मैं कोई पत्र लिख रहा हूँ
जिसमें बयाँ न हो सकने वाली बातें हैं
और अपवाद स्वरूप मैं शामिल कर लेता हूँ
तारों के टूटने के कुछ चित्र
जिससे तुमको यकीन हो
कि मैं भी इसी ब्रह्माण्ड का सदस्य हूँ,
चला देता हूँ
समय के चक्र को
नाच उठती हैं घटनायें
बहुत सम्भव है
समय की चक्रीय अवधारणा में विश्वास रखते हुये
कभी खुद को पत्र लिखते हुये देख सकूँ।

तुम मेरा पत्र पढ़ रही हो
जो बातें पढ़ी नहीं जा सकती हैं
तुमने पत्र को समय की दिशा में रखकर
उनके सारे मानी भांप लिये हैं
और किसी सुपरनोवा की रोशनी की तरह
तुम्हारी आँखें चमक उठती हैं
भाव से भर उठती हैं,
यह याद करती हो
कि ब्रह्माण्ड में इतना रिक्त स्थान है
कि दो तारों के टकराने की संभावना नगण्य है।

समानांतर संसारों में
हमारी दुनियाएं ऐसे ही चलती रहती हैं
कभी कोई प्रतिभावान भौतिक विज्ञानी
अपनी थीसिस में
ऐसे संसारों के बीच कोई खोई हुई कड़ी ढूँढ़कर जोड़ देगा
और हमारी दुनियाएं मिल उठेगीं।


एक दिन जो ये टीले हैं
इनके पत्थर चूर होकर
रेत के कणों में बदल जायेंगे
और किसी आँधी में दूर कहीं उड़ जायेंगे
ये नदियों का बचा-खुचा पानी
सागर की शरण लेगा
और अपने जीवन को फिर से दोहरा देगा
इन खण्डहरों की अंतिम ईंट भी
एक दिन इतिहास को कोसने के लिये नहीं बचेगी
कई पीढ़ियों बाद संसार के लोग ऊब जायेंगे
और इतिहास के महत्व को नकार देंगे
तब यहाँ के रास्ते वीरान नज़र आयेंगे
तब कहा जायेगा
कि काल भटकता रहा देश में
जिस परिणति के लिये
जिस स्थायीपन के लिये
वह अब उसे प्राप्त हुआ,
पूछा जायेगा कि अंतिमता अनाकर्षक क्यों है?

और बाहरी अंतिमता के उस दौर के बाद
शायद मनुष्य आंतरिक अंतिमता की तरफ उन्मुख होगा
जहाँ फिर एक दौड़ शुरू होगी
जीवन को मतलब से सजा देने की,
कलम से कलम लड़ेगी
और वादों के टकराव शुरू होंगे
व्याकुलता के नए दौर शुरू होंगे
अस्तित्व का संकट फिर उठ खड़ा होगा
और अंतिमता की खोज ही अंतिमता बनती जायेगी,
क्या अंतिमता मात्र एक मृग-मरीचिका है?


अबकी बार जब आओगे तुम
कुछ नयी मिसालें लेकर आना,
पिछली बार तुम जिन मिसालों को लेकर आये थे
उन्हें आज़माकर देखा है मैंने,
कॉफी की चुस्कियों के साथ
एक अज़नबी दुनिया पर मढ़कर
वो मिसालें जब तुमने मुझे सौंपी थी
तो विरासत की कोई चीज समझकर
मैंने संभालकर रख ली थी,
किंवदंतियों का उपासक मैं अकेला नहीं था,
लेकिन धरातल पर आते-आते
वो मिसालें असहज होने लगीं
शायद आसमान में रहने की आदत से
ये मिसालें कुछ ढीठ हो गई थी
और मुझसे कुछ कहासुनी भी हुई,
अबकी बार जब आओगे तुम
कुछ नयी हिदायतें लेकर आना
ताकि उन मिसालों को उपयोग में लाया जा सके
और यह जाना जा सके
कि जंगल से दूर एक पेड़ कब तक बचता है

अबकी बार जब आओगे तुम
कुछ नयी मिसालें लेकर आना


कल:
वो बेचैनियों के उस दौर में था
जहाँ खालीपन उपासना की चीज थी
अकेलेपन के सान्निध्य में न जाने
कौन-कौन से विचारों की यात्रायें होती थीं,
जहाँ बैठकर वह सोचता था
कि अगर दुनिया ऐसी भी हो तो क्या गलत है,
जहाँ लकीर का फक़ीर न होना एक साधारण बात न रहकर
एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी बन जाती थी।

