एक आवाज़ थी
जो उसने क्रांति के ग्रंथों से
थोड़ी-थोड़ी इकठ्ठा करके
सम्भालकर रख लिया था कि कभी बोला जा सकेगा
बड़े होकर वह आवाज़ और भी बढ़ी उसमें
वह और भी तड़प उठा
वह आवाज़ निकालने को,
वह क़िताबी ज्ञान को
क्रांति समझ लेता है
और झुलसता है प्रचलित दौर के चलन से
और भागा है फिर से
निर्णय के केंद्र से
ताकि चुनौती देने का मौका न आये,
उसकी आवाज़ अब नहीं आती है,
दूर जाते जाते वह आवाज़
साँझ की लाली में घुलकर कहीं गायब हो गयी थी
हर आवाज़ों पर संगीत नहीं जमाया जाता,
क्षितिज के पार लोग
सुना है उसे याद भी नहीं करते
मृत होने के बाद

बहुत दिन बाद
उनकी आत्मायें मिलीं
और सबकी यही एक शिकायत रही,
कि मेरा दौर क्रांतिकारी नहीं था


Leave a Reply