भीड़ से मैं रोज़ाना गुज़रता हूँ
और भीड़ में एकदम साधारण चेहरे देखता हूँ
और उनमें खोजता हूँ
धरती, आसमान, दौर, दूरी,
सपने, नींद, रतजगे,
भूख, आराम, धूल, धूप
और ये औसत चेहरे हर जगह हैं;
ठेले पर मक्खियाँ हटाता हुआ एक जलेबी बेंचने वाला,
एक हाथ में नोटों की गड्डी सम्भालता हुआ
और दूसरे हाथ से पेट्रोल भरता हुआ,
बस की भीड़ में अपनी जेबें बचाता हुआ,
तीन रुपये की कलम बेंचता हुआ,
पीला हेल्मेट पहनकर इमारतें बनाता हुआ,
फ़ाइलों के ढेर में डूबा हुआ,
ऑफ़िस में सोता हुआ,
समुद्रतट पर ‘रोमैंटिक वाक' खोजता हुआ,
पार्टियों की शान बनकर रहने वाला,
मोटर साइकल आगे वाले पहिये पर रोककर दिखाता हुआ,
टी वी पर समाचार देखकर चिंतित होता हुआ,
भविष्य को देख लेने का भरोसा देता हुआ,
मंच से समस्याओं का निवारण देता हुआ,
हर एक औसत चेहरा
एक तरह से औसत ज़िंदगी जीता है,
औसत चेहरों के समुद्र में
डूबता रहता है
उतराता रहता है
जब तक साँस ज़िन्दा है तब तक,
समर्पण के पहले तक
घसीटती रहती हैं जिंदगियाँ चेतना को
समय के समक्ष
आत्म-समर्पण कर देने के ठीक पहले तक।


एक सुबह हमें बैठना है
बारिश में नीम के पेड़ के नीचे
और देखना है सूरज को रोककर रखे हुये बादलों को झूमते हुये
घोंसले से झाँकती हुयी एक गौरय्या को,
हमें उठना है और चल देना है
वहाँ जहाँ मिलते हैं धरती और आसमान
जहाँ टाँगा जाता है इंद्रधनुष
जहाँ से उठते हैं पक्षियों के झुण्ड।

एक दिन हमें बैठना है
किसी पहाड़ की ढलान पर
जहाँ बिछी हैं किसी पेड़ की
सींक जैसी पत्तियाँ,
और पिछली यात्रा के स्थान
खोजने हैं पहाड़ियों में
सोचना है कि कितनी राहें चली जा चुकी हैं
और कितनी बाक़ी हैं,
कितनी धारायें पार की जा चुकी हैं।

एक साँझ को सीपियाँ बटोरनी हैं
समुद्र के किनारे बैठकर
गिननी हैं लहरें
करना है विदा सूरज को
जैसे हम विदा करते हैं किसी प्रिय को
यह जानते हुये की अलगाव क्षणिक है
हमें मिलना ही है
और याद कर लेनी है
बीते हुये कल की दुनिया।

एक रात हमें देखना है
गिरते हुये एक पहाड़ी झरने को
जिसका दूधिया रंग चमकता है
रात के उजाले में
जैसे आसमान से उतरती हैं परियाँ,
हमें सुनना है झरने का गिरना
और व्यथित पानी का बेबस चले जाना,
कुरेदना है पानी की यादों को
और फिर छिप जाना है अपने बसेरे में।


ब्रह्माण्ड के निर्माण में
जितने भी परमाणुओं का प्रयोग हुआ है
उतने में
कुछ और भी उतने ही आसानी से बनाया जा सकता था
उन्हीं परमाणुओं के एक बहुत छोटे से समूह से
बनी हुयी हैं सारी इकाइयाँ
समस्त ब्रह्माण्ड की तुम भी
बस एक छोटी-सी इकाई मात्र हो।

'Free Will' का अस्तित्व है भी क्या?
ये जाना जा चुका है
कि शरीर की समस्त क्रियायें
रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा नियंत्रित की जाती हैं
यानी जिस समय हमें लगता है
कि हम स्वतंत्र रूप से सोच-विचार कर सकते हैं
उस समय भी कुछ रासायनिक प्रक्रियायें
हमें ठीक वैसा ही सोचने के लिये प्रयासरत होती हैं,
यह असहज करने वाला ख़याल है।

व्याख्यायें बहुत हैं
जिसने ब्रह्म को जिस तरह से देखा
उसने उसकी उसी तरह से व्याख्या की
ब्रह्म सबकी व्याख्याओं से दूर रहा
व्याख्याओं से सत्य नहीं बदलता
सत्य नाम से परे है
लेकिन नाम दिये बिना
सत्य बताया नहीं जा सकता
क्या इसीलिये सत्य जाना नहीं जा सकता?
सत्य जानने के पहले
स्वयं सत्य की परिभाषा लिखनी पड़ेगी
उसके बाद ही किसी घटना को
'सत्य' के विशेषण से नवाज़ा जा सकेगा।

बिखरी हुयी हैं galaxies
पसरा हुआ है space
और फैला हुआ है time
जैसा हमें दिखता है संसार आज
वो परिवर्तन है
वरना विज्ञान मानता है
कि समय की शुरुआत में
सब एक था
उससे पहले के समय की कल्पना बेतुकी है।

विज्ञान यह भी मानता है
कि जीवन का एक ही स्रोत है
सभी जीवों का जीवन एक ही प्रक्रिया का परिणाम है
और उनमें अंतर
विभिन्न अवस्थाओं के परिणाम हैं
(वैसे तो और भी सिद्धांत हैं
लेकिन इसे लगभग मान ही लिया गया है)
और इस तरह से
जीवन की उत्पत्ति
एक अनियंत्रित, अनियमित घटना थी।

रेल की पटरियों की तरह
जीवन जाता है घने जंगलों में
और फिर से निकल आता है उसी तरह
जंगल के दूसरी तरफ़ से
बिना किसी बदलाव के;
जीवन की कोशिश यही है
कि स्थापित हो जाया जाये
और बदलाव सिर्फ़ बाहरी हों?

रात के दिये
जानते हैं अंधकार का स्थायित्व,
विशालतम तारों से निकलने वाला प्रकाश भी
अंतरिक्ष के अंधकार पर
विजय प्राप्त नहीं कर सकता
जब तक किसी पिण्ड से टकरा नहीं जाये,
मानी तब तक मानी नहीं हैं
जब तक कोई उनमें ख़ुद को खोज न ले,
स्वतंत्र रचना
स्वतंत्र रचनाकार
क्या मात्र भ्रम हैं?

सर्द दिन की किसी दोपहर
जब माहौल सुबह-सा होगा
तब सुनहरी धूप के लिये तरसते हुये
यह ख़याल आना चाहिये
कि सूरज निर्बाध गति से
काटता है चक्कर galaxy के केंद्र के चारों ओर,
वैसे ही चमकता है,
वैसे ही चलती हैं सौर आँधियाँ
ब्रह्म के अनुपात के आगे
ये मौसम, ये दिन-रात, सुबह-शाम
सब hyperlocalized घटनायें हैं।

समय चक्रीय है
रास्ते गोल-गोल घूमते हैं
सबसे बड़ी उपलब्धि यह है
कि जहाँ से शुरुआत हो
वहीं अंत के लिए वापस आ जाना
बिना क्षय के,
और यात्रा के बारे में सोचना;
प्रकृति में सबको
यह उपलब्धि हासिल नहीं है,
समय को भी नहीं, सूरज को भी नहीं।

एक सादे काग़ज़ पर
बनाते हैं कुछ आड़ी-तिरछी लकीरें
और फिर दे देते हैं उन्हें कुछ मानी
अलग-अलग लोगों के मानी भी
अलग हो सकते हैं;
क्या जीवन भी कुछ ऐसे ही नहीं है?
सबने जीवन को
अपने-अपने मानी दे दिये हैं
क्या सिर्फ़ तुलना करके जाना जा सकता है
कि कौन सा मानी सम्पूर्ण है?
क्या अपने दिये हुये मानी से
संतोष किया जा सकता है?

मनुष्य और प्रकृति में
तालमेल भी है, प्रतियोगिता भी,
किसको प्राथमिकता है
इस बात पर अभी तक
एकमत नहीं हो पाया गया है
मनुष्य भी तो एक तरह से प्रकृति का भाग है
तो क्या यह कहा जा सकता है
कि जो मनुष्य कर रहा है
वह प्रकृति कर रही है?

दी हुयी परिभाषा
और स्वयं खोजी गयी परिभाषा में
कौन उत्तम है
यह जानने का मापक क्या हो सकता है?
(हरमन हेस के सिद्धार्थ ने इनमें से दूसरा रास्ता चुना था)
जब तक परिभाषा खोज न ली जाये
क्या तब तक जीवन जीने का इंतज़ार किया जाये?

जीवन का यूँ तो कोई प्रत्यक्ष मानी नहीं है
और यह बात सालती रही है
मनुष्य जाति को युगों से,
धर्म, दर्शन, विज्ञान, बोली, भाषा,
कविता, त्योहार, बाज़ार, भोग,
ये सब जीवन को तर्कसंगत मानी देने की कोशिशों का ही परिणाम हैं
इतना सब होने के बाद भी
यह नहीं कहा जा सकता
कि जीवन को परिभाषित कर देना
पहले से आसान हो गया है।

और लगभग तभी से
प्रयास जारी है यह जानने के लिये भी
कि मनुष्य की ब्रह्माण्ड में स्थिति क्या है,
उपनिषद में कहा गया है
'तत्त्वमसि'
अर्थात 'तुम' 'वह' हो
और इसकी व्याख्यायें भी अनेक की गयी हैं :
आत्म ब्रह्म है, ब्रह्म आत्म है;
आत्म को जान लेना ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेना है;
आत्म ब्रह्म की एक इकाई मात्र है;
आत्म ब्रह्म की एक अवस्था है;
इत्यादि,
पर उससे पहले यह जानना पड़ेगा
कि 'तत्' क्या है, 'त्वम' क्या है;
'अस्ति' के मायने क्या हैं?
physical presence या consciousness?

गौतम बुद्ध सिखाते थे स्वयं को त्याग देना
मतलब आत्म की उपस्थिति ही
सांसारिक दुखों का कारण है
इस तरह से
बुद्ध मानते थे
कि 'तत्' को 'त्वम' से जोड़ देने में
उस 'आत्म' के जीवन में
दुखों का प्रवेश हो जायेगा,
'तत्' के समक्ष 'मम' की उपस्थिति कैसी है
इस बात पर अभी विवाद है।


जितना लड़ना है इसलिये
कि कोई कारण लड़ने योग्य है
उतना तो लड़ना है ही
उससे थोड़ा ज़्यादा इसलिये लड़ना है
कि अहम् की संतुष्टि हो।

जितना जूझना है
ताकि जूझने से मुक्ति मिल जाये
उतना तो जूझना है ही
थोड़ा उसके बाद भी जूझना है
जूझने में मज़ा आ गया है।

जितना उतरना है नदी में
ख़ुद को भिगोने के लिये
उतना तो उतरना है ही
थोड़ा उसके बाद भी उतरना होगा
गहराई का अंत जानने के लिये।

जितना देखा गया है
और सहेज लिया गया है
उतना तो चित्र बनाना है ही
जो अभी अदृश्य है
उसकी भी रचना करनी होगी
ताकि भविष्य उसमें से
अपनी राह खोज सके।

जितना ख़ुद से दूर जाया जा सकता है
उतना चले जाने के बाद भी
ख़ुद से और दूर जाने की
सम्भावना बनी रहेगी,
और दूर कोनों में बैठे हैं
मेरे अलग-अलग रूप,
जो खींचते हैं जीवन को अलग-अलग दिशाओं में
पूरा जीवन जीने के बाद भी
इनमें से किसी रूप के अनुसार
जीवन जीना बचा रहेगा।


1.
समुद्री लहर का एक टुकड़ा
तट से कुछ दूर नाचता था
एक ऐसी धुन में
जिसे तट पर अकेले बैठकर ही सुना जा सकता था
और गिरता उठता था अपनी ही जगह पर,

सूरज की एक किरण
कई क्षण पहले चली थी अपने स्रोत से
और अपना ध्येय निश्चित कर लिया था,
अंतरिक्ष के किसी कोने से चलकर
उसे मिलना है किसी से,

एक क्षण भर के लिये बस
वो लहर और किरण मिले थे
और चमक उठा था
स्पेस और टाइम का वह कोना
अगले क्षण सब कुछ था
लेकिन ऐसा बहुत कुछ था
जो कि नहीं था।


2.
गरम लाल सूरज
डूबता है समुद्र में
और करता है संघर्ष जाने के पहले
लेकिन गहरी उच्छ्वास छोड़कर बुझ जाता है,

संघर्ष के अवशेष में बची हैं चिंगारियाँ,
कुछ चिंगारियाँ तारों के रूप में
आसमान में टँगी हैं
और कुछ चिंगारियाँ तैरती हैं समुद्र में
मछुआरों के लैम्प में।


