तुमने कह दिया है
और यह बड़ी बात है।
जिस दौर में
सांसें चलती रहें
बस यही जीवन का पर्याय हो जाये
जहाँ हम अपने आसपास की मुश्किलों को देखकर
आंखें मूँद लें
और मान लें
कि कुछ बदलाव लाना हमारी जिम्मेदारी से बाहर है
जहाँ शोषण के खिलाफ
कुछ भी बोलना बस खानापूरी रह जाये
जहाँ कोई कुछ सोचता न हो
और मान लेता हो
कि अच्छा दौर उसके बिना कुछ किये
आखिरकार आ ही जायेगा
जिस दौर में कोई अन्याय के विरुद्ध लड़ता न हो
किसी की जिंदगी प्रभावित न होती हो
जिस दौर में अख़बारों की सुर्खियाँ
आवारा भीड़ के कारनामों से भरी रहती हैं
लेकिन उन पर अपनी सहूलियत के मुताबिक़
चुप रहा जाये
जहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मायने
किसी स्वप्नलोक समाज की परिकल्पना के आगे धूमिल हो जायेंगे,
उस दौर में तुमने व्यवस्था के विरुद्ध कुछ कह दिया है,
और यह बड़ी बात है।


धरती के किसी कोने में
कृत्रिम सुंदरताओं से बहुत दूर
बादलों से रहित साफ़ आसमान की सजावट में
तारों की एक दूधिया उजली पट्टी है
जिसके आकर्षण में
आकाश में और कुछ देखना नहीं होगा,
जो क्षितिज के
एक कोने से दूसरे कोने तक सरपट चली जाती है
जिसमें दिखते हैं रंग संसार के,
तारों की आकृतियाँ
और उन आकृतियों के नाम निकालने की चुनौती,
इन्हीं तारों के काफिले से भटका
एक तारा हमारा सूरज भी है
जो आकाशगंगा के किसी और कोने से
इन्हीं अनगिनत तारों की पट्टी के
किसी कोने में मौज़ूद
अपनी पहचान के लिये तरसता होगा,
इस उजली पट्टी के चार कोनों पर
चार तारों को गाड़कर
हमारा ग्रह उसमें तस्वीर देखने की कोशिश में लगा है,
और अंतरिक्ष के ललाट की शोभा बढाती
एक आकाशगंगा है
सुंदरता की कोई भी परिकल्पना
जिसके बिना अधूरी होगी।


उजालों की दुनिया से कोसों दूर
नुकीले पहाड़ों से टँगी एक घाटी में
अँधेरी रात के पर्दे में
छोटे-छोटे, लाखों-करोड़ों हमसफ़र मौज़ूद हैं
जहाँ से प्रकाश हम तक पहुँचने में
सदियाँ लगा देता है
(कुछ उससे भी दूर हैं)
जिन्हें देखा है
परियों वाले नाट्यमंचन में
मंच के पीछे पर्दे में
कई कोनों वाली
कार्डबोर्ड की चमकती आकृतियों में,
ऐसे तारों को देखना
सच्चाई के आमने-सामने खड़े होने जैसा है,
वो विशाल तारे भी हैं
जो आसानी से
सैकड़ों ये सौर-मण्डल लील जायें,
ऐसे तारों से बनी हजारों आकाशगंगायें हैं,
जहाँ सुपरनोवा जैसी घटनायें
चलती रहती हैं कई-कई उम्र तक,
अब आकाशगंगाओं के समूह भी पहचान लिये गये हैं
इन समूहों के समूह भी विचरते रहते हैं
दूर-दूर तक परिभाषाओं को खींचते हुये,
यह विराट का चित्र है
जिसमें एक मनुष्य नाम की संरचना को
कहीं खोजा नहीं जा सकता है,
कभी-कभी
अपने अस्तित्व का सही-सही आँकलन करना
जरुरी हो जाता है
तब चकाचौंध से दूर
रात के आकाश को एकटक निहारने
किसी निर्जन जगह जाना होता है।


एक दिन हम नहीं बोलेंगे
या तो बंदूकें हमारे लिये बोला करेंगी
या बंदूकें हमारी ज़ुबान छीन चुकी होंगी।

