उस शाम को
तब तक तो कोई उल्लेखनीय बात नहीं थी
वहाँ कुछ पीछे छोड़ देने पर विजय-भावना
पूरे माहौल में सुगन्ध की तरह फैली थी
जीवन का एक समारोह-सा हो रहा था
स्वर-लहरियाँ एक के पीछे एक दौड़ रही थीं
जीवटता वाद्य-यंत्रों से छन-छन कर आ रही थी
और तट के किनारे
जीवन का नृत्य जोरदार चल रहा था,
सूरज भी इन्हें देखने टीले के पीछे चला आया था।

लेकिन उस शाम एक अजीब बात हुई
उस शाम सूरज अस्त नहीं हुआ
मद्धम लहरों के ऊपर आ खड़ा हुआ
और नाचने लगा
वातावरण ने सूरज की लाली को आत्मसात कर लिया
उस शाम की अन्तिम किरणें
जैसे हर किसी के अंदर आकर बस गईं
और नयी स्फूर्ति के साथ
जीवन का नृत्य और भी जोरदार हो गया
इन सबको देखकर सूरज और भी बहक गया
समुद्र की सतह पर तरह-तरह की आकृतियाँ बनाने लगा
लहरों को अपने से दूर हमारी तरफ भेजने लगा
उस दिन सबने देखा था
कि सूरज अस्त नहीं हुआ था
बल्कि उसके पहले ही एक नया सूरज उग आया था
लाल, उत्साहित, नया, नहाया हुआ-सा
समय एक क्षण के लिए थमा
हम सबने सुनी अपने अंदर एक ध्वनि
एक चिर-परिचित ध्वनि
जो हमारे अंदर ही कहीं तिरस्कृत-सी रहती है
उस ध्वनि के शुरू हो जाने के बाद
अब वहाँ रहना प्रासंगिक नहीं रह गया था
हम नए उगे सूरज का
थोड़ा-थोड़ा अंश लेकर लौट आये थे।


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