हड्डियों का ढाँचा मात्र रह गया एक मनुष्य
ढोता है अपनी पीठ पर
अपने से कई गुना ज़्यादा बड़ी एक घण्टी
जिसमें समय आता है
तो होती है कोई ध्वनि
और वह मनुष्य
घण्टी को ढोने का कारण जान लेता है।

समय को ढोते रहना है
समय के साथ क़दम-ताल नहीं मिलाना है
समय हमारी हड्डियाँ तोड़ देगा
लेकिन हम समय को
अपने ऊपर लदा हुआ देख भी नहीं पायेंगे।

तारीखें बदलती हैं
कैलेंडर बदलते हैं
सदियाँ बदलती हैं
निज़ाम बदलते हैं
हम भी बदल जाते हैं
लेकिन समय की पकड़ ढीली नहीं होती है।

समय के भार से
हम सीधे खड़े नहीं हो सकते हैं
और देख नहीं सकते हैं रास्ता
चलते रहना है बस चलने के लिये
रुक गये
तो समय का भार और भी बढ़ने लगेगा।

समय है यहाँ
और समय यहाँ हमेशा रहेगा
समय की नज़रों में
हम आवारा हैं,
समय फिर से चाबी भार देगा
और हम दौड़ने लगेंगे।


1.
आज कसीनी ने अंतिम सिग्नल दिये हैं
और फिर विलीन हो गया है
शनि ग्रह के वातावरण में
पर उससे पहले दे गया है
पृथ्वी ग्रह की एक दुर्लभ तस्वीर
काले पर्दे में तैरता एक नीला गोला
जिसके आसपास कोई नहीं है
इतना अकेला है,
निपट अकेला,
और इसी छोटे से गोले पर
हम अपने बड़े होने के भ्रम में
आसमान सर पर उठा लेते हैं।

2.
कॉस्मोस के किसी एपिसोड में
देखा था कि कार्ल सेगन
वॉयजर वन से ली गई
धरती की फ़ोटो पर मुग्ध हो गये थे
क्या विज्ञान के लिये भी पागलपन
किसी में हो सकता है?
बाक़ी पागलपन से तो अच्छा ही होगा।
या पागलपन कोई भी अच्छा नहीं होता?

3.
सदियों से
पृथ्विवासियों ने आकाश में चमकती वस्तुओं को
मानकर रखा है
कि वो धरती पर हो रही घटनाओं का
वहीं से नियंत्रण करती हैं
क्या पता सुदूर, किसी और ग्रह पर
धरती के उपग्रह छोड़ने पर
कुछ और मानी निकलते हों।

(16 Sept 2017)


यक्ष ऊवाच -
धर्मराज!
इन पक्षियों को देखो
इनको देखकर
समझा नहीं जा सकता है
कि इनका अस्तित्व में होना
होना है या हो जाना है
पक्षियों ने भी कोई इशारा नहीं किया है
कि कुछ जाना जा सके;
प्रकृति की आकृतियों को देखो
तो कभी लगता है
कि वे हैं
फिर कभी लगता है
कि नहीं, वे हो गयी हैं,
जहाँ आदमी से कोई कहे
कि जो हो वो रहो
लेकिन आदमी क्या है
क्या आदमी यह जानता है?
होने और हो जाने की परिभाषा क्या है?
दोनों में से महत्वपूर्ण किसे कहा जा सकता है?

युधिष्ठिर ऊवाच -
चलायमान संसार में
स्वयं का सम्पूर्ण ज्ञान हो जाना ही होना है
जहाँ अपने साथ संघर्ष नहीं होता है
और अपनी राह पर निश्चिन्त चलते रहना होता है,
और हो जाना है वह
जहाँ आदमी एक स्वयं से निकलकर
दूसरा स्वयं अपना लेता है
और छिपा देता है भूतकाल को वर्तमान में
और फिर से पा लेता है उत्साह जीने का;
पूर्ण रूप से इनमें से कोई भी अपना लेना
सत्य प्राप्त कर लेने जैसा है
और शायद दोनों राहें
कभी अदृश्य स्थान पर मिलें
और एक हो जायें
और मिटा दें होने और हो जाने के अंतर को,
तब तक दोनों में महत्वपूर्ण कौन है
यह ठीक से कहा नहीं जा सकता है।


यक्ष ऊवाच -
धर्मराज!
ये तालाब के किनारे खड़े वृक्षों को देखो
बीज से जन्म लेकर
फलदार बड़े पेड़ बनने तक के पूरे समय को देखो
और एक दिन ये वृक्ष भी सूख जायेंगे,
और ये मछलियाँ
क्षणिक जीवन में कूदते हुये
कुछ समय बाद अदृश्य हो जायेंगी,
ये तालाब का पानी आज यहाँ है
कल कहीं और, किसी और रूप में होगा,
तब इन सबके जीवन की
कभी व्याख्या होगी
और ये पूछा जायेगा
कि इन वृक्षों ने, इन मछलियों ने, इस पानी ने
जीवन भर जो किया
क्या उसको जीवन जी लेना माना जा सकता है?


युधिष्ठिर ऊवाच -
श्रीमान!
जीवन कम से कम दो कहे जा सकते हैं
(वैसे परिभाषायें कितनी भी गढ़ी जा सकती हैं)
एक वो जो जिया गया है
और एक वो जो जिया सकता है,
जो जिया जा सकता है
जब वो जी लिया जाता है
तो वह पुराना हो जाता है
लेकिन उसके बाद भी
बहुत कुछ जी सकना बचा रहेगा,
दोनों ही जीवन हमारे किये गये कार्यों से अलग
सम्भावनाओं के रूप में
सदैव अस्तित्व में रहेंगे,
अतः
जीवन जीने में
या जीवन जी सकने में
जीवन जी लेना कौन सा है
यह जाना ही नहीं जा सकता है।


मैं सुबह जब घर से निकलता हूँ
तो मैं बहुत बड़ा दार्शनिक होता हूँ,
मेरे पास
संसार की हर एक समस्या के लिये
अचूक नुस्ख़े होते हैं,
मैं मानता हूँ
कि दुनिया मेरी है
और मेरे लिये ही बनी है,
मैं ये भी मानता हूँ
कि दर्शनशास्त्रियों की थ्योरीज़ में है कोई ताक़त
और इनमें से ही कोई थ्योरी
संसार में यूटोपिया लाने का माद्दा रखती है
जिसके लिये तर्क किया जाना ज़रूरी है,
यह मंशा होती है
कि सत्य निकालकर लाया जाये
और उजाले के लिये खड़ा किया जाये
ताकि मिटाई न जा सके सभ्यता की प्रगति
और खोई न जा सके
उपलब्धियाँ मनुष्य प्रजाति की,
मैं यह जानता हूँ
कि भविष्य की राह पर चला जा सकता है
और पाया जा सकता है मोक्ष
जिस रूप में मैंने उसे देखा है,
उठा सकता हूँ
संसार का भार अपने तर्कों पर
और देख सकता हूँ संसार के पार,
देखो, मैं सुबह बहुत आशावादी होता हूँ।

शाम को जब घर लौटता हूँ
तब दर्शन सारा भूल चुका होता हूँ
और यथार्थवादी होता हूँ
(वो भी शायद अपने आप में एक तरह का दर्शन है)
दुनिया देखने के लिये सभी थ्योरीज़ के चश्मे हटाने ज़रूरी हैं
(शेक्सपीयर ने कहा था
कि स्वर्ग और पृथ्वी पर उतने से ज़्यादा चीज़ें हैं
जितने की कल्पना अभी तुम्हारे दर्शनों में की गयी हैं)
और दुनिया जैसी है
उसको वैसी ही देखने का प्रयास करता हूँ
और दुनिया कैसी है
ये जानने का प्रयास अपने अनुभव से ही कीजिये।


कहीं एक सूखा पत्ता था
मैंने उसका शाखा से मिलन कराकर छोड़ दिया।
कहीं बर्फ का पिघला पानी जमा हो गया था
मैंने पत्थर से रास्ता खोदकर उसे नदी से जोड़ दिया।

कहीं एक चिंगारी ख़त्म होने की कगार पर थी
मैंने ईंधन देकर उसे भड़का दिया।
कहीं वेदना से व्याकुल एक टहनी टूटने वाली थी
मैंने उसकी आँखों में देखकर उसे हड़का दिया।

कहीं चाँद, तारों और ब्रह्माण्ड की बातें हो रही थीं
मैंने कहा था मैं खाका खींच लूँगा।
कहीं किसी किताब के आखिरी पन्ने पर असहाय खड़ा मिलूँगा
मैं जानता हूँ कि मुट्ठियाँ भींच लूँगा।

कहीं एक लहर थी जो पत्थर चूर करने के प्रयास में थी
मैंने उसके समर्पण को देखा, और कहा, खूब।
कहीं एक आँधी चल रही थी जिसमें बड़े वृक्ष उखड़ रहे थे
उसने मुझसे अपना जवाब माँगा, मैंने कहा, दूब।

कहीं एक बारिश थी जिसमें पनपते थे नये-नये बुलबुले
मैंने रात में बल्ब की रौशनी को उसमें घोल दिया।
कहीं हवा थी ठण्ड से ठिठुरी हुयी घर के बाहर खड़ी
मैंने आमंत्रण दिया और खिड़कियों को खोल दिया।

कहीं एक साँझ थी जो दिन से बिछड़कर थी परेशान
मैंने उसे रात से बचाकर चित्र में क़ैद कर दिया।
कहीं एक सवेरा बैठा था नींद खुलने से सुस्त था
मैंने उसे पूरब की ओर लुढ़काकर रौशनी से लैस कर दिया।

कहीं समय था जो इतिहास को बदलने का निश्चय कर चुका था
मैं उससे मुखातिब हुआ और पूँछा - क्या यहीं?
कहीं एक मोटी पोथी थी जो इतिहास की धारा में बही थी
मैंने उसे पढ़ा और जवाब पाया - क्यों नहीं?

कहीं एक शब्द था अपने अर्थ से बिछड़ा हुआ
मैंने उसे परिप्रेक्ष्य देकर उसका संघर्ष कर दिया व्यर्थ।
कहीं एक छन्द था अपने रूपक से अलग-थलग
मैंने उसे एक और मानी देकर कर दिया और भी असमर्थ।

कहीं दर्द की दरिया मिली कराहते हुये धीरे चलती हुयी
मैंने शब्दों का बाँध बना दिया और कहा रुको।
कहीं हवा में झूमती एक प्रतिभावान शाखा मिली
मैंने जिम्मेदारी का बोझ उस पर लादते हुए कहा झुको।

मैं नया कवि हूँ, कुछ कहने के प्रयास में हूँ
मुझे जो मिला, मैंने जो देखा, मैंने उन्हें शब्दों में बुना।
दुनिया जैसी हमने देखी है, हम सभी जानते हैं
मैंने एक नयी दुनिया गढ़ने के लिये शब्दों को चुना।

(अज्ञेय की कविता ‘नया कवि : आत्म-स्वीकार’ को समर्पित।)


एक रेगिस्तान है
मेरी आँखों के आगे फैला हुआ
जहाँ रेत ही रेत दिखती है हर तरफ
और दूरियाँ तय होती नज़र नहीं आ रही हैं
परिवर्तन की अनुपस्थिति के कारण
मीलों फैली रेत जिसपर चलता चला जाता हूँ
एकरसता में रस खोजने,
जहाँ रेतीली आँधियाँ चलती हैं
और कुछ देर के लिये एकरसता से
ध्यान भंग कर देती हैं
ऐसा ही एक रेगिस्तान
मेरे मन के अंदर भी है
जहाँ से कोई रास्ता सुलझता नहीं है
और जो दिखता है
वह बहुत दूर एक जैसा ही दिखता चला जाता है
और इस रेगिस्तान से ध्यान हटाने के लिये
मैं रेतीली आँधियाँ खोजता रहता हूँ।

एक पहाड़ है
जिसकी ढलान पर उगे हैं
पतली पत्तियों वाले पेड़
जो खड़े हैं इतनी उंचाई पर
डर को ठेंगा दिखाते हुये
उस पहाड़ के शिखर से
पत्थर गिरते रहते हैं
आम बात है
कभी-कभी ये पेड़
उन पत्थरों को गिरने से रोक लिया करते हैं
मैं दोनों ही पात्र अदा करता हूँ
कभी पत्थरों की तरह गिरता हूँ
(लाक्षणिक रूप से)
कभी पेड़ों की तरह खुद को संभाल लेता हूँ।