बेचैनियाँ भी वहीं थी
जो कभी न कभी अन्य से भी रु-ब-रु हुई ही थीं
पर उसके साथ हादसा हुआ था
बेचैनियाँ गई नहीं
उसमें समा गईं,
और वह उन्हीं बेचैनियों को सौंपता रहा
ज़माने के सही-गलत के मापदण्ड
जहाँ से कुछ नहीं निकलता था
बस एक ढर्रा
और सफलता-असफलता के मानक,
बेचैनियाँ बढ़ती गईं
उनकी ओट से देखा उसने सतही बातें
दुनिया को नई तरह से देखने की कोशिश भी की
लेकिन प्रकृति के कैनवास पर
सदियों से चढ़ाये कृत्रिम रंगों पर
उसके रंग बहुत देर टिक नहीं पाये,
उसकी बेचैनियों के शब्द
वाइजों के लिये परेशानी के सबब थे,
लेकिन वह चलता रहा
उस राह पर जहाँ मिलती थीं
कई राहें बेचैनियों की,
आवारापन की, पागलपन की
उन राहों पर जहाँ चलकर
अपने सामान्य रूप में
कहते हैं कि कोई लौटता नहीं।

आज:
वो पागल नहीं है
सभ्य लोगों के तौर-तरीके
उसने अपना लिये हैं
ये कैसे हुआ
किसी को नहीं पता,
सुना है कि सभ्य बनने के बाद
बहुत समय तक उसकी आवाज़ गायब थी।


जिन्दगी के दो छोर हैं,

पहला, जहाँ आत्म को एक रूप मिलता है
ब्रह्म से कुछ अलग
और जन्म लेती हैं सम्भावनायें
निराकार से साकार निकलता है
बिलख उठती है इकाई संरक्षण खोकर
हर एक रचना का
जो सबसे सशक्त रूपक है -
जन्म,
लो मिला,
पौ फूटती है
जीवन जितना लम्बा दिन लो शुरू हुआ।

दूसरा, जहाँ सम्भावनायें नियति से मिलती हैं
और किताब के अन्तिम पन्ने जैसी
एक संतुष्टि लिये रहती हैं
आत्म और परमात्म अलग नहीं रहते हैं
सार्थकता और निरर्थकता की बहस
मानी खोने लगती है
समय में गोधूलि वेला के रंग मिलने लगे हैं
घर चलें,
ब्रह्म में लीन होने का समय है
चलो,
पटाक्षेप।

इन्हीं दोनों छोरों के बीच
हम बाँधकर एक डोरी और उस पर चढ़कर
फासला तय करने का प्रयास करते हैं
कई बार देखने वाले तालियाँ खूब बजाते हैं
जहाँ दर्शकों के आनन्द के लिये
एक पैर से रस्सी पार करने से पहले
एक पल भी नहीं सोचते हैं
वो जो डोरी कहीं उलझी हुई रखी है
उसे देखने कौन जाता है
इस खेल का नाम जानते हो?
लो, मैंने कहा - जीवन।

अब निरपेक्ष होकर देखो,
जन्म एक घटना है
मृत्यु एक घटना है
जीवन जो बहुत बड़ा लगता है,
वो भी एक घटना है,
और ब्रह्म में ऐसी घटनायें होती रहती हैं।

(हरमन हेस की एक रचना से प्रेरित)


देखना और दिखना,
क्या एक ही बात होती है?

यूँ ही नहीं मान लेना चाहिये
कि मैं और तुम किसी बात पर सहमत हैं
बिम्ब तुम्हारे हैं
और मानी मेरे हैं
परिदृश्य तुम्हारे हैं, कहानी मेरी है
हवा तुम्हारी है, संगीत मेरा है
और देखा जाये तो
अर्थपूर्ण तुम्हारा है ही क्या?