एक दिन जब हमारे तुम्हारे मतभेद बहुत बढ़ जायेंगे
विचारधारायें जो वैसे तो सिंहासन से उतरती नहीं हैं
लेकिन हमको दूर करने उतरेंगी
और हम एक दूसरे को सुनने की जगह
अपनी बातें सुनाते रहेंगे
इसके बाद भी अगर मतभेद दूर नहीं होते हैं
तो हम बंदूकें चलाकर तुरंत मतभेद हल कर लिया करेंगे।

एक दिन विरोध के तरीके बहुत बदल जायेंगे
ये भाषण, ये लेख, ये सभायें
ये पैम्फलेट, ये गोष्ठियाँ
ये सभ्य मानवों के वार्तालाप
हमारे विरोध को जताने में नाकामयाब रहेंगी
ये मतभेदों का सम्मान जैसी बातें हवाई लगने लगेंगी
तब हम बंदूकें उठाकर अपना विरोध जता देंगे।

एक दिन बंदूकें जिंदगी बहुत आसान कर देंगी
तब जो सुनने में असहज लगता है
उसे आसानी से चुप करा दिया जायेगा
जो लोगों से अभी करा पाना मुश्किल है
तब वो भी करा लिया जायेगा
एक दिन हम सम्मेलनों की मेजों पर
बंदूकें भेज दिया करेंगे
जिनकी बंदूकें ज्यादा आधुनिक होंगी
वो अपने पक्ष में फैसले लिवा लायेंगे।

(गौरी लंकेश, पंकज मिश्र, राजदेव रंजन, कलबुर्गी, रुद्रेश,  पानसरे, लक्ष्मणानंद सरस्वती, दाभोलकर, सन्दीप कोठारी और वैचारिक मतभेद में मारे गये अन्य अनेक अनाम लोगों के नाम।)


पिछली बार जब बारिश हुई थी न,
तब घर के बाहर की सड़क पर
एक चहारदीवारी पर एक पेड़ झुक आया था,
उसकी एक शाखा की एक बड़ी लम्बी सी पत्ती
जो आसमान से गुजरे हुये किसी रॉकेट की लकीर सी लगती थी
रास्ते में कौतूहल से भरी उपस्थित थी,
जब भी घर से निकलना होता
और पेड़ के नीचे पहुँचता
वो पत्ती हमेशा मेरे माथे पर
अपने धारदार किनारे परोस देती,
और हवा में फिर दूर छिटककर जा खड़ी होती,
कोई पंछी जब उस पत्ती पर बैठकर गाया करता था
तब वह पत्ती कितनी शांति से उसे सुना करती थी,
सुबह उस पत्ती से मेरा मिलना हमेशा हुआ करता था
और तब विचार क्रम टूटता था
जैसे दूर गया हुआ एक मुसाफिर
घर की याद से बिफर गया हो।

बहुत दिनों बाद एक दिन उसी सड़क से गुजरा,
कोई वहाँ से नदारद था,
कल रात की आँधी उस पत्ती को लील गयी होगी,
मैं चारों ओर उसे खोजता हूँ,
घर से बाहर अब भी निकलता हूँ
लेकिन लगता है
जैसे मेरी सुबह हुई ही न हो,
या जैसे मैं अपनी गली आया ही न हूँ।


गरम हवा के थपेड़ों से गाँव जूझता है
एक थका हारा मनुष्य
आधी धूप - आधी छाँव में
नीम के पेड़ के नीचे सोता है
सपना आया है
कि धान के खेत का पानी
सूरज ने यकायक सोख लिया है,
होगा,
अब उठा नहीं जाता है।

प्यास से परेशान एक पंछी
बढ़ता है नदी के किनारे की तरफ
आँच से झुलसी, सिमटी-सी नदी
पालती है सूखी भैंस-बकरियों का पेट
भूख से बौखलाया हुआ
एक घड़ियाल घात लगाकर बैठा है
आने वाले पंछी के लिये
भूख-प्यास-आँच का यह खेल
यहाँ हर दिन खेला जाता है
सूरज बुझे तो शायद यहाँ
युद्धविराम की घोषणा हो।

निरखू मछलियाँ पकड़ लाया है
दिन भर तपकर
जश्न की कोई बात मिली है आज
आज दावत होगी
हाँ, थोड़ा बुखार है उसे,
नहीं, ठीक हो जायेगा
ज्यादा चिंता की बात नहीं है
हाँ, दावत तो आज है ही
और हाँ, पण्डत से पूँछना
कि बारिश का कोई जोग बन रहा है क्या।