एक सड़क है
जो कुछ जगहों पर उबड़-खाबड़ है
लेकिन ज्यादातर जगह सही है
जिसके दोनों तरफ हैं हरे-भरे खेत
आदमी की ऊँचाई से ऊपर तक गन्ने के पौधे,
हरियाली आकर्षक है
लेकिन सड़क को अभी चलना होगा
मंजिल की तरफ
या उससे भी आगे
खेतों की पैदावार सड़क को नहीं मिल सकती
और वैसे ही जीवन है
जहाँ हरियाली का लालच है दोनों तरफ
और पहुँच में भी दिखता है
लेकिन जीवन को
अभी दूर-बहुत दूर जाना है
उबड़-खाबड़ रास्तों पर
अभी और चलना होगा।

एक नदी है
जो आस्था की घाटी से बहते हुये
अथाह सागर की चौखट पर खड़ी हो जायेगी
हिम्मत के साथ
जिसका सानी कोई नहीं होगा,
जिस नदी में किसी पुल के पास
या किसी प्रसिद्ध घाट के किनारे
डूबे हैं श्रद्धा के अंतहीन सिक्के तलहटी में,
जब जन्मी थी हिमालय की गोद में
तब बहुत सम्भावनायें थीं
अब एक लकीर पर
पानी को चलते चले जाना है
एक राह चुनने की अब उतनी सम्भावनायें नहीं हैं
नदी की यही गति है।

एक खेत है
जिसमें धान कुछ दिन पहले रोपा गया है
जिसको सींचने के लिये
नहर से पानी लगाना पड़ता है,
और जाना पड़ता है रात में
टॉर्च लेकर जंगल की तरफ
बांधने के लिए नयी मेड़
जो रखेगी पानी रोककर,
और अगले दिन जोरदार बारिश होती है
मेड़ बह जाती है
एक चौथाई खेत के साथ,
ये भविष्य की चुनौतियाँ
मौसम की मार, तेज फुहार
खेत के कहे में नहीं हैं
खेत चाहे तो बस तैय्यार रह सकता है
मेड़ें मजबूत की जा सकती हैं शायद।

एक रात है
रात अँधेरी है
अंधेरेपन की गूँज हर एक दिशा में व्याप्त है
प्रतिध्वनि में भी अंधेरापन ही सुनाई पड़ता है
ऊपर काले-काले बादलों के धब्बे
चाँद के सामने तैरते रहते हैं
और बादल ऊपर से ही देख लेते होंगे
टूटते हुये तारे
जिसको अपनी नासमझी में
दे देते होंगे कोई नयी कहानी,
अँधेरी सड़क से
हवा उड़ाती है सूखे पत्तों को
और जब पत्तों की आवाज़ रूकती है
तो रात का सूनापन बहुत बढ़ जाता है
दूर क्षितिज में
कहीं कड़कती है बिजली
प्रकाश की एक तलवार
समा जाती है धरती के सीने में
रात की तन्द्रा टूटती है
रात जूझती रहती है
लेकिन रात नींद का त्याग नहीं कर सकती।

एक मंदिर है
पहाड़ की चोटी पर बैठा हुआ
निर्जन है
जहाँ लोग मंदिर देखने नहीं
मंदिर की छत से दुनिया देखने आते हैं,
मंदिर उम्र के उस पड़ाव में है
जहाँ सिर्फ इतिहास पर गर्व किया जा सकता है
(इतिहास गौरवशाली रहा है)
लेकिन वर्तमान में यह प्रांगण
कुछ पुरानी दीवारों का
बस एक समूह बनकर रह गया है
जिसमें बसती हैं वीरानियाँ
और बरामदों में रात के अँधेरे में गूँजती हैं
कहानियाँ एक भव्य इतिहास की,
मंदिर से कुछ दूर एक बस्ती है
जहाँ बन आये हैं छोटे-छोटे नये मंदिर कई
लोगों का आना-जाना लगा रहता है जहाँ
बूढ़ा मंदिर अचरज से भरा नहीं है
हर एक मंदिर को इस दौर से गुजरना ही है।

एक पेड़ है
जिसकी जड़ें गड़ी हैं गहरे तक
और नतीजतन
वह खड़ा है संतुलित नयी धरती पर
कभी मैं उस पेड़ के पास पहुँच जाता
तो पेड़ बड़ा खुश हो जाता
और सुनाता मुझे किस्से
पिछले ज़माने में आयी आँधियों के
जिनसे समाज को मिलते थे रूप
और इतिहास को पन्ने
बूढ़ा पेड़ मुझसे बताता है
उन आँधियों के बारे में भी
जो पेड़ों से टकराकर टूट गयीं
और बड़ी नहीं हो पायीं
एक सम्भावना बनकर बस रह गयीं,
मैं उस पेड़ की जड़ में पानी डाल आता हूँ
और मना आता हूँ कि वो हवा दे और अँधियों को,
और यात्रा है
तो दोबारा तो मिलना होगा ही।

एक समुद्रतट है
जहाँ ईर्ष्या से लहरें
कदमों के निशां मिटा देती हैं
और झगड़ती हैं एक दूसरे से,
बहुत दूर सागर की गहराइयों में
जहाँ प्रकाश पहुँचता नहीं है
वहाँ भी यात्रा के नये कारण खोज लिये गये हैं,
रेत के किनारे दूर कहीं
लहरों को लील लेने के लिये प्रयासरत हैं,
दूर कहीं एक द्वीप
सागर से बाहर निकला है
और डूबते सूरज की रौशनी में चमकता है,
रात में चाँद देखता है ऊपर से
समुद्र में मछुआरों के लैंप
किसी नयी दुनिया में
तारों से नज़र आते हैं,
मुझे एक दिन बैठना है समुद्र के किनारे
दिन से रात और रात से दिन कर देना है।

लेकिन समय एक नहीं है
समय दो हैं
पहले समय में
हम समय को धीमा करके
दूसरा समय देखते हैं
और सापेक्षता के सिद्धान्त के तहत
हमें दूसरा समय बहुत तेज भागता हुआ लगता है
समय हमसे बहुत दूर भागता है
हमारा समय पिछड़ता रहता है
एक दिन हाँफते हुये
पराजय स्वीकार कर लेता है
वह समय अब चलता नहीं है,
समय नहीं चलेगा अब
बस हमारा चलना बाकी रह गया है।

यात्रायें कभी समाप्त नहीं होती हैं
यात्राओं के बस रूप बदलते रहते हैं
यात्रायें बस देश और काल की नहीं होती हैं
रोज़मर्रा की जिंदगी भी एक यात्रा है
जिसमें श्रद्धा से
लगाना होता है गले से एक गंतव्य
और सच्चे यात्री की तरह
भटकने मात्र से घर बैठना शुरू नहीं कर दिया जाता,
सच्चे यात्री
गंतव्य पूँछकर यात्रा शुरू नहीं करते हैं
राह और मंज़िल में भेदभाव नहीं करते हैं
ये देखने नहीं जाते
जो कि देखा जा चुका है
और लेखों में आ गया है
बल्कि वह जो अभी तक आकार ही नहीं ले पाया है।


दीवारें तोड़नी हैं
इससे पहले कि वह दीवार खड़ी हो जाये
मुझे उठना है
और दीवार से टकराकर
लहूलुहान हो जाना है।

मेरे सामने भागती है एक भीड़
सबने अपने कन्धों पर लाद रखे हैं
लकड़ियों के लट्ठे
जो हैं भुजायें किसी युवा जंगल की
इससे पहले कि यह लकड़ियाँ
गाड़ दी जायें
बना दी जायें चहारदीवारी
और रोक लें मुझको
मुझे पहुँचना है
और रोकना है उस भीड़ को।

एक कांटेदार पेड़ की कुछ शाखायें
काट कर रख दी गयी हैं धूप में
कल पत्तियाँ सूख कर गिर जायेंगी
तब इस डाल को रख दिया जायेगा किसी मेड़ पर
और बाँट दी जायेगी जबरदस्ती ज़मीन फिर से
जलाना चाहता हूँ
उस डाल को किसी चूल्हे में
जहाँ से सिर्फ धुँआ निकले
कोई दीवार न निकले।

नदी के सीने को खोदकर
एक ट्रक निकला है
ढोता है बालू
जो बनवाती हैं दीवारें,
जाओ, जाओ,
बादलों से कहो कि बरस पड़ें
और बहा दे पूरा बालू,
हवाओं से कहो कि चल पड़ें
और सब छितरा दें,
और रास्तों से कहो कि वे उलझ जायें
और घूमता रहे उन्हीं में वो ट्रक
इससे पहले कि वो ट्रक अपनी मंज़िल तक पहुँच जाये
उसे रोकना है।


1.
मैं उस शरीर में बँधी हूँ
जिसके कदमों को चूमती है चाँदनी रेत
और बालों को छूकर निकलती है घाटी की हवा,
जिसके एक तरफ बहती है नदी
और दूसरी तरफ चढ़ता है आसमां,
एक वृत्त में दौड़ता हुआ वह शरीर
और हाँफता हुआ
अपने चारों तरफ़
अपनी सी दुनिया ढूँढ़ता हुआ,
ब्रह्म में भटकी हुयी
मैं उस शरीर की अल्पकालिक यात्री हूँ।

2.
मेरी खोज में न राहें मेरा कहना मानती हैं
और न ही मानता है ये सफर
मेरे उद्देश्य में
न ही कोई नीरसता है
और न ही कोई नीरवता है
हाँ, थोड़ी विवशता है
मेरी राह में
अब न जीतें हैं
अब न हारें हैं
वैसे तो मैं आत्मा हूँ
और तथाकथित रूप से बहुत महत्व की हूँ
लेकिन समय में मैं एक बहुत महत्वहीन अनुचर हूँ।

3.
और फिर एक दिन
शरीरों की इस यात्रा में
करोड़ों वर्षों के बाद
दिन ज्यादा उजले होंगे
रातें कम अंधियारी होती जायेंगी
और तब तक मैं रह गयी
रचयिता की कृति में उलझकर
तब आसमान झुलसता हुआ
मुझसे मेरी जिंदगी माँगने आ खड़ा होगा
तब मैं भागती फिरूँगी
एक नयी खोज पर चर्चा करने के लिये
मगर कहूँगी किससे
कि सूरज धरती को लील गया है।


समन्दर से खींचकर
किनारे पर लगा दी गयी नाव को
जैसे जीवन से उठाकर
मृत्यु के दर्शन दे दिये गये हैं,
लकड़ी के पटरे
जिन्हें लहरों की गति नापने की आज़ादी थी
आज रेत की शय्या पर बैठकर दिन जाया करते हैं
और समय ने कई बार देखा है
कि एक-एक करके ये लकड़ियाँ
गायब होती चली जाती हैं,
धूल की परतें
नाव का जीवन धूमिल कर देंगी
कभी-कभी कुछ लहरें नाव तक पहुँच जाती हैं
और ऐसी आवाज़ होती है
जिसे बड़ी तड़प में ही शायद सुना गया है
जीवन का एक टुकड़ा मिलते ही
नाव बिलख उठती है
जिसके आँसुओं को समीर बिखरा ले जाती है।

पर क्यों,
नाव को समन्दर में ही क्यों जाना है,
और कोई तरीका नहीं निकाल सकती क्या ये नाव
समय में विलीन होने का?
जलाने के लिये लकड़ियाँ,
बच्चों के लुकाछिपी खेलने का स्थान,
यात्रियों के लिये चित्र लेने का स्थान
जिसके पार्श्व में सूर्यास्त सावधानी से लगाया गया हो,
कितने सारे कार्य हैं
जिनमें नाव उद्देश्य पा सकती है,
लेकिन खोज पाती नहीं हैं।

और यह मात्र देखकर जाना नहीं जा सकता
कि ये नाव
समन्दर में जाने की आदी क्यों हैं।


मुझे बूँदों का संगीत सुनना था

एक बेहद बेसुरा संगीत
जिसमें फड़फड़ाती हैं भुजायें बूँदों की
धरती की सतह पर
चोट कर आवाज़ निकालने से पहले
और भागती हैं
हवा की क़ैद से
जैसे हवा स्वयं भागती है बांसुरी की क़ैद से।

सुनना था वह संगीत
जिसे बूँदें बादलों से उठाकर
लहरों को सौंप देती हैं
जिसे समुद्र की गहराई में
सुरक्षित रखा जा सके
जिसे लहरें किनारे पर ला पटकती हैं,
जिसे सुनाया ही न गया हो
क्या उसे भी संगीत कहा जा सकता है?
दो खूँटियों से बंधे तांबे के तारों से
कहीं कम संगीत तो नहीं जमा है इन बूँदों में?

छप्पर से टपकती हुयी बूँदों का
दोहराव से रहित
बने नियमों से अलग
गिरना निरंतर जारी है
जैसे उँगलियाँ बरसती है पर सारंगी पर
और खो बैठती हैं सुरों की सारी समझ
मैं अगर बूँदों का संगीत समझने के काबिल भी होता
तो भी क्या मैं समझ पाता?


