्रतिक्रियाओं को दिखाया है। पुस्तक के अंत में भदन्त आनंद कौसल्यायन ने कहानियों के स्रोतों के बारे में लिखा है।


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