तुमने मुझे आकाशगंगा दिखाई
मैंने वहाँ देखा कृत्रिम प्रकाश से दूर
एक गाँव का बचपन,
तुमने मुझे सबसे ऊँचे गाँवों में से
कुछ एक दिखा दिए
मैंने देखा वहाँ जिजीविषा
प्रकृति के सामने खड़े होने का दुस्साहस,
तुमने मुझे घाटी में
टूटी हुई पगडण्डियाँ दिखाईं
मैंने वहाँ देखा
वैश्विक नाट्यमंच की टूटी हुई कड़ियाँ,
तुमने मुझे लाल-सफ़ेद रंग के घर दिखाये
मैंने उनमें खोजे
किसी दूर देश के वास्तु के खोये हुये उदहारण।

मैंने वहाँ वह नहीं देखा
जो दिख रहा था,
मैंने वहाँ वही देखा,
जो मैं देखने गया था, स्पीति।


नदी आज की तरह शांत
हमेशा से नहीं थी
अब घाटी के किसी कोने में सिमटकर
एक गौरवमयी इतिहास पर
इतराने या उसके बारे में सोचकर
पश्चाताप करने के अलावा चारा ही क्या है,
नदी के बीचो-बीच एक पत्थर
अब दिखने लग गया था
जिस पर दिखते हैं काटे जाने के निशान
जो किसी तेज धारा ने
अपने पराक्रम काल में बनाये होंगे,
कुछ सौ मीटर की दूरी पर जाकर
नदी ठहरी है पिछली कुछ पीढ़ियों से
लोग नदी देखने वहीं जाते हैं,
वहीं पास के एक टीले से
सूरज नदी को सुनहरी रोशनी में
नहलाकर ही सोने जाता है,
जहाँ सुनते हैं
कि सदियाँ एक दूसरे से मिलने आती हैं
इतिहास अपनी कलम से
भविष्य को दिशा दिखा रहा होता है
सच और झूठ
उपयुक्तता के तराजू में तौले जा रहे होते हैं,
सुनो, तुम नदी को यहाँ मत देखो
ये नदियाँ अब घाटियों में नहीं बहतीं
अब ये बहती हैं
समय में, काल में,
वह देखो दूर किसी काल की नदी
वर्तमान के महासागर में अभी अभी मिली है
जहाँ से फिर कई पल
बादल बनकर उठेंगे
और फिर कुछ नदियाँ बह उठेंगीं।

शायद नदी की यह पतली धारा भी
किसी दिन सूख ही जायेगी
लेकिन रह जायेगी
इन पत्थरों पर, इतिहास की दिशा पर, जनमानस पर,
एक अमिट छाप।


इंतज़ार की इन्तहा
कहीं कहीं दिखती है मानिये,
दशकों से नदी किनारे खड़े ये पेड़
या इनसे पहले इसी अवस्था में
यहीं पर खड़े इनके पूर्वज
कब से नदी की धार को
टकटकी लगाए देखते हैं
इन्होंने धूप से बचाकर छाँव भी दी है
हवाओं का खेल भी साथ खेला है
सावन में बादलों के अंधेरे में
साथ घबराये भी होंगे
नदी को पत्तियों के माध्यम से
साल के चक्र भी कई गिनायें होंगे
मगर एक लफ्ज़ भी उसके लिए नहीं बोला;
नदी ने भी नहीं;
एक सच्ची श्रद्धा से
सृष्टि चलती रही।

मगर पतझड़ के मौसम में
एक पीली पत्ती नदी पर गिरी
उसकी छुवन से नदी की सतह पुलकित हो उठी
जहाँ कहते हैं कि नावें घूमने लगती हैं,
उस पत्ती को नदी उलट-पलटकर देखने लगी;
क्या कहते हो?
वह पत्ती नहीं है?
अरे हाँ!
हाँ, प्रेम पत्र।


ये जो खण्डहर हैं
जिन्हें हम इतिहास का साक्षी कहते हैं
अगर देखा जाये तो
इन्होंने इतिहास को देखा ही नहीं है
बल्कि उसमें लिप्त रहे हैं
किसी घटना का साक्षी होने के लिये
यह जरूरी है
कि तटस्थता बनी रहे,
इतिहास के महिमामण्डन में
इन पत्थरों का हित भी सम्मिलित है,
विसंगति यह है
कि इतिहास हम इनसे पूछते हैं।

तो इतिहास के निर्माता
हम स्वयं ही हैं
ये धारणायें इन खण्डहरों को हमने दी हैं,
कल कोई नयी विचारधारा हावी होगी
तो इन पत्थरों पर नये अर्थ आरोपित कर दिये जायेंगे।


एक दिन
मानव निर्मित कोई धूल
अपने भयानक हाथों से
शाम के सूरज को लील लेगी
ये नदियाँ दूर कहीं
बाँध बनाकर रोक दी जायेंगी
ये महल अट्टालिकायें
ज़मींदोज़ हुए पड़े रहेंगे
ये पूरब ये पश्चिम
जैसे हमें ज्ञात हैं
वैसे नहीं रह जायेंगे
ये ज्ञान ये विज्ञान
ये मानव प्रजाति की उपलब्धियाँ
किंवदंती बनकर रह जायेंगी
एक दिन
सार्थक सारी बातें
निरर्थक साबित कर दी जायेंगी।

तब दूर किसी घने जंगल में
एक वन-मानुष
दो पत्थर रगड़कर
आग पैदा करेगा
और सृष्टि का पहिया
एक बार फिर से घूम उठेगा।


चहारदीवारी के बाहर कुछ पेड़ खड़े हैं
उनके बाहर हैं कुछ खाली कुर्सियाँ
बाट जोहती हुई
आदत से मजबूर किसी इंसान की,
उसके बाहर दूर तक
फैले हैं धान के खेत
ओढ़ ली है हरियाली चादर
यादों की नमी से कुछ फसलें उपजती हैं,
उसके पार हैं कुछ पहाड़ियाँ
जहाँ से पत्थर गिरते हैं
पर गिरते भी नहीं हैं
अटक जाते हैं खयाल बनकर
सरकते रहते हैं जिन्दगी के लम्हे बनकर,
उसके पार हैं कुछ मन्दिर
पहाड़ी की दुर्गम छोटी पर
जहाँ झंडियाँ हवा में फड़फड़ाती हैं
जहाँ से निकलते हैं मंत्र पुराने,
उसके पार भी कोई जगह है
जहाँ कोई खाली कुर्सी नहीं है
जहाँ नमी से हरियाली नहीं निकली है
जहाँ जिन्दगी अटकती नहीं है
जहाँ झण्डों का कोई नामोनिशां नहीं है।

वहाँ मैं और तुम बैठे हैं
तुमने परिप्रेक्ष्य की प्रत्यंचा पर
शब्द तान दिए हैं,
वर्तमान की अंगीठी में
हम स्मृतियाँ सेंक रहे हैं,
हवा भयभीत होकर
उलझाने लगी है ज़ुल्फें तुम्हारी,
तुम्हारे माथे की बिन्दी से
निकलते हैं अथाह रंग
झण्डों को रंगते चले जाते हैं
रंग फैलते हैं क्षितिज के कोने तक
देखो सूरज भी आज रंगकर ही जायेगा
और दिखती है
बादलों के कोनों पर एक उजली पट्टी,
मैं थम गया हूँ वक़्त बनकर
और मुझसे निकल रहे हैं छन-छनकर
प्रत्यंचा से छूटे हुए शब्द।


बालकनी के नीचे खिला हुआ
अमलतास के फूलों के आखिरी गुच्छा
कभी आखिरी राही के चले जाने के बाद
धुल छँट जाने के बाद
अपने होने या न होने के बारे में सोचता है
कि आखिर कौन सी वजह होगी
जो उसके वज़ूद को सही-सही बयाँ कर सकेगी।
क्या वह सिर्फ पीला रंग है?
क्या वह एक विशेष आकृति में गूँथ दी गई
परतों का बस एक समूह है?
क्या वह झूमती हुई पत्तियों का मात्र एक सहचर है?
क्या वह विभिन्न तत्वों का एक जटिल मिश्रण है?
या इन सब बातों से मिलकर बना कुछ अन्य?

यदि हाँ,
तो क्या अमलतास का यह पीला फूल
बस कुछ एक गुणों वाली वस्तु बनकर रह गया है?
हर एक वस्तु के कुछ तत्व हैं
क्या उन तत्वों को अलग-अलग करके देख सकने से
वज़ूद में झाँका जा सकता है?
क्या थीसेस के जहाज की तरह
इकाई और सम्पूर्णता की यह बहस
मात्र कारणों के बल पर जीती जा सकती है?

यदि नहीं,
तो क्या यह मान लेना चाहिये
कि इकाइयों का महत्व तभी है
जब सम्पूर्ण एक बार दिख जाए?
क्या ऐसा नहीं होता
कि हर एक वस्तु का
अपना एक मर्म होता है
जिससे अलग उस वस्तु और मर्म
दोनों को नहीं देखा जा सकता है
और अलग-अलग दोनों अपनी मूलता खो बैठते हैं?
यह भी हो सकता है
कि किसी वस्तु को
ज्ञात ढांचों में ढालना उचित न हो?