छज्जों की कई परतों से,
जो कि एक दूसरे से कई फीट की दूरी पर हैं,
गिरती हैं बूँदें
और खिड़की से निहारती हैं
एक कृत्रिम संसार
और सूँघती हैं उदास करने वाला उच्छ्वास
इन बातों के मशविरे
बादलों की दुनिया में कहीं नहीं हैं।

कारखानों की काली धूल से दबी पत्तियाँ हैं
जहाँ बूँदें आश्रय लेती हैं
कुछ देर के विश्राम के लिये,
कालिख से सन जाती हैं बूँदें
दम घुटता है
धरती पर गिरती हैं
बूँदों का टप-टप बढ़ चला है
या बैठा पेड़ वहाँ बड़बड़ाता है।

पहली बार में एक बूँद गिरी थी
धरती प्यासी थी
बूँद को खुले हाथों ले लिया था धरती ने
हमें वह बूँद खोजनी है
ट्यूब वेल लगाओ, कुँए खोदो
नहीं, हिम्मत नहीं हारनी है
आखिरी बूँद तक उलच देंगे
पहली बूँद खोजते-खोजते।

पसरी थी लम्बी क़तार कारों की सड़क पर
मंज़िल तक पहुँचने के लिये बेताब
कुछ बूँदें गिरती हैं
अफरा तफरी मच जाती है
लोगों के कवच बाहर निकल आते हैं
बाकी भागते हैं शरण के लिये
जैसे दूसरे ग्रह के वासी उतर रहे हैं धरती पर;
बूँदों, तुम्हारा स्वागत हर जगह नहीं होगा।


उच्छ्वास - Exhalation.


वो लौ बहुत धुँआ छोड़ती है
और शीशे पर पुती कालिख के कारण
पूरी तरह बाहर दिख भी नहीं पाती है
अहाते में एक खूँटी पर टँगी है लालटेन
तेज हवा चल रही है
संघर्षरत लौ भभकती है
लौ के दोनों किनारे
आसमान छूने को लपकते हैं।

बौराया हुआ एक कुत्ता
टीन की छत के नीचे आकर बैठ गया है
भौंकता है न जाने किस पर
लौ की अनिरंतरता पर
या हवा की साँय साँय पर
या भौंकने के सिवा कुछ कर नहीं सकता
तो अब बस भौंकता ही रहता है।

अँधेरे की इस यात्रा में
लौ के साथी चाँद-तारे आज नहीं आयेंगे
ये हवा से कहला भेजा है
सलाह भी दी है
कि लड़ते रहना
लड़ाई का कारण पता चलने तक
अगली लड़ाई में
इस लड़ाई में तुम्हारे योगदान के लिये
तुम्हारे ऊपर कवितायें लिखी जायेंगी।

ठिठुरती हुयी लौ
बढ़ती रही रात के पथ पर
जूझती रही स्वयं से
लड़ाई के औचित्य के सवालों पर
मंदिर के दीये की तरह
लालटेन की लौ की उपासना क्यों नहीं होती?


बालकनी का एक कोना है
जिसमें गिरते हैं अमलतास के फूल
और हवा से इकट्ठे हो जाते हैं
दूसरे कोने में,
खिड़की के कोने से
एक नयी इमारत दिखती है
जिसके कोने में मशीनें लगी हैं
हड़बड़ी में
चार कोनों से स्थान को घेर लेने में;

बादलों का एक कोना
उमड़ते-घुमड़ते हुये
अचानक ठिठकता है
पीछे मुड़कर देखता है
सड़क के कोने में
एक वर्ग मीटर के चटाई पर बैठी
गुटखा बेंचती हुई एक महिला को
और बरसता नहीं है;

समुद्र तट का एक कोना
जिसमें सीपियाँ भर-भर कर पड़ी हैं
हाँ, तुम कहोगे तो तुम्हारे लिये कुछ रंग-बिरंगी ले आऊंगा
जिन्हें तुम सजाकर रख देना
ड्राइंग-रूम के किसी कोने में;

एक सफ़र है
जिसके कोने में दो शख्स चलते हैं
लेकिन बीच में मिलने तक
वो कुछ और हो चुके होते हैं
एक दूसरे से बचने के लिये कोना खोजते हैं,
सफ़र कहीं कोनों में खोकर समाप्त हो जाता है;

नींद के कोने में
एक सपना उगना अभी शुरू हुआ है
सपने के कोने में
तुम्हारी आवाज़ धीरे-धीरे तेज होती जाती है
मैं सहसा जाग पड़ता हूँ
आँख के कोने से देखता हूँ
नहीं, ऐसा तो कुछ दिखता नहीं है
अँधेरे के कोनों में;

मैं सभी कोनों को
किसी कोने में छिपा नहीं सकता हूँ
मन के कोने से बस देख सकता हूँ
जीवन के किसी कोने में पहुँचकर
सभी कोनों को
ब्रह्म के किसी कोने में सौंप देना होगा।


मैंने कहीं पढ़ा था
कि किसी कविता को पढ़ते हुये
विचारों की एक ही श्रंखला से
दो व्यक्तियों का गुजरना
और भावनाओं की लहरों में
अपने समझबूझ की नाव पर बैठकर
एक ही तरह से हिचकोले खाना,
किसी आत्मीय को
शब्दों के माध्यम से ढूँढ़ लेने जैसा है
और मैंने सोचा था
कि शब्दों का यह जोड़
जिसके मतलब अनगिनत, अनिर्धारित होते हैं
उसमें किसी एक ही कल्पना के
दो मन में एक साथ आ जाने की सम्भावना
न के बराबर होती है,
उस स्थिति में
हमें एक कविता की कुछ पंक्तियों के
मानी मिले हैं एक जैसे,
असंख्य किताबों की असंख्य कविताओं में
एक वो कविता है
जो कहीं दूर से
धीरे-धीरे
हमारी आत्माओं में घुलने लगी है।


तुमने कह दिया है
और यह बड़ी बात है।
जिस दौर में
सांसें चलती रहें
बस यही जीवन का पर्याय हो जाये
जहाँ हम अपने आसपास की मुश्किलों को देखकर
आंखें मूँद लें
और मान लें
कि कुछ बदलाव लाना हमारी जिम्मेदारी से बाहर है
जहाँ शोषण के खिलाफ
कुछ भी बोलना बस खानापूरी रह जाये
जहाँ कोई कुछ सोचता न हो
और मान लेता हो
कि अच्छा दौर उसके बिना कुछ किये
आखिरकार आ ही जायेगा
जिस दौर में कोई अन्याय के विरुद्ध लड़ता न हो
किसी की जिंदगी प्रभावित न होती हो
जिस दौर में अख़बारों की सुर्खियाँ
आवारा भीड़ के कारनामों से भरी रहती हैं
लेकिन उन पर अपनी सहूलियत के मुताबिक़
चुप रहा जाये
जहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मायने
किसी स्वप्नलोक समाज की परिकल्पना के आगे धूमिल हो जायेंगे,
उस दौर में तुमने व्यवस्था के विरुद्ध कुछ कह दिया है,
और यह बड़ी बात है।


धरती के किसी कोने में
कृत्रिम सुंदरताओं से बहुत दूर
बादलों से रहित साफ़ आसमान की सजावट में
तारों की एक दूधिया उजली पट्टी है
जिसके आकर्षण में
आकाश में और कुछ देखना नहीं होगा,
जो क्षितिज के
एक कोने से दूसरे कोने तक सरपट चली जाती है
जिसमें दिखते हैं रंग संसार के,
तारों की आकृतियाँ
और उन आकृतियों के नाम निकालने की चुनौती,
इन्हीं तारों के काफिले से भटका
एक तारा हमारा सूरज भी है
जो आकाशगंगा के किसी और कोने से
इन्हीं अनगिनत तारों की पट्टी के
किसी कोने में मौज़ूद
अपनी पहचान के लिये तरसता होगा,
इस उजली पट्टी के चार कोनों पर
चार तारों को गाड़कर
हमारा ग्रह उसमें तस्वीर देखने की कोशिश में लगा है,
और अंतरिक्ष के ललाट की शोभा बढाती
एक आकाशगंगा है
सुंदरता की कोई भी परिकल्पना
जिसके बिना अधूरी होगी।


उजालों की दुनिया से कोसों दूर
नुकीले पहाड़ों से टँगी एक घाटी में
अँधेरी रात के पर्दे में
छोटे-छोटे, लाखों-करोड़ों हमसफ़र मौज़ूद हैं
जहाँ से प्रकाश हम तक पहुँचने में
सदियाँ लगा देता है
(कुछ उससे भी दूर हैं)
जिन्हें देखा है
परियों वाले नाट्यमंचन में
मंच के पीछे पर्दे में
कई कोनों वाली
कार्डबोर्ड की चमकती आकृतियों में,
ऐसे तारों को देखना
सच्चाई के आमने-सामने खड़े होने जैसा है,
वो विशाल तारे भी हैं
जो आसानी से
सैकड़ों ये सौर-मण्डल लील जायें,
ऐसे तारों से बनी हजारों आकाशगंगायें हैं,
जहाँ सुपरनोवा जैसी घटनायें
चलती रहती हैं कई-कई उम्र तक,
अब आकाशगंगाओं के समूह भी पहचान लिये गये हैं
इन समूहों के समूह भी विचरते रहते हैं
दूर-दूर तक परिभाषाओं को खींचते हुये,
यह विराट का चित्र है
जिसमें एक मनुष्य नाम की संरचना को
कहीं खोजा नहीं जा सकता है,
कभी-कभी
अपने अस्तित्व का सही-सही आँकलन करना
जरुरी हो जाता है
तब चकाचौंध से दूर
रात के आकाश को एकटक निहारने
किसी निर्जन जगह जाना होता है।


एक दिन हम नहीं बोलेंगे
या तो बंदूकें हमारे लिये बोला करेंगी
या बंदूकें हमारी ज़ुबान छीन चुकी होंगी।

एक दिन जब हमारे तुम्हारे मतभेद बहुत बढ़ जायेंगे
विचारधारायें जो वैसे तो सिंहासन से उतरती नहीं हैं
लेकिन हमको दूर करने उतरेंगी
और हम एक दूसरे को सुनने की जगह
अपनी बातें सुनाते रहेंगे
इसके बाद भी अगर मतभेद दूर नहीं होते हैं
तो हम बंदूकें चलाकर तुरंत मतभेद हल कर लिया करेंगे।

एक दिन विरोध के तरीके बहुत बदल जायेंगे
ये भाषण, ये लेख, ये सभायें
ये पैम्फलेट, ये गोष्ठियाँ
ये सभ्य मानवों के वार्तालाप
हमारे विरोध को जताने में नाकामयाब रहेंगी
ये मतभेदों का सम्मान जैसी बातें हवाई लगने लगेंगी
तब हम बंदूकें उठाकर अपना विरोध जता देंगे।

एक दिन बंदूकें जिंदगी बहुत आसान कर देंगी
तब जो सुनने में असहज लगता है
उसे आसानी से चुप करा दिया जायेगा
जो लोगों से अभी करा पाना मुश्किल है
तब वो भी करा लिया जायेगा
एक दिन हम सम्मेलनों की मेजों पर
बंदूकें भेज दिया करेंगे
जिनकी बंदूकें ज्यादा आधुनिक होंगी
वो अपने पक्ष में फैसले लिवा लायेंगे।

(गौरी लंकेश, पंकज मिश्र, राजदेव रंजन, कलबुर्गी, रुद्रेश,  पानसरे, लक्ष्मणानंद सरस्वती, दाभोलकर, सन्दीप कोठारी और वैचारिक मतभेद में मारे गये अन्य अनेक अनाम लोगों के नाम।)


पिछली बार जब बारिश हुई थी न,
तब घर के बाहर की सड़क पर
एक चहारदीवारी पर एक पेड़ झुक आया था,
उसकी एक शाखा की एक बड़ी लम्बी सी पत्ती
जो आसमान से गुजरे हुये किसी रॉकेट की लकीर सी लगती थी
रास्ते में कौतूहल से भरी उपस्थित थी,
जब भी घर से निकलना होता
और पेड़ के नीचे पहुँचता
वो पत्ती हमेशा मेरे माथे पर
अपने धारदार किनारे परोस देती,
और हवा में फिर दूर छिटककर जा खड़ी होती,
कोई पंछी जब उस पत्ती पर बैठकर गाया करता था
तब वह पत्ती कितनी शांति से उसे सुना करती थी,
सुबह उस पत्ती से मेरा मिलना हमेशा हुआ करता था
और तब विचार क्रम टूटता था
जैसे दूर गया हुआ एक मुसाफिर
घर की याद से बिफर गया हो।

बहुत दिनों बाद एक दिन उसी सड़क से गुजरा,
कोई वहाँ से नदारद था,
कल रात की आँधी उस पत्ती को लील गयी होगी,
मैं चारों ओर उसे खोजता हूँ,
घर से बाहर अब भी निकलता हूँ
लेकिन लगता है
जैसे मेरी सुबह हुई ही न हो,
या जैसे मैं अपनी गली आया ही न हूँ।


गरम हवा के थपेड़ों से गाँव जूझता है
एक थका हारा मनुष्य
आधी धूप - आधी छाँव में
नीम के पेड़ के नीचे सोता है
सपना आया है
कि धान के खेत का पानी
सूरज ने यकायक सोख लिया है,
होगा,
अब उठा नहीं जाता है।

प्यास से परेशान एक पंछी
बढ़ता है नदी के किनारे की तरफ
आँच से झुलसी, सिमटी-सी नदी
पालती है सूखी भैंस-बकरियों का पेट
भूख से बौखलाया हुआ
एक घड़ियाल घात लगाकर बैठा है
आने वाले पंछी के लिये
भूख-प्यास-आँच का यह खेल
यहाँ हर दिन खेला जाता है
सूरज बुझे तो शायद यहाँ
युद्धविराम की घोषणा हो।

निरखू मछलियाँ पकड़ लाया है
दिन भर तपकर
जश्न की कोई बात मिली है आज
आज दावत होगी
हाँ, थोड़ा बुखार है उसे,
नहीं, ठीक हो जायेगा
ज्यादा चिंता की बात नहीं है
हाँ, दावत तो आज है ही
और हाँ, पण्डत से पूँछना
कि बारिश का कोई जोग बन रहा है क्या।


खुली हुई किताब है
जिसके आधे पन्ने में
तुम्हारी पसंदीदा कविता का एक टुकड़ा फैला हुआ है,
मोमबत्ती धीरे-धीरे मद्धम होती हुई
बुझने की तरफ अग्रसर है,
मेज़ के कोने से मोमबत्ती की रोशनी गिरती है
और समा जाती है पूरे कमरे में,
चौंककर रात तड़प उठती है
रात को फिर से शुरू होने का मौका देते हुये
दरवाज़े खोल देता हूँ
दूर किसी मंदिर की आखिरी आरती के घण्टे बज रहे हैं,
दूर गाड़ियों की आवाज़ से पता चलता है
कि शहर अपनी ज़िन्दगी जी रहा है,
सुस्ताया हुआ सा एक लैंप
सड़क को पीली रोशनी से नहला देता है,
ऐसा लगता है
कि मौसम का एक किनारा कुछ नया हो गया है।

शायद,
सोने से पहले
रात एक बार तुमसे टकरा गयी है।


यहाँ लोगों ने मुझे बताया है
कि सामने के इस मंदिर में
देवता बारह बरस में बस एक बार आते हैं
तब मंदिर के कपाट खोले जाते हैं
और ग्रामवासी यहाँ इकठ्ठा होते हैं,
हर्षोल्लास का माहौल होता है,
उस अंतराल में यह मंदिर
बस जिज्ञासा की एक वस्तु बनकर रह जाता है।

अदीब,
क्या तुम यह बता सकते हो
कि आखिर देवता मंदिर छोड़कर क्यों गये होंगे?
या कहाँ गये होंगे?


प्रशंसा की ज्यादातर वस्तुयें
उदासी पर आधारित होती हैं
यह साहित्य, कला और संगीत के रूपों में
सहज दिख जाता है,
क्या यह कहना चाहिये
कि सुंदरता और सहानुभूति
एक दूसरे से जुड़े हुये हैं
या इसे किसी दौर-विशेष का चलन कहकर
नकार देना चाहिये,
सत्य हमेशा सुन्दर नहीं होता
सुंदरता हमेशा शिव नहीं होती
सुंदरता उदास करती है
तो सत्य हो भी जाये
शिव नहीं हो सकती।

और क्या यह कहा जा सकता है
कि सुंदरता का देवता
उदासी का भी देवता रहा होगा?


दो नदियाँ जहाँ मिलती हैं
दूर तक फैली घाटियों से आकर
सर्पीली धाराओं में बदल जाती हैं
और मिलती हैं एक दूसरे से
जैसे दो आकाशगंगायें खिंची आ रही हों
एक दूसरे की तरफ गुरुत्वाकर्षण से
लेकिन बहुत धीरे-धीरे चलते-चलते,
आकार लेती हैं संगम के आसपास कुछ ऐसे
कि जिसके आगे
सारे स्केच निरस्त हो जाते हैं
असहाय खड़ा देखता रहता हूँ कैनवास की तरफ
रंगों में सूखी हुई एक कूँची लिये हुये
जो नदी में भीग जायेगी
तभी चित्र बना पायेगी
और आवाज़ होती है कल-कल की
जैसे किसी नव-सन्यासी के हाथ में आकर
एक सारंगी धन्य हो गयी हो
और अपनी तान से मोह लेने की जिद पर अड़ गयी हो।

सामने एक मठ की जर्जर दीवारें हैं
जहाँ कुछ मठाधीशों ने बैठकर
ब्रह्माण्ड की परिकल्पना पर चिंतन किया होगा
और संगम के मानी तलाशे होंगे
जिसे बाद में
ग्रामवासियों में बाँट दिया गया होगा
मठ की दीवारें
अब नूतनता का भार उठा सकने में
अब उतना समर्थ नहीं रह गयी हैं शायद
और कहीं दूर से
जीवनदर्शन को फिर से परिभाषित करने के संकल्प
प्रतिध्वनित हो रहे होंगे,
नीचे अर्ध चंद्राकार इस गाँव में
चित्र बनाने के लिये बहुत तत्व मौजूद हैं
मैं प्रयासरत हूँ।

जिस पगडण्डी में बैठकर
आसमान को स्केचबोर्ड पर टांग कर
प्रकृति की रंगों वाली थाली से कूँची में लेकर
मैं रंग भर रहा हूँ
उसके पीछे कुछ दूर जाकर एक झील है
जिसमें सूर्यास्त के अलग-अलग रंग दिखते हैं,
एक, उस सूरज का जो चला गया है
अपने पीछे हल्की छाया छोड़कर
जिसमें उदास शांत झील का पानी
साँझ के चाँद को डुबो लेता है,
दूसरा, उस सूरज का जो अभी अस्त नहीं हुआ है
और जिसकी गर्माहट में पानी ने
तलहटी को किरणों को सौंप दिया है
झील की गहराई पुलकित होकर
सूरज को देखने किनारे पर आ खड़ी होती है,
झील को घेरे खड़े हैं
घास के कुछ छोटे-बड़े गट्ठर
जो शायद झील की प्रशंसा सुनकर
यहाँ आ गये होंगे।

नीचे एक राह है
जो नदी का पीछा करते करते चली जायेगी
संकरी होती हुये
जिस पर चलते हुये हम
इतिहास के रंगों में हम सराबोर हो जायेंगे
लेकिन हम कहीं पहुंचेंगे नहीं
राहें कहीं पहुँचती नहीं हैं
पहुँचते हम मनुष्य हैं
राहें चलती चली जाती हैं
मनुष्य के अंदर से लेकर
ब्रह्माण्ड के अनदेखे, अकल्पित कोनों तक;
और कच्ची मिटटी की बनी दीवारों से
हज़ार साल पहले के रंग
मैं अपने चित्र में रंगने के लिये ले आया हूँ
मरुस्थलीय कृत्रिम खेती की तरह नहीं
खालिस प्राकृतिक, जिजीविषा से बनाये गए रंग
जिसने अपने आपको सहेज कर रखा है
विपरीत परिस्थितियों में रहने के बाद भी।

स्पीति,
कुछ महीने पहले मैं तुमसे मिला था,
या शायद कुछ वर्ष हो गये हैं,
तबसे एक अदद चित्र के प्रयास में
कैनवास में कौन-कौन सी आड़ी-तिरछी रेखायें नहीं खींची गयी हैं
कौन-कौन से रंगों के मिश्रण नहीं आजमाये गये हैं
कौन-कौन से चित्रकार के नुस्खे नहीं पढ़े गये हैं
लेकिन मैं तुम्हारा चित्र नहीं बना सका,
और मेरे लिये यह
वास्तविकता से साक्षात्कार की बात थी,
क्योंकि अपनी रंगों की दुनिया में डूबा हुआ
मैं अपनी तरह का एक अदना चित्रकार था।


एक सड़क थी
जो दर्रे के ऊपर से गुजरती थी
एक बस वहाँ से गुजरी
तेज चलती हुई हवा का एक झोंका
उस बस में आकर बैठ गया
और वह रास्ते के हर एक शख्स से
गर्मजोशी से मिलता रहा
कुछ घण्टों की कठिन यात्रा के बाद
वह झोंका बस से उतरा
और झील के पानी पर तैरने लगा
और चिढ़ाने लगा सूरज की किरणों को,
फिर वह झोंका पहाड़ पर चढ़ गया
और वहाँ से गिराने लगा
रेत के टुकड़ों को,
वह झोंका ज़मीन पर अवतरित हुआ
नदी में बहते हुये
पत्थरों से टकराने लगा
और वह घाटी की आबो-हवा में व्याप्त हो गया
जिस से हर एक क्षण निमंत्रण सा लगने लगा था
और उसने वातावरण को एक सधे उन्माद से भर दिया
जिसे मैंने हर एक प्राण में
अक्षुण्ण पाया था।

मैं उसी सड़क से लौटा
हवा का झोंका अपने साथ रख लाया था
आज भी कभी-कभी
हवा का वह झोंका मेरे अंदर चलने लगता है
मैं पंछी बनकर उड़ने लगता हूँ
विहंगम दृश्य मेरे सामने नाचने लगते हैं
मैं अपने आप को
किसी बौद्ध मठ में लाल कालीन पर बैठा हुआ
ध्यानरत देख पाता हूँ।


मैंने शब्दों को देखा था
पहाड़ की ढलान पर छितरे हुये
पीले-बैंगनी फूलों की चादर पर
बारिश के पानी में गीले हो गये शब्दों को
मैंने धारा की ओर
ढनगते हुये देखा था
मैंने शब्दों को रोकने की कोशिश की थी
मेरा हाथ उन से सन गया था
मगर शब्द मेरे झांसे में नहीं आये,
मैंने उन्हें कविता में कुछ गूढ़ बात कह जाने के लिये
इस्तेमाल करने का वादा भी किया था,
वे लुढ़कते रहे फिर
सारे शब्द धारा के साथ,
एक लम्बे समय तक
जब तक किसी महाकाव्य के सागर में
समाहित नहीं हो गये,
उस महाकाव्य के पन्नों से
आँखों में चमक लिये वे शब्द झांकते हैं
आज अपने महिमामण्डन पर गर्व अनुभव करते हैं
और झोपडी की किसी मटमैली नोटबुक में आने से मना कर देते हैं।

मैं उन शब्दों के पास से गुजरा था
मैंने उन्हें दुलराया भी था,
मैंने उनमें ऐसा कोई रुझान नहीं देखा था।


मैं अब अस्तित्वविहीन हो गया हूँ,
मिटटी का एक टीला
जो धीरे-धीरे धंस रहा था
जहाँ से छलांग लगाकर मैं अस्तित्व में डूब सकता था
जिस पर खड़े होकर
मैंने उपस्थित होने की सारी प्रक्रियायें देखी थीं
जहाँ से भागकर
मैं अस्तित्व से बहुत दूर चला आया था;
ठोस रंगों का एक टुकड़ा
पानी में घूमने लगता है, लेकिन वह
सख्त था, घुलने से मना कर देता है
और अपनी अवस्था पर
प्रश्नचिन्ह लगाकर शांत हो जाता है;
अनुपस्थित, मान्यता से वंचित
ठोस रंगों का वह टुकड़ा
टीले की मिटटी में मिलता है
और रंग वाले उस लेप में
मध्यान्ह के सूरज के प्रकाश में
मैं अस्तित्वविहीनता की आकृति खोजता हूँ
और आह्वान करता हूँ
प्रकृति की प्रक्रियाओं का
जिन्हें कभी पूजना होगा,
और सोचता हूँ
कि विलीन होने की
एक और संभावना असफल हुई।


पहले जला था, फिर बुझा था वो।
घाटी की साँझ की हवाओं ने
उसे रोका नहीं था,
आधे चाँद ने उसे शीतलता देने की
कोई कोशिश नहीं की थी,
पहाड़ ने सोचा था
कि बढ़ती हुई लपटों को वह छिपा लेगा
ताकि कहीं से कोई सहायता न आ पाये
और नदी?
नदी सिमट गई घाटी के एक कोने में
मानो आंच से उसे भी डर लगता हो,
वह किस ध्येय के लिये जल रहा था
यह जानने की कोशिश किसी ने नहीं की
ऐसा इसलिये नहीं
कि यूँ जलना
बहुत सामान्य और बहुधा होने वाली बात थी,
इतनी तो लपटें थी भी नहीं
कि सब खुद जल जाने के डर से
बुझाने के लिये दौड़ पड़ें,
वह किसी ध्येय के लिये ही जल रहा हो
यह भी विश्वास से नहीं कहा जा सकता
हो सकता है
उसका जलना शुद्ध पागलपन का परिणाम रहा हो।

कई दिनों तक जला था वो
जब उसके मस्तिष्क से
सारा ईंधन समाप्त हो गया था,
जब उसके शरीर का हर एक टुकड़ा
प्रकृति से साक्षात्कार के लिये व्याकुल हो उठा,
तब जाकर बुझा था वो।


भोर और साँझ की दीवारों के बीच क़ैद
एक दिन को देखकर
हतप्रभ रह गया हूँ,
आठ प्रहरों से मिलने के लिये दिन
रोज़ पहाड़ लांघ कर आ जाता है
वही-वही दृश्य
वही कार्य रोज़
और दिन
समय की उन सलाखों के बीच
चहलकदमी करते हुये
कभी बूढ़ा नहीं होता,
हम सभी दर्शक
जिसे शाश्वत मानकर बैठ गए हैं
वह दिन भी कभी ऊब जायेगा
संघर्ष करेगा
समय के मापकों को
मानने से इंकार कर देगा
तब हमारी सभ्यता
निरंतरता की नींद से जाग उठेगी।

हज़ारों वर्ष पहले
ऐसी ही किसी एक कल्पना को
मनीषियों ने प्रलय का नाम दिया होगा।


प्रणयोन्माद का रंग जानते हो अदीब?
आसमान से गिरा हुआ एक रंग
जो लहरों पर फैलता है
फिर छा जाता है
आँखों से जिसे ग्रहण करते हैं हम
खो जाता है कहीं हमारे अंदर
और बेचैन होकर
ढूँढ़ने लगते हैं
एक दूसरे की आँखों में वह रंग,
या पत्तियों के हिलने से
पेड़ों से गिरते हुये रंग के छोटे-छोटे कण
जो एक क्षण में ही
प्रकृति को जिन्दा करके
सामने खड़ा कर देते हैं
जहाँ से उपमायें ढूँढ़ी जा सकें,
या यह भी पूछना चाहिये
कि कोई रंग होता भी है क्या?
नाम देने से पहले
यह जान लेना चाहये
कि नाम दिया भी जा सकता है या नहीं
जिस क्षण तर्क करने की क्षमता क्षीण हो जाती है
यह ज्ञात हो जाता है
दूसरी हर एक बात से ऊपर
एक बात पुख्ता हो गई है
जब कोई रंग नहीं दिखता है
उस समय,
रंग की परिभाषा गढ़ सकोगे क्या अदीब?

(वैसे धर्मवीर भारती जी ने प्रणयोन्माद का रंग नीला माना है।)


कभी-कभी बोलियाँ लगती हैं उसकी बोली की सरे-बाजार,
और भी दूर हो जाता है अपनी बुलन्दियों से वो कभी-कभी।

कभी-कभी राह रुक जाती है चलते-चलते,
और यूँ ही चलता चला जाता है वो कभी-कभी ।

कभी-कभी रास्ता और वो पाला बदल लेते है,
और वो रास्ता होता है, राह मुसाफिर हो जाती है कभी-कभी।

कभी-कभी हासिल-ए-जिंदगी भूल जाता है वो,
और बेचैनियों के हवाले खुद को पाता है कभी-कभी।

कभी-कभी वह सिमटकर रंगमंच हो जाता है,
और बड़े नाट्यकार लड़ने लगते हैं उसके अंदर कभी-कभी।


किसी चीड़ और देवदार के जंगल में
मनुष्यों के विकल्पों से बहुत दूर
जब अकेले बैठकर सोचते होगे
कि मैं अगर इस मनुष्य के पास जाऊँ
तो क्या हासिल होगा
और तब वहाँ पर मनुष्यों की तुलना होती होगी
कि कौन अक्ष्क्षुण रूप से
जीवन जीने की परम्परा जीवित रख सकेगा
और तर्कों के वार चलते होंगे
तुम्हारे एकान्त की शांति भंग होती होगी
फिर सोचते होगे
कि मैं उद्देश्यों का इतना बड़ा भार उठा पाउँगा भी या नहीं
मुझमें कौन सी ऐसी बात है
जो तुम्हें निश्चिन्त कर सकती है
तुम किंकर्तव्यविमूढ़,
अनिर्णित रहकर जंगल को और घना बना देते हो
जहाँ से किसी उद्देश्य को कोई मनुष्य मिलेगा भी या नहीं
कहा नहीं जा सकता।

मेरे जीवन के उद्देश्य
तुम कभी अकेले में बैठकर
मेरे बारे में बहुत सोचते होगे।


और ये कहा जायेगा फिर
कि चाँद और सूरज
जो कि उतने ही स्थायी हैं
जितना कि समय की परिकल्पना,
तो उन पर भी लोग
इतना स्नेह क्यों रखते हैं?
पर हम चाँद, सूरज और तारों को
स्थायी की तरह से देखते ही कहाँ हैं,
छवि दे देते हैं उन्हें
अपने सीमित अनुभव से उठाकर
और फिर उन छवियों से बहुत लगाव रखते हैं
और प्रकृति के इन पिंडों को
छवियों के मोहपाश में बाँधकर
हम अपनी बनाई कहानियों को
समय की यात्रा में धकेल देते हैं,
लेकिन सहस्रों साल में
इन कहानियों के मायने बदल जाते हैं।

समय के रूप अनेक हैं
समय के इस पार में और उस पार में
मायने बहुत अलग-अलग हैं।


खिड़की के किनारे बैठकर
बारिश की बूंदों को देखने को
राष्ट्रीय शौक़ घोषित कर दिया जाना चाहिये
दीवारों के बाहर
वो फूलों के बाग़ जिन्हें देखकर
मन चहक उठता था,
वो अंतरिक्ष के पर्दे पर
चाँद और बादलों की आंख-मिचौलियाँ
जिनमें देखे थे हमने
भयावह शून्य के मानचित्र आसमान में
बहुत सम्भव है
कि सदियों पहले ऐसी ही किसी बात ने
सावन की नरम मिट्टी से रूप लिया हो
कितनी किंवदंतियों को जन्म दिया हो
हाँ,
सम्भावनायें शायद सिर्फ भविष्य में ही नहीं होती
भूतकाल में भी तो
हम सम्भावनायें खोज ही लेते हैं,
स्वप्न के आनंद में
हम खोजते रहते हैं
जीवन जीने के लिये नये खिलौने,
एक वातावरण
जो सिर्फ मेरी सोच भर में था
आनंदित करता रहा था।

सोचता हूँ
कि चीजें अगर अस्थायी न होती
तो भी क्या उनसे उतना ही लगाव रहता?
तो भी क्या इतने धैर्य से उनका साथ रहता?


दरवाज़ा खुला छोड़ गया है पीछे
बरसों से फड़फड़ाता हुआ एक पंछी
पिंजरा तोड़कर निकल गया है
कहीं किसी पेड़ पर बैठकर
बहेलिये का इंतज़ार करता होगा
उड़ नहीं पायेगा वो
पिंजड़े के पंछी उड़ते नहीं हैं
फिर से किसी जाल में फंस जायेगा
मगर लौटकर नहीं आयेगा।

तुम खूब उनकी आवाज़ें निकालकर उनको बुलाओ
उनके लिये दाना डालो
वो नहीं आयेंगे
पिंजरे के पंछी सिर्फ तुम्हारे नहीं होते।


ये साँझ और लम्बी हो रही है
हवायें सब रुकी हुई हैं
बादलों ने मैदान की तरफ देखना शुरू कर दिया है
और टूटे हुये संगीत की आवाज़
नेपथ्य से सुनाई पड़ती है,
नहीं, सबको नहीं,
टूटना सबके लिये नहीं होता है;
एक मंदिर, जिसकी लकड़ी की दीवारों पर
पूँजीवाद के सिक्के लगा दिए गये हैं,
मैदान की पवित्रता पर आश्चर्यचकित हुआ;
दूर से राही आ-आकर लौट जा रहे हैं
शायद उन्हें सिद्धि प्राप्त हो गई है
पेड़ सब चुप खड़े हो गये हैं
दिन भर धूप में तपने का फल
उन्हें मिलने वाला था,
चट्टानों से तोड़कर लाये गये पत्थर
घेरकर मैदान को खड़े हो गये हैं
और समय को मैदान तक पहुँचने से रोक लिया है
अस्त होता हुआ सूरज भी धीरे हो चला है,
अभी मैदान में,
जिसके गले का पिछला भाग लाल है,
ऐसी गौरैया ने चरण बस धरे ही हैं।

अभी गौरैया का चहकना शुरू होगा
और उसकी प्रतिध्वनि में
सामने का वो पहाड़ झूम उठेगा।


घटनाओं को घटित हुआ मान लेना
साधारण बात होती है
घटनाओं को घटित होते हुये देखना
एक अलग अनुभूति होती है
उस रात
बादलों को ओढ़े हुये
घाटी की सर्द हवा में काँपते हुये तारों को
मैंने देखा था
बीच-बीच में हार मानकर
कुछ तारे टूटकर गिरते भी थे
पहाड़ों पर शामियाने की तरह अटका हुआ आसमान
उनकी बेचारगी पर बहुत हँसता था
हवायें कानाफूसी करती थी,
उस रात यह घटना घटित हुयी थी
जब चाँदनी की एक चादर ने
तारों को अपने आगोश में लेकर
उनका संघर्ष समाप्त किया था।

और यह ज्ञात हो
कि मैंने चाँद को
नुकीले पहाड़ों में फँसकर निकलते हुये
और चाँदनी को धीरे-धीरे फैलते हुये देखा था।


दोबारा नहीं मिल सकेंगे हम
वो कुछ छायाचित्र
जो तुम्हें देखकर अनायास ही बन गये थे
धूमिल हो ही जायेंगे
स्याही से लिखी गयी कुछ पंक्तियों की तरह,
कभी सोचना कि अनायास मिलना
सुंदर होता है न?
बिना किसी के उगाये
जंगल में खिल आये
कुछ जंगली फूलों की तरह
जिन्हें हम खोजते नहीं फिरते
लेकिन दिख जाये तो क्या नहीं करते,
दोबारा नहीं मिल सकेंगे हम
एक ग्लेशियर पर बर्फ के रूप में गिरकर
हमें दो अलग दिशाओं में
दो अलग धाराओं में निकलना होगा
अलग-अलग यात्राओं के लिये
बर्फ पर उकेरी आकृतियों की तरह
ये यादें अन्य यादों के आने पर दब जायेंगी
या जैसे खेत में बोई हुई यादें
कभी घटनाओं के हल चलने पर
कभी दोबारा भी आ सकती हैं
यह हम सोचेंगे
और उन यादों को झरने पर टाँग देंगे
जहाँ से उन्हें मूकदर्शक बनकर
गिरते हुये देखा जा सके
और यह चलचित्र समाप्त होने के बाद
हमें फिर से अपनी-अपनी धारा में बहना होगा।

दोबारा नहीं मिल सकेंगे हम
दोबारा मिलने के लिये
नियति के चक्र फिर से ऐसे ही घूमने होंगे
गृहों की गति, देशकाल का प्रवाह
फिर से ऐसे ही होना पड़ेगा
और हमें फिर से अज्ञात यात्रा के लिये निकलना पड़ेगा।


फिर लगा दी जाती हैं
सदियों से गैर-जाँची, गैर-परखी चली आयी
परम्पराओं की बेड़ियाँ
किन्हीं पैरों में;
वही ढेर सारे नुस्खे
जिनको अपनाकर
आदमी जीवन से सन्तुलन बनाकर रह सकता है
और समय के मंथन में मिले
एक विशेष युग को
उन्हीं बेड़ियों को सौंप देने पर ही
अस्तित्व में रहा जा सकता है,
और यही एक मुद्दे की बात थी
बाकी तो बेड़ियाँ कौन सा मुद्दा छोड़ती हैं
यह सहज अनुभव से जाना जा सकता है।

और इन बेड़ियों से
छूट जाना असम्भव ही है,
बस आदतबाज़ बनकर निकला जा सकता है।


एक आवाज़ थी
जो उसने क्रांति के ग्रंथों से
थोड़ी-थोड़ी इकठ्ठा करके
सम्भालकर रख लिया था कि कभी बोला जा सकेगा
बड़े होकर वह आवाज़ और भी बढ़ी उसमें
वह और भी तड़प उठा
वह आवाज़ निकालने को,
वह क़िताबी ज्ञान को
क्रांति समझ लेता है
और झुलसता है प्रचलित दौर के चलन से
और भागा है फिर से
निर्णय के केंद्र से
ताकि चुनौती देने का मौका न आये,
उसकी आवाज़ अब नहीं आती है,
दूर जाते जाते वह आवाज़
साँझ की लाली में घुलकर कहीं गायब हो गयी थी
हर आवाज़ों पर संगीत नहीं जमाया जाता,
क्षितिज के पार लोग
सुना है उसे याद भी नहीं करते
मृत होने के बाद

बहुत दिन बाद
उनकी आत्मायें मिलीं
और सबकी यही एक शिकायत रही,
कि मेरा दौर क्रांतिकारी नहीं था


मैं कोई पत्र लिख रहा हूँ
जिसमें बयाँ न हो सकने वाली बातें हैं
और अपवाद स्वरूप मैं शामिल कर लेता हूँ
तारों के टूटने के कुछ चित्र
जिससे तुमको यकीन हो
कि मैं भी इसी ब्रह्माण्ड का सदस्य हूँ,
चला देता हूँ
समय के चक्र को
नाच उठती हैं घटनायें
बहुत सम्भव है
समय की चक्रीय अवधारणा में विश्वास रखते हुये
कभी खुद को पत्र लिखते हुये देख सकूँ।

तुम मेरा पत्र पढ़ रही हो
जो बातें पढ़ी नहीं जा सकती हैं
तुमने पत्र को समय की दिशा में रखकर
उनके सारे मानी भांप लिये हैं
और किसी सुपरनोवा की रोशनी की तरह
तुम्हारी आँखें चमक उठती हैं
भाव से भर उठती हैं,
यह याद करती हो
कि ब्रह्माण्ड में इतना रिक्त स्थान है
कि दो तारों के टकराने की संभावना नगण्य है।

समानांतर संसारों में
हमारी दुनियाएं ऐसे ही चलती रहती हैं
कभी कोई प्रतिभावान भौतिक विज्ञानी
अपनी थीसिस में
ऐसे संसारों के बीच कोई खोई हुई कड़ी ढूँढ़कर जोड़ देगा
और हमारी दुनियाएं मिल उठेगीं।


एक दिन जो ये टीले हैं
इनके पत्थर चूर होकर
रेत के कणों में बदल जायेंगे
और किसी आँधी में दूर कहीं उड़ जायेंगे
ये नदियों का बचा-खुचा पानी
सागर की शरण लेगा
और अपने जीवन को फिर से दोहरा देगा
इन खण्डहरों की अंतिम ईंट भी
एक दिन इतिहास को कोसने के लिये नहीं बचेगी
कई पीढ़ियों बाद संसार के लोग ऊब जायेंगे
और इतिहास के महत्व को नकार देंगे
तब यहाँ के रास्ते वीरान नज़र आयेंगे
तब कहा जायेगा
कि काल भटकता रहा देश में
जिस परिणति के लिये
जिस स्थायीपन के लिये
वह अब उसे प्राप्त हुआ,
पूछा जायेगा कि अंतिमता अनाकर्षक क्यों है?

और बाहरी अंतिमता के उस दौर के बाद
शायद मनुष्य आंतरिक अंतिमता की तरफ उन्मुख होगा
जहाँ फिर एक दौड़ शुरू होगी
जीवन को मतलब से सजा देने की,
कलम से कलम लड़ेगी
और वादों के टकराव शुरू होंगे
व्याकुलता के नए दौर शुरू होंगे
अस्तित्व का संकट फिर उठ खड़ा होगा
और अंतिमता की खोज ही अंतिमता बनती जायेगी,
क्या अंतिमता मात्र एक मृग-मरीचिका है?


अबकी बार जब आओगे तुम
कुछ नयी मिसालें लेकर आना,
पिछली बार तुम जिन मिसालों को लेकर आये थे
उन्हें आज़माकर देखा है मैंने,
कॉफी की चुस्कियों के साथ
एक अज़नबी दुनिया पर मढ़कर
वो मिसालें जब तुमने मुझे सौंपी थी
तो विरासत की कोई चीज समझकर
मैंने संभालकर रख ली थी,
किंवदंतियों का उपासक मैं अकेला नहीं था,
लेकिन धरातल पर आते-आते
वो मिसालें असहज होने लगीं
शायद आसमान में रहने की आदत से
ये मिसालें कुछ ढीठ हो गई थी
और मुझसे कुछ कहासुनी भी हुई,
अबकी बार जब आओगे तुम
कुछ नयी हिदायतें लेकर आना
ताकि उन मिसालों को उपयोग में लाया जा सके
और यह जाना जा सके
कि जंगल से दूर एक पेड़ कब तक बचता है

अबकी बार जब आओगे तुम
कुछ नयी मिसालें लेकर आना


कल:
वो बेचैनियों के उस दौर में था
जहाँ खालीपन उपासना की चीज थी
अकेलेपन के सान्निध्य में न जाने
कौन-कौन से विचारों की यात्रायें होती थीं,
जहाँ बैठकर वह सोचता था
कि अगर दुनिया ऐसी भी हो तो क्या गलत है,
जहाँ लकीर का फक़ीर न होना एक साधारण बात न रहकर
एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी बन जाती थी।

बेचैनियाँ भी वहीं थी
जो कभी न कभी अन्य से भी रु-ब-रु हुई ही थीं
पर उसके साथ हादसा हुआ था
बेचैनियाँ गई नहीं
उसमें समा गईं,
और वह उन्हीं बेचैनियों को सौंपता रहा
ज़माने के सही-गलत के मापदण्ड
जहाँ से कुछ नहीं निकलता था
बस एक ढर्रा
और सफलता-असफलता के मानक,
बेचैनियाँ बढ़ती गईं
उनकी ओट से देखा उसने सतही बातें
दुनिया को नई तरह से देखने की कोशिश भी की
लेकिन प्रकृति के कैनवास पर
सदियों से चढ़ाये कृत्रिम रंगों पर
उसके रंग बहुत देर टिक नहीं पाये,
उसकी बेचैनियों के शब्द
वाइजों के लिये परेशानी के सबब थे,
लेकिन वह चलता रहा
उस राह पर जहाँ मिलती थीं
कई राहें बेचैनियों की,
आवारापन की, पागलपन की
उन राहों पर जहाँ चलकर
अपने सामान्य रूप में
कहते हैं कि कोई लौटता नहीं।

आज:
वो पागल नहीं है
सभ्य लोगों के तौर-तरीके
उसने अपना लिये हैं
ये कैसे हुआ
किसी को नहीं पता,
सुना है कि सभ्य बनने के बाद
बहुत समय तक उसकी आवाज़ गायब थी।


जिन्दगी के दो छोर हैं,

पहला, जहाँ आत्म को एक रूप मिलता है
ब्रह्म से कुछ अलग
और जन्म लेती हैं सम्भावनायें
निराकार से साकार निकलता है
बिलख उठती है इकाई संरक्षण खोकर
हर एक रचना का
जो सबसे सशक्त रूपक है -
जन्म,
लो मिला,
पौ फूटती है
जीवन जितना लम्बा दिन लो शुरू हुआ।

दूसरा, जहाँ सम्भावनायें नियति से मिलती हैं
और किताब के अन्तिम पन्ने जैसी
एक संतुष्टि लिये रहती हैं
आत्म और परमात्म अलग नहीं रहते हैं
सार्थकता और निरर्थकता की बहस
मानी खोने लगती है
समय में गोधूलि वेला के रंग मिलने लगे हैं
घर चलें,
ब्रह्म में लीन होने का समय है
चलो,
पटाक्षेप।

इन्हीं दोनों छोरों के बीच
हम बाँधकर एक डोरी और उस पर चढ़कर
फासला तय करने का प्रयास करते हैं
कई बार देखने वाले तालियाँ खूब बजाते हैं
जहाँ दर्शकों के आनन्द के लिये
एक पैर से रस्सी पार करने से पहले
एक पल भी नहीं सोचते हैं
वो जो डोरी कहीं उलझी हुई रखी है
उसे देखने कौन जाता है
इस खेल का नाम जानते हो?
लो, मैंने कहा - जीवन।

अब निरपेक्ष होकर देखो,
जन्म एक घटना है
मृत्यु एक घटना है
जीवन जो बहुत बड़ा लगता है,
वो भी एक घटना है,
और ब्रह्म में ऐसी घटनायें होती रहती हैं।

(हरमन हेस की एक रचना से प्रेरित)


देखना और दिखना,
क्या एक ही बात होती है?

यूँ ही नहीं मान लेना चाहिये
कि मैं और तुम किसी बात पर सहमत हैं
बिम्ब तुम्हारे हैं
और मानी मेरे हैं
परिदृश्य तुम्हारे हैं, कहानी मेरी है
हवा तुम्हारी है, संगीत मेरा है
और देखा जाये तो
अर्थपूर्ण तुम्हारा है ही क्या?

तुमने मुझे आकाशगंगा दिखाई
मैंने वहाँ देखा कृत्रिम प्रकाश से दूर
एक गाँव का बचपन,
तुमने मुझे सबसे ऊँचे गाँवों में से
कुछ एक दिखा दिए
मैंने देखा वहाँ जिजीविषा
प्रकृति के सामने खड़े होने का दुस्साहस,
तुमने मुझे घाटी में
टूटी हुई पगडण्डियाँ दिखाईं
मैंने वहाँ देखा
वैश्विक नाट्यमंच की टूटी हुई कड़ियाँ,
तुमने मुझे लाल-सफ़ेद रंग के घर दिखाये
मैंने उनमें खोजे
किसी दूर देश के वास्तु के खोये हुये उदहारण।

मैंने वहाँ वह नहीं देखा
जो दिख रहा था,
मैंने वहाँ वही देखा,
जो मैं देखने गया था, स्पीति।


नदी आज की तरह शांत
हमेशा से नहीं थी
अब घाटी के किसी कोने में सिमटकर
एक गौरवमयी इतिहास पर
इतराने या उसके बारे में सोचकर
पश्चाताप करने के अलावा चारा ही क्या है,
नदी के बीचो-बीच एक पत्थर
अब दिखने लग गया था
जिस पर दिखते हैं काटे जाने के निशान
जो किसी तेज धारा ने
अपने पराक्रम काल में बनाये होंगे,
कुछ सौ मीटर की दूरी पर जाकर
नदी ठहरी है पिछली कुछ पीढ़ियों से
लोग नदी देखने वहीं जाते हैं,
वहीं पास के एक टीले से
सूरज नदी को सुनहरी रोशनी में
नहलाकर ही सोने जाता है,
जहाँ सुनते हैं
कि सदियाँ एक दूसरे से मिलने आती हैं
इतिहास अपनी कलम से
भविष्य को दिशा दिखा रहा होता है
सच और झूठ
उपयुक्तता के तराजू में तौले जा रहे होते हैं,
सुनो, तुम नदी को यहाँ मत देखो
ये नदियाँ अब घाटियों में नहीं बहतीं
अब ये बहती हैं
समय में, काल में,
वह देखो दूर किसी काल की नदी
वर्तमान के महासागर में अभी अभी मिली है
जहाँ से फिर कई पल
बादल बनकर उठेंगे
और फिर कुछ नदियाँ बह उठेंगीं।

शायद नदी की यह पतली धारा भी
किसी दिन सूख ही जायेगी
लेकिन रह जायेगी
इन पत्थरों पर, इतिहास की दिशा पर, जनमानस पर,
एक अमिट छाप।


इंतज़ार की इन्तहा
कहीं कहीं दिखती है मानिये,
दशकों से नदी किनारे खड़े ये पेड़
या इनसे पहले इसी अवस्था में
यहीं पर खड़े इनके पूर्वज
कब से नदी की धार को
टकटकी लगाए देखते हैं
इन्होंने धूप से बचाकर छाँव भी दी है
हवाओं का खेल भी साथ खेला है
सावन में बादलों के अंधेरे में
साथ घबराये भी होंगे
नदी को पत्तियों के माध्यम से
साल के चक्र भी कई गिनायें होंगे
मगर एक लफ्ज़ भी उसके लिए नहीं बोला;
नदी ने भी नहीं;
एक सच्ची श्रद्धा से
सृष्टि चलती रही।

मगर पतझड़ के मौसम में
एक पीली पत्ती नदी पर गिरी
उसकी छुवन से नदी की सतह पुलकित हो उठी
जहाँ कहते हैं कि नावें घूमने लगती हैं,
उस पत्ती को नदी उलट-पलटकर देखने लगी;
क्या कहते हो?
वह पत्ती नहीं है?
अरे हाँ!
हाँ, प्रेम पत्र।


ये जो खण्डहर हैं
जिन्हें हम इतिहास का साक्षी कहते हैं
अगर देखा जाये तो
इन्होंने इतिहास को देखा ही नहीं है
बल्कि उसमें लिप्त रहे हैं
किसी घटना का साक्षी होने के लिये
यह जरूरी है
कि तटस्थता बनी रहे,
इतिहास के महिमामण्डन में
इन पत्थरों का हित भी सम्मिलित है,
विसंगति यह है
कि इतिहास हम इनसे पूछते हैं।

तो इतिहास के निर्माता
हम स्वयं ही हैं
ये धारणायें इन खण्डहरों को हमने दी हैं,
कल कोई नयी विचारधारा हावी होगी
तो इन पत्थरों पर नये अर्थ आरोपित कर दिये जायेंगे।


एक दिन
मानव निर्मित कोई धूल
अपने भयानक हाथों से
शाम के सूरज को लील लेगी
ये नदियाँ दूर कहीं
बाँध बनाकर रोक दी जायेंगी
ये महल अट्टालिकायें
ज़मींदोज़ हुए पड़े रहेंगे
ये पूरब ये पश्चिम
जैसे हमें ज्ञात हैं
वैसे नहीं रह जायेंगे
ये ज्ञान ये विज्ञान
ये मानव प्रजाति की उपलब्धियाँ
किंवदंती बनकर रह जायेंगी
एक दिन
सार्थक सारी बातें
निरर्थक साबित कर दी जायेंगी।

तब दूर किसी घने जंगल में
एक वन-मानुष
दो पत्थर रगड़कर
आग पैदा करेगा
और सृष्टि का पहिया
एक बार फिर से घूम उठेगा।


चहारदीवारी के बाहर कुछ पेड़ खड़े हैं
उनके बाहर हैं कुछ खाली कुर्सियाँ
बाट जोहती हुई
आदत से मजबूर किसी इंसान की,
उसके बाहर दूर तक
फैले हैं धान के खेत
ओढ़ ली है हरियाली चादर
यादों की नमी से कुछ फसलें उपजती हैं,
उसके पार हैं कुछ पहाड़ियाँ
जहाँ से पत्थर गिरते हैं
पर गिरते भी नहीं हैं
अटक जाते हैं खयाल बनकर
सरकते रहते हैं जिन्दगी के लम्हे बनकर,
उसके पार हैं कुछ मन्दिर
पहाड़ी की दुर्गम चोटी पर
जहाँ झंडियाँ हवा में फड़फड़ाती हैं
जहाँ से निकलते हैं मंत्र पुराने,
उसके पार भी कोई जगह है
जहाँ कोई खाली कुर्सी नहीं है
जहाँ नमी से हरियाली नहीं निकली है
जहाँ जिन्दगी अटकती नहीं है
जहाँ झण्डों का कोई नामोनिशां नहीं है।

वहाँ मैं और तुम बैठे हैं
तुमने परिप्रेक्ष्य की प्रत्यंचा पर
शब्द तान दिए हैं,
वर्तमान की अंगीठी में
हम स्मृतियाँ सेंक रहे हैं,
हवा भयभीत होकर
उलझाने लगी है ज़ुल्फें तुम्हारी,
तुम्हारे माथे की बिन्दी से
निकलते हैं अथाह रंग
झण्डों को रंगते चले जाते हैं
रंग फैलते हैं क्षितिज के कोने तक
देखो सूरज भी आज रंगकर ही जायेगा
और दिखती है
बादलों के कोनों पर एक उजली पट्टी,
मैं थम गया हूँ वक़्त बनकर
और मुझसे निकल रहे हैं छन-छनकर
प्रत्यंचा से छूटे हुए शब्द।


बालकनी के नीचे खिला हुआ
अमलतास के फूलों के आखिरी गुच्छा
कभी आखिरी राही के चले जाने के बाद
धुल छँट जाने के बाद
अपने होने या न होने के बारे में सोचता है
कि आखिर कौन सी वजह होगी
जो उसके वज़ूद को सही-सही बयाँ कर सकेगी।
क्या वह सिर्फ पीला रंग है?
क्या वह एक विशेष आकृति में गूँथ दी गई
परतों का बस एक समूह है?
क्या वह झूमती हुई पत्तियों का मात्र एक सहचर है?
क्या वह विभिन्न तत्वों का एक जटिल मिश्रण है?
या इन सब बातों से मिलकर बना कुछ अन्य?

यदि हाँ,
तो क्या अमलतास का यह पीला फूल
बस कुछ एक गुणों वाली वस्तु बनकर रह गया है?
हर एक वस्तु के कुछ तत्व हैं
क्या उन तत्वों को अलग-अलग करके देख सकने से
वज़ूद में झाँका जा सकता है?
क्या थीसेस के जहाज की तरह
इकाई और सम्पूर्णता की यह बहस
मात्र कारणों के बल पर जीती जा सकती है?

यदि नहीं,
तो क्या यह मान लेना चाहिये
कि इकाइयों का महत्व तभी है
जब सम्पूर्ण एक बार दिख जाए?
क्या ऐसा नहीं होता
कि हर एक वस्तु का
अपना एक मर्म होता है
जिससे अलग उस वस्तु और मर्म
दोनों को नहीं देखा जा सकता है
और अलग-अलग दोनों अपनी मूलता खो बैठते हैं?
यह भी हो सकता है
कि किसी वस्तु को
ज्ञात ढांचों में ढालना उचित न हो?

(या शायद सम्भव भी न हो।)


ये निर्मल शीतल जल
ये छोटे पत्थरों के ऊपर छोटी लहरियाँ
घाटी में सूरज को देखने के
बस कुछ चुनिन्दा पहर
और हर चीज के अस्तित्व को
उद्देश्य देती हुई सिमटी हुई धारा,
किनारे पर खड़ा होकर सोचता हूँ
कि मानी एकतरफा क्यों होते हैं।

ये सूरज-चाँद को दिये गए रूपक
कभी कुछ बढ़ा-चढ़ाकर
तो कभी चाशनी में डुबोकर
पेश की गई शब्दों की लड़ियाँ,
ये झील का पानी
जिसमें हवा के संगीत में
अगाध श्रद्धा से नाचती हैं सूरज की किरणें
कभी इस बात से वाकिफ़ होगा
कि रोज की इन बातों के कुछ मानी भी होते हैं
जो कि हमने इन्हें दे दिये हैं।

कभी शायद हवा का एक झोंका
किसी पगौड़ा से उलझाई हुई झंडियों के माध्यम से
ये बोल सकेगा
कि ये जो मानी तुमने दिये हैं
इनसे अलग बहुत से मानी हैं
तुम मुझे सुनो तो सही।
सदियों से मुझ जैसे बहुतों ने
तुम्हें मानी देने की कोशिश की है,
क्या ऐसा नहीं हो सकता
कि तुम मुझे मानी दो, स्पीति?


गन्ने के खेतों के पीछे
पहाड़ी की चोटी पर
लाल रंग का एक गोला
धीरे-धीरे गिर रहा है,
बादलों के किनारे पर
दिखती हैं चमकीली धारियाँ
जहाँ से निकलता है एक अलग तरह का आलस
जो सबमें व्याप्त हुआ जाता है,
पक्षी अँधेरा होने के पहले
अपने पिंजड़े में लौटना चाह रहे हैं,
और जलने लगे हैं दिये यहाँ वहाँ
जो सूरज का थोड़ा हिस्सा रखकर
सुबह तक लड़ते रहेंगे,
और नित्य घटना थी ये
उस दिन भी सूरज अस्त हुआ।

कई सौ साल पहले
इन्हीं पहाड़ियों के पीछे
इसी नदी के किनारे
गाजे-बाजे के साथ
एक बहुत बड़े साम्राज्य का सूरज
अस्त हुआ था,
अंतिमता लिये हुए।


भयानक सन्नाटा पसरा हुआ था
ऐसा सन्नाटा
जिसमें ध्वनि को
किसी कोने में बैठा हुआ देखा जा सकता था,
देखते ही देखते सन्नाटे में खो गये
वर्तमान के हर एक पहलू
फिर क्षितिज के उस पार से अंधकार उठा
उसके पीछे क्षत-विक्षत लोगों की सिसकियाँ
काले पक्षियों का एक गुट चल दिया
उस ओर जहाँ हो रहा था
विधाता की नाकामियों का खुला प्रदर्शन,
उस अंधकार के पीछे से एक आँधी उठी
जिसमें समाहित हो गया था इतिहास
इतिहास, जो ध्वस्त करता गया रास्ते के तथ्य
इतिहास, जो शांत करता गया हर एक आवाज़ को
इतिहास, जो वक़्त से कहीं आगे निकल गया था,
उस आँधी के पीछे सन्नाटे की एक और परत थी,
और आँधी से निकली सहसा
ढोल-नगाड़ों की ध्वनियाँ
जो धीरे-धीरे तेज होती गईं,

दरबान ने दरवाज़ा खोला,
कहा, महाराज
युद्ध में सेनाओं ने
पराजित कर दिया है शत्रु को
जीत का जश्न शुरू किया जाए!


मेरे इख़्तियार में नहीं हैं मेरी ईज़ाद की हुई बातें
थम गया हूँ मैं, बह रही हैं बनकर बयार ये बातें।

कभी वक़्त का रुख मोड़ देने का माद्दा रखती थीं
आज ख़ुद आवारगी में इस क़दर मानूस हैं ये बातें।

हाँ इनमें किसी के भी वाक़ये बयाँ नहीं होते हैं
किसी की ज़िन्दगी का आईना नहीं हैं ये बातें।

मेरे शौक़ में नहीं हैं बज़्मों के कहकहे या क़सीदे
मेरे सुकून के लिए हैं बिछड़ी नज़्में कुछ भूली बातें।

ये नई हवा नहीं है मत सोचो कि ये रुक जायेंगी
वज़ूद में तो कब से थीं, भले पोशीदा रहीं ये बातें।

क़ायम नहीं हो पाई थी जो वाइज़ की निगेहबानी
पाबंदियाँ लगाओ कहो गुनाहगार जो हैं ये बातें।

और कहो कि यह सही नहीं है कि फैलें ये बातें
मैं मुतमईन हूँ कि तुम्हें असहज कर देंगीं ये बातें।


ये तराशे हुये खम्भे
और उन पर रखे हुये भारी पत्थर
जिन्हें छूकर कभी लोग
चन्द लम्हों की ख़ुशी पा जाया करते थे,
वक़्त के किसी हिस्से में
क़ैद कर दिए जाने से
कुछ नाराज़ से दिखते हैं।

कुछ अवशेष
पुरातत्व विभाग की सलाखों के पीछे
सहमे खड़े हैं
सलाखों के पीछे वज़ूद दिखता नहीं है
सलाखें हटीं तो वज़ूद मिट जायेगा
इसी उधेड़बुन में
ये पत्थर सदियाँ बिता देंगे।

लेकिन कभी भूले-भटके से
कोई केशकंबली अगर यहाँ आ पहुँचे
और असाध्य वीणा के तार झंकृत कर दे
तो ये पत्थर, ये अवशेष
तवारीख की गिरफ्त से आजाद हो उठें।

तवारीख - history.


मेरे सामने अब मुझसे अलग कोई नहीं है
मैं ही किसी और रूप में
अपने सामने विद्यमान हूँ।

कभी किसी तो किसी विचारधारा का
मुखौटा लिये
मैं खुद से ही लोहा ले रहा हूँ
मैं समय के किसी और भाग के
अपने आप से मुखातिब हूँ,
और एक-दूसरे की हालत पर
मेरे दोनों रूप सवालिया निशान खड़े कर रहे हैं
और खुद को ही झुठला रहे हैं।

वह जो एक पतली सी परत थी
किन्हीं मतभेदों की
जो कि मुझको मेरे सामने के किसी और रूप से
मुझको अलग करती थी
मैंने भेद ली है,
और उस शख्स में
मैंने खुद को ढूँढ़ लिया है,
और उसको मेरे मन से गुजरने का न्यौता भी दिया है।

किसी क्षण में तल्लीन
विलीन होकर मेरे रूप आपस में उलझ रहे हैं,
लेकिन वह सब मैं ही हूँ
मेरे सामने अब मुझसे अलग कोई नहीं है। 


खण्डहर ऐसे ही थोड़े बनते हैं
एक मज़बूत इमारत ऐसे ही थोड़े ग़ायब हो जाती है,

तथ्यों की एक-एक ईंट जोड़कर
उसने एक मज़बूत नींव बनायी होगी
तमाम भट्ठों की
अच्छी से अच्छी, जाँची-परखी हुई तथ्यों की ईंटें
जिन्हें बनाने में किन्हीं कारीगरों ने
सैकड़ों साल लगा दिए होंगे,
फिर उस नींव को
मुख्यधारा रूपी ज़मीन के नीचे
दबाया होगा
और विचारों की इमारत खड़ी की होगी
पहली बार में अगर अच्छे से न बना हो
तो उसने लच्छेदार भाषा का लेप भी लगाया होगा
आने-जाने वाले लोगों ने
उस इमारत की बहुत तारीफ की थी,

लेकिन विचारों की बस इमारतें ही नहीं होती हैं
विचारों की आँधियाँ भी होती हैं
चिन्तन के उच्च दबाव वाले क्षेत्रों से उठने वाली ये आँधियाँ
रास्ते में आने वाली विचारों की इमारतों को
धराशायी कर देती हैं,
तमाम आंदोलनों की, तमाम वादों* की ये आँधियाँ,
उसकी भी इमारत बच नहीं पायी थी
नींव अभी भी बची थी
तबाही की दास्ताँ सुनाने के लिए,
मजबूत थी या शायद ओझल थी,

ऐसी इमारतें हर रोज़ कहीं पनपती हैं
और खण्डहर बनकर रह जाती हैं,
शायद तुमने भी दो पैरों पर
चलते-फिरते खण्डहर देखे होंगे, अदीब?

*(वाद - ism)