अपने रोशन चेहरे पे वो नाज़ करते रहे रात भर
खुदा की काबिलियत पे फ़ख्र करते रहे रात भर

रुख़ से नक़ाब हटाया उन्होने क़ि शमाँ बुझ गयी
फिर जतन से चेहरा पर्दे में छिपाते रहे रात भर

चाँद को चाँदनी से कब दूर पाया है किसी ने
फिर भी चाँद को तन्हा ही देखते रहे रात भर

बड़े खुलूस से भेजा उन्हें जश्न-ए-बर्बादी का बुलावा
कदम चलते रहे, वो खुद को रोकते रहे रात भर

अदाओं की दिलकशी को मोहब्बत समझ बैठे थे
उसी मोहब्बत की आग में फिर जलते रहे रात भर

मेरा फसाना बज़्म में सुनने के कहाँ काबिल था
वो अपना दर्द-ए-दिल ही बयाँ करते रहे रात भर

ठुकराते रहे ज़िंदगी भर मोहब्बत की मेरी पेशकश
वफ़ा खोजते हैं अब मुसल्सल, बेवफाओं में रात भर

वास्तविकता की दुनिया से कोई नाता नहीं मेरा
आईने में जब खुद को ही तलाशते रहे रात भर


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