(या शायद सम्भव भी न हो।)


ये निर्मल शीतल जल
ये छोटे पत्थरों के ऊपर छोटी लहरियाँ
घाटी में सूरज को देखने के
बस कुछ चुनिन्दा पहर
और हर चीज के अस्तित्व को
उद्देश्य देती हुई सिमटी हुई धारा,
किनारे पर खड़ा होकर सोचता हूँ
कि मानी एकतरफा क्यों होते हैं।

ये सूरज-चाँद को दिये गए रूपक
कभी कुछ बढ़ा-चढ़ाकर
तो कभी चाशनी में डुबोकर
पेश की गई शब्दों की लड़ियाँ,
ये झील का पानी
जिसमें हवा के संगीत में
अगाध श्रद्धा से नाचती हैं सूरज की किरणें
कभी इस बात से वाकिफ़ होगा
कि रोज की इन बातों के कुछ मानी भी होते हैं
जो कि हमने इन्हें दे दिये हैं।

कभी शायद हवा का एक झोंका
किसी पगौड़ा से उलझाई हुई झंडियों के माध्यम से
ये बोल सकेगा
कि ये जो मानी तुमने दिये हैं
इनसे अलग बहुत से मानी हैं
तुम मुझे सुनो तो सही।
सदियों से मुझ जैसे बहुतों ने
तुम्हें मानी देने की कोशिश की है,
क्या ऐसा नहीं हो सकता
कि तुम मुझे मानी दो, स्पीति?


गन्ने के खेतों के पीछे
पहाड़ी की चोटी पर
लाल रंग का एक गोला
धीरे-धीरे गिर रहा है,
बादलों के किनारे पर
दिखती हैं चमकीली धारियाँ
जहाँ से निकलता है एक अलग तरह का आलस
जो सबमें व्याप्त हुआ जाता है,
पक्षी अँधेरा होने के पहले
अपने पिंजड़े में लौटना चाह रहे हैं,
और जलने लगे हैं दिये यहाँ वहाँ
जो सूरज का थोड़ा हिस्सा रखकर
सुबह तक लड़ते रहेंगे,
और नित्य घटना थी ये
उस दिन भी सूरज अस्त हुआ।

कई सौ साल पहले
इन्हीं पहाड़ियों के पीछे
इसी नदी के किनारे
गाजे-बाजे के साथ
एक बहुत बड़े साम्राज्य का सूरज
अस्त हुआ था,
अंतिमता लिये हुए।


भयानक सन्नाटा पसरा हुआ था
ऐसा सन्नाटा
जिसमें ध्वनि को
किसी कोने में बैठा हुआ देखा जा सकता था,
देखते ही देखते सन्नाटे में खो गये
वर्तमान के हर एक पहलू
फिर क्षितिज के उस पार से अंधकार उठा
उसके पीछे क्षत-विक्षत लोगों की सिसकियाँ
काले पक्षियों का एक गुट चल दिया
उस ओर जहाँ हो रहा था
विधाता की नाकामियों का खुला प्रदर्शन,
उस अंधकार के पीछे से एक आँधी उठी
जिसमें समाहित हो गया था इतिहास
इतिहास, जो ध्वस्त करता गया रास्ते के तथ्य
इतिहास, जो शांत करता गया हर एक आवाज़ को
इतिहास, जो वक़्त से कहीं आगे निकल गया था,
उस आँधी के पीछे सन्नाटे की एक और परत थी,
और आँधी से निकली सहसा
ढोल-नगाड़ों की ध्वनियाँ
जो धीरे-धीरे तेज होती गईं,

दरबान ने दरवाज़ा खोला,
कहा, महाराज
युद्ध में सेनाओं ने
पराजित कर दिया है शत्रु को
जीत का जश्न शुरू किया जाए!


मेरे इख़्तियार में नहीं हैं मेरी ईज़ाद की हुई बातें
थम गया हूँ मैं, बह रही हैं बनकर बयार ये बातें।

कभी वक़्त का रुख मोड़ देने का माद्दा रखती थीं
आज ख़ुद आवारगी में इस क़दर मानूस हैं ये बातें।

हाँ इनमें किसी के भी वाक़ये बयाँ नहीं होते हैं
किसी की ज़िन्दगी का आईना नहीं हैं ये बातें।

मेरे शौक़ में नहीं हैं बज़्मों के कहकहे या क़सीदे
मेरे सुकून के लिए हैं बिछड़ी नज़्में कुछ भूली बातें।

ये नई हवा नहीं है मत सोचो कि ये रुक जायेंगी
वज़ूद में तो कब से थीं, भले पोशीदा रहीं ये बातें।

क़ायम नहीं हो पाई थी जो वाइज़ की निगेहबानी
पाबंदियाँ लगाओ कहो गुनाहगार जो हैं ये बातें।

और कहो कि यह सही नहीं है कि फैलें ये बातें
मैं मुतमईन हूँ कि तुम्हें असहज कर देंगीं ये बातें।


ये तराशे हुये खम्भे
और उन पर रखे हुये भारी पत्थर
जिन्हें छूकर कभी लोग
चन्द लम्हों की ख़ुशी पा जाया करते थे,
वक़्त के किसी हिस्से में
क़ैद कर दिए जाने से
कुछ नाराज़ से दिखते हैं।

कुछ अवशेष
पुरातत्व विभाग की सलाखों के पीछे
सहमे खड़े हैं
सलाखों के पीछे वज़ूद दिखता नहीं है
सलाखें हटीं तो वज़ूद मिट जायेगा
इसी उधेड़बुन में
ये पत्थर सदियाँ बिता देंगे।

लेकिन कभी भूले-भटके से
कोई केशकंबली अगर यहाँ आ पहुँचे
और असाध्य वीणा के तार झंकृत कर दे
तो ये पत्थर, ये अवशेष
तवारीख की गिरफ्त से आजाद हो उठें।

तवारीख - history.


मेरे सामने अब मुझसे अलग कोई नहीं है
मैं ही किसी और रूप में
अपने सामने विद्यमान हूँ।

कभी किसी तो किसी विचारधारा का
मुखौटा लिये
मैं खुद से ही लोहा ले रहा हूँ
मैं समय के किसी और भाग के
अपने आप से मुखातिब हूँ,
और एक-दूसरे की हालत पर
मेरे दोनों रूप सवालिया निशान खड़े कर रहे हैं
और खुद को ही झुठला रहे हैं।

वह जो एक पतली सी परत थी
किन्हीं मतभेदों की
जो कि मुझको मेरे सामने के किसी और रूप से
मुझको अलग करती थी
मैंने भेद ली है,
और उस शख्स में
मैंने खुद को ढूँढ़ लिया है,
और उसको मेरे मन से गुजरने का न्यौता भी दिया है।

किसी क्षण में तल्लीन
विलीन होकर मेरे रूप आपस में उलझ रहे हैं,
लेकिन वह सब मैं ही हूँ
मेरे सामने अब मुझसे अलग कोई नहीं है। 


खण्डहर ऐसे ही थोड़े बनते हैं
एक मज़बूत इमारत ऐसे ही थोड़े ग़ायब हो जाती है,

तथ्यों की एक-एक ईंट जोड़कर
उसने एक मज़बूत नींव बनायी होगी
तमाम भट्ठों की
अच्छी से अच्छी, जाँची-परखी हुई तथ्यों की ईंटें
जिन्हें बनाने में किन्हीं कारीगरों ने
सैकड़ों साल लगा दिए होंगे,
फिर उस नींव को
मुख्यधारा रूपी ज़मीन के नीचे
दबाया होगा
और विचारों की इमारत खड़ी की होगी
पहली बार में अगर अच्छे से न बना हो
तो उसने लच्छेदार भाषा का लेप भी लगाया होगा
आने-जाने वाले लोगों ने
उस इमारत की बहुत तारीफ की थी,

लेकिन विचारों की बस इमारतें ही नहीं होती हैं
विचारों की आँधियाँ भी होती हैं
चिन्तन के उच्च दबाव वाले क्षेत्रों से उठने वाली ये आँधियाँ
रास्ते में आने वाली विचारों की इमारतों को
धराशायी कर देती हैं,
तमाम आंदोलनों की, तमाम वादों* की ये आँधियाँ,
उसकी भी इमारत बच नहीं पायी थी
नींव अभी भी बची थी
तबाही की दास्ताँ सुनाने के लिए,
मजबूत थी या शायद ओझल थी,

ऐसी इमारतें हर रोज़ कहीं पनपती हैं
और खण्डहर बनकर रह जाती हैं,
शायद तुमने भी दो पैरों पर
चलते-फिरते खण्डहर देखे होंगे, अदीब?

*(वाद